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इस 'बचपन' को शिक्षा से मोहताज करने के लिए आखिर कौन है बड़ा कसूरवार?

18वीं शताब्दी में जन्में फ्रांस के मशहूर कवि-उपन्यासकार विक्टर ह्यूगो ने कहा था- “वो व्यक्ति जो एक विद्यालय खोलता है, एक कारावास बंद करता है.” उसी बात को आगे बढ़ाते हुए  20वीं सदी में दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति रहे नेल्सन मंडेला ने स्कूली शिक्षा को लेकर बेहद अहम बात कही थी- "शिक्षा ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिसके उपयोग से आप दुनिया को बदल सकते हैं.” लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि हमारी राज्य सरकारें नए सरकारी स्कूल खोलने की बजाय उन्हें बंद कर रही हैं और उनकी जगह पर प्राइवेट स्कूलों को खोलने पर बढ़ावा दिया जा रहा है. 

बड़े शहरों में पिछले कुछ सालों में प्राइवेट स्कूलों की कुकुरमुत्ते की तरह जो फसल उगी है, उसे देखते हुए इस खतरे का अंदाजा तो लग ही रहा था कि ये 'निजी शिक्षा माफिया' अपनी तिजोरियां भरने के लिए सरकार में बैठे नुमाइंदों-अफसरों की हर फरमाइश को पूरा करते हुए सरकारी स्कूलों पर ताला लगवाकर ही रहेगा. लेकिन कोई नहीं जानता था कि वो इतनी जल्द कामयाब भी हो जाएगा. अभी तो ये सिर्फ एक साल का ही आंकड़ा है और इसके बाद के अगले दो साल का आंकड़ा और भी ज्यादा चौंकाने वाला हो सकता है. 

आप परेशान हो जायेंगे ये जानकर कि सितंबर 2018 से सितंबर 2019 के महज एक साल में ही देश के 51 हजार सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया गया है. सरकारें तो अपनी चमड़ी बचाने के लिए कोई न कोई वजह तो गढ़ेगीं ही लेकिन हकीकत ये है कि ठीक उसी एक साल में 11,739 नए प्राइवेट स्कूल खुल गये. इसीलिये शिक्षा के क्षेत्र में काम करे रहे एक्टिविस्टों की इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि केंद्र सरकार अब जमीनी स्तर पर भी शिक्षा का निजीकरण करने की तरफ आगे बढ़ रही है और ये उसका सबसे बड़ा उदाहरण है. वे कहते हैं कि सरकार दिल से ये चाहती ही नहीं कि सरकारी स्कूलों के शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाया जाए. इसका नतीजा ये है कि अभिभावक अपने बच्चों को किसी प्राइवेट स्कूल में दाखिला दिलाने पर मजबूर हो जाते हैं और सरकार को ये बहाना मिल जाता है कि फलां स्कूल में पढ़ने के लिए इतने छात्र ही नहीं थे कि उस सरकारी स्कूल को चलाकर बेवजह के खर्च को और बढ़ाया जाए.

भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के तहत एक विभाग है, जिसका नाम है- United District Information System for Education (UDISE). इस विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018-19 में देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 1,083,678 थी जो 2019-20 में घटकर 1,032,570 रह गई. जो सीधे 51,108 की कमी दर्शाता है. इसका खुलासा भी लोकसभा में पूछे गए एक सवाल से हुआ था जब तत्कालीन शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने 14 सितंबर 2020 को अपने जवाब में ये आंकड़ा दिया था. हालांकि इसे कोरोना महामारी की देन ही समझा जा सकता है कि पिछले हफ्ते इस विभाग ने 2020-21 की जो रिपोर्ट पेश की है उसमें दावा किया गया है कि इस एक साल में सिर्फ 521 सरकारी स्कूल ही बंद हुए हैं. लेकिन मजे की बात ये है कि विभाग ने 2018-19 की रिपोर्ट को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया है. जाहिर है कि सरकार के पास भी इसका कोई माकूल जवाब नहीं होगा कि एक साल में इतने सारे स्कूलों को बन्द करने की नौबत आख़िर क्यों आई?

स्कूल बंद करने में अव्वल नंबर पर भी देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तरप्रदेश ही है उसके बाद मध्यप्रदेश का नम्बर है और तीसरी पायदान पर ओडिसा है. हालांकि पश्चिम बंगाल और बिहार ऐसे राज्य हैं जहां इन सालों में नए सरकारी स्कूल खुलने में कुछ बढ़ोतरी हुई है. आल इंडिया पेरेंट-टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल कहते हैं कि "इससे ज्यादा बुरा आलम क्या होगा कि सरकारी स्कूलों में पढाने वाले शिक्षक भी खुद अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने पर मजबूर हैं क्योंकि सरकार मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराने के सारे सिस्टम को ही धवस्त कर देना चाहती है. जबकि Right to Education कानून के मुताबिक हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराना सरकार का दायित्व है और ये उस बच्चे का मौलिक अधिकार भी है." अब आप ही सोचिये और ये तय कीजिये कि देश के बचपन का इस बुनियादी हक छीनने के लिए कौन कसूरवार है और उसमें प्राइवेट एजुकेशन माफ़िया का कितना बड़ा रोल है?

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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