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आखिर क्यों बढ़ रहे हैं हत्या करने के बाद शव के टुकड़े करने के इतने मामले?

अपने किसी सगे संबंधी या पार्टनर की हत्या करने के बाद शव के कई टुकड़े करने के मामले पहले भी सामने आये हैं लेकिन इधर कुछ दिनों में ऐसे मामलों में अचानक बढ़ोतरी देखने को मिली है. बहुचर्चित श्रद्धा वालकर हत्याकांड की तर्ज़ पर ही जयपुर में एक युवक ने अपनी ताई की हत्या करके शव को कई टुकड़ों में काटकर जंगल में फेंक दिया. इसलिये सवाल उठता है कि ऐसी वारदातों को अंजाम देने वाला हर शख्स क्या मनोरोगी ही होता है?

अपनी लिव इन पार्टनर श्रद्धा वालकर को मारकर शव के कई टुकड़े कर देने वाले आफ़ताब पूनावाला के बारे में भी मनोरोगी होने का शक जताया गया. अब जयपुर की वारदात को अंजाम देने वाले आरोपी अनुज शर्मा के बारे में भी पुलिस यही शक जता रही है कि वह मानसिक विकार से पीड़ित है और गुस्से में आकर उसने वारदात को अंजाम दिया. पुलिस के मुताबिक इस तरह का जघन्य का अपराध कोई मनोरोगी ही कर सकता है. जिस तरह से शव को काटा गया और एक स्थान पर फेंका गया, यह केवल एक विकृत आदमी ही कर सकता है. 

लेकिन मनोवैज्ञानिक विश्लेषक उसे अलग नजरिये से देखते हैं. उनके मुताबिक मानसिक रोगियों का इस तरह से क्रिमिनलाइजेशन करना और उन सब को अपराधियों की तरह देखना गलत है  क्योंकि सारे अपराधी मानसिक रोगी नहीं होते और सारे मानसिक रोगी अपराधी नहीं होते. हां, इसे मानसिक विकृति जरूर कह सकते हैं, जिसकी कई अलग श्रेणियां हैं . मामूली-से झगड़े में अचानक किसी की हत्या कर देना एक अलग तरह की विकृति है. 

जबकि पूरा प्लान तैयार करके किसी को मारना और फिर शव के कई टुकड़े करके उसे ठिकाने लगाने के पीछे खुद को बचाने का मकसद तो होता ही है लेकिन टुकड़े करने की विकृति ज्यादा भयावह इसलिये है कि ऐसी वारदात को अंजाम देने वाला काफी पहले से ही इसकी प्लानिंग कर रहा होता है. इसके लिये वह क्राइम मूवी या वैसे सीरियल देखता है और फिर वही तरीका अपने शिकार पर आजमाता है. 

जयपुर निवासी अनुज ने पहले हथौड़े से अपनी ताई की हत्या की फिर उसके शव को टुकड़ों में काटा. शव के दस टुकड़े किए और फिर दिल्ली-जयपुर हाईवे के पास जंगल में उन्हें फेंक दिया.  पुलिस के मुताबिक, मृतका सरोज शर्मा के शव के आठ टुकड़ों को बरामद कर लिया गया है. बताया गया है कि आरोपी ने कथित तौर पर अपनी विधवा ताई के शव के टुकड़े करने के लिए मार्बल कटर का इस्तेमाल किया था और उन्हें ठिकाने लगाने के लिए गूगल मैप का इस्तेमाल किया.  

पुलिस के अनुसार बीटेक की पढ़ाई कर चुका आरोपी 2013 से हरे कृष्ण आंदोलन से जुड़ा था और अभी हाल तक इस्कॉन के साथ काम कर रहा था. इसलिये हैरानी इसलिये है कि कृष्ण भक्ति से जुड़े और दुसरों के प्रति प्रेम,करुणा व दया का भाव सीखने वाले मस्तिष्क में इतना क्रूर और वहशीपन आखिर कैसे आ गया. 

थाई मनोवैज्ञानिक वानलोप पियामानोथम ने एक रिपोर्ट में समझाया है कि जो हत्यारे अपने पीड़ितों के टुकड़े करते हैं,वे अपनी अवचेतन क्रूरता का एक रूप प्रदर्शित करते हैं और उन्हें तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है. डॉक्टर तो अपने मरीज की ज़िंदगी बचाने के लिए उसके अंगों की चीर-फाड़ करता है और किसी जानवर को मारकर उसे बेचना एक पेशेवर कसाई की मजबूरी होती है. 

दूसरा, जिन लोगों ने अपने जीवन में किसी बड़े आघात का अनुभव किया है या किसी हमले के शिकार हुए हों,वो अक्सर अपने दर्द और क्रोध को दबा लेते हैं. वनलोप के अनुसार,ऐसे पूर्व पीड़ित ही बाद में इन दमित भावनाओं को व्यक्त करने के लिए संगीन अपराध कर सकते है. लेकिन तीसरा समूह गुस्से से जुड़े तीव्र मनोविकार से पीड़ित व्यक्तियों का है.  ऐसे मामलों में, विशेषज्ञ समझाते हैं कि मारने के बाद शव के टुकड़े करना,अक्सर मानसिक क्रोध की स्थिति में या अपराध को छुपाने के लिए किया जाता है. 

एक अपराध विज्ञानी नैती जित्सवांग के मुताबिक ऐसे हत्यारे जो अपने पीड़ितों के शरीर को काट डालते हैं, उनमें अत्यधिक क्रूरता की प्रवृत्ति होती है,जिसे वो ऐसी हरकत के जरिये  प्रदर्शित करते हैं. ऐसे लोग अंतर्मुखी होने के बावजूद रोजमर्रा की परिस्थितियों में समान दिख सकते हैं. नैटी ने सहमति व्यक्त की कि अंग-विच्छेद करने वाली हत्याओं को अक्सर हत्यारे के पेशेवर अनुभव या बचपन के आघात से जोड़ा जाता है. 

न्यूज एजेंसी दाइचे वैले ने ऐसे कातिलों की साइकोलॉजी पर एक स्टडी करते हुए 2016 में एक रिपोर्ट जारी की थी,जिसके अनुसार सीलियर किलर और साइको किलर जैसे लोग कई हफ्तों पहले ही तैयारी शुरू कर देते हैं. इस तरह के लोग अधिकतर डायरी लिखते हैं, जिसमें वे वारदात की हर बारीकी को समझते हैं, वे उसके इर्द गिर्द एक कहानी रचते हैं। वो यह भी सोचते हैं कि वारदात को अंजाम देते वक्त वो क्या पहनेंगे. हथियार पास हो, तो उसके साथ खेलते रहते हैं, ना हो, तो उसकी कल्पना करते हैं.  

ये लोग अच्छी खासी रिसर्च भी करते हैं.  वो इस तरह की दूसरी घटनाओं के बारे में पढ़ते हैं, डॉक्यूमेंट्री देखते हैं, वीडियो देखते हैं. इस सबका मकसद पुरानी घटनाओं की नकल करना और योजना बनाना होता है. इसके अलावा वो ऐसी वीडियो गेम भी खेलते हैं जिसमें उन्हें लोगों पर गोलियां चलानी होती है.

नोट: उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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