कौन हैं गजानन माधव मुक्तिबोध जिनकी कविता की पंक्ति पीयूष गोयल ने पढ़ी, आप भी पढ़िए पूरी कविता
पीयूष गोयल ने भाषण का समापन कुछ पक्तियों के साथ किया. उन्होंने कहा ‘एक पांव रखता हूं, हजार राहें फूट पड़ती हैं. बता दें कि यह पंक्तियां गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता ‘मुझे कदम-कदम पर’ से ली गईं हैं.

नई दिल्ली: आज वित्तमंत्री पीयूष गोयल ने मोदी सरकार के कार्यकाल का अंतरिम बजट पेश कर किया. मोदी सरकार ने अपने अंतिम बजट को किसानों, युवाओं और मिडल क्लास का बजट बताया. इस दौरान एक खास चीज भी हुई. पीयूष गोयल ने भाषण का समापन कुछ पक्तियों के साथ किया. उन्होंने कहा ‘एक पांव रखता हूं, हजार राहें फूट पड़ती हैं. बता दें कि यह पंक्तियां गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता ‘मुझे कदम-कदम पर’ से ली गईं हैं. हालांकि मुक्तिबोध की सही पंक्ति 'एक पैर रखता हूं, कि सौ राहें फूटतीं ' है.
कौन हैं गजानन माधव मुक्तिबोध
गजानन माधव मुक्तिबोध 20 वीं सदी के सबसे प्रमुख हिंदी कवि, निबंधकार, साहित्यिक और राजनीतिक आलोचकों में से एक थे. उनको 'ब्रह्मराक्षस' चांद का मुहं टेढ़ा है' 'भूरी भूरी ख़ाक धूल' के लिए याद किया जाता है.
जिन्होंने भी मुक्तिबोध को पढ़ा है वो जानते हैं कि उनकी कविता में न सुर्ख परचम था, न लाल रूमाल और न लाल चूनर. वे गहरे अंतर्द्वंद्व और तीव्र सामाजिक अनुभूति के कवि थे. जब व्यवस्थाएं नृशंसता पर उतर आती हैं, तब मुक्तिबोध अंतःकरण का प्रश्न उठाते हैं. समय जिस तरह कविता को रचता है, क्या कविता भी उसी तरह अपने समय को रचती है? इस सवाल का जवाब है हां, क्योंकि मुक्तिबोध हर गुजरते वक्त के साथ और अदीक समकालीन होते जा रहे हैं.
पढ़िए वह पूरी कविता जिसकी पंक्ति पीयुष गोयल ने सदन के अंदर पढ़े
मुझे क़दम-क़दम पर चौराहे मिलते हैं बांहे फैलाए
एक पैर रखता हूं कि सौ राहें फूटतीं व मैं उन सब पर से गुज़रना चाहता हूं बहुत अच्छे लगते हैं उनके तज़ुर्बे और अपने सपने सब सच्चे लगते हैं अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूं जाने क्या मिल जाए
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में महाकाव्य पीड़ा है पलभर में सबसे गुज़रना चाहता हूं प्रत्येक उर में से तिर जाना चाहता हूं इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूं अजीब है ज़िन्दगी बेवकूफ़ बनने के ख़ातिर ही सब तरफ़ अपने को लिए-लिए फिरता हूं और यह सब देख बड़ा मज़ा आता है कि मैं ठगा जाता हूं ह्रदय में मेरे हीं प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है हंस-हंसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है कि जगत स्वायत्त हुआ जाता है
कहानियां लेकर और मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते जहां ज़रा खड़े होकर बातें कुछ करता हूं पन्यास मिल जाते
दुख की कथाएं, तरह-तरह की शिकायतें अहंकार-विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान, ज़माने के जानदार सूरे व आयतें सुनने को मिलती हैं!
कविताएं मुसकरा लाग-डांट करती हैँ प्यार बात करती हैं मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियां श्रद्धाएं चढ़ती हैं!!
घबराए प्रतीक और मुसकाते रूप-चित्र लेकर मैं घर पर जब लौटता उपमाएं, द्वार पर आते ही कहती हैं कि सौ बरस और तुम्हें जीना ही चाहिए
घर पर भी, पग-पग पर चौराहे मिलते हैं, बांहें फैलाए रोज़ मिलती हैं सौ राहें शाखा-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं नव-नवीन रूप-दृश्यवाले सौ-सौ विषय रोज़-रोज़ मिलते हैं और, मैं सोच रहा कि जीवन में आज के लेखक की कठिनाई यह नहीं कि कमी है विषयों की वरन् यह आधिक्य उनका ही उसको सताता है, और, वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है
इससे पहले भी कई वित्त मंत्रियों का दिखा है शायराना अंदाज
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बतौर वित्तमंत्री साल 1991 में बजट पेश किया था. इस दौरान उन्होंने शायर इकबाल का एक शेर सुनाया था- ‘यूनान-ओ-मिस्र-रोम सब मिट गए जहां से, अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशा हमारा''.
अरुण जेटली
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा साल 2017 में मोदी सरकार का चौथा बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने शायराना अंदाज में कहा था कि ‘इस मोड़ पर घबरा के न थम जाएं आप, जो बात नई है उसे अपनाएं आप, डरते हैं नई राह पे ये क्यूं चलने से, हम आगे-आगे चलते हैं, आ जाएं आप''
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