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ममता बनर्जी के भतीजे आख़िर क्यों ले रहे हैं मोदी सरकार से सीधा टकराव ?

इधर उत्तर प्रदेश में मंदिर-मस्जिद का विवाद गहराता जा रहा है, तो उधर पश्चिम बंगाल में ममता दीदी ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ की शक्तियों को छीनने का पंगा ले लिया है. लेकिन कल शनिवार को ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव, सांसद औऱ उनके भतीजे  अभिषेक बनर्जी ने जो कुछ कहा है, उसे बीजेपी को एक गंभीर चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए. बीजेपी को ये भी सोचना होगा कि एक के बाद एक उसके विधायक और सांसद उसका साथ छोड़कर आखिर ममता का दामन क्यों थाम रहे हैं? ये मुद्दा अहंकार का नहीं बल्कि उस साख, विश्वास और भरोसे का भी है कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल के जो दमदार नेता ममता का साथ छोड़कर बीजेपी में आये थे, उन्हें पार्टी आखिर संभाल क्यों नहीं पाई?

पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने ममता को सत्ता से बाहर करने के लिए बंगाल में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन वहां की जनता ने उस शेरनी को सत्ता की हैट्रिक दिला दी. इसलिये दिल्ली में बैठकर बंगाल का किला फतह करने का सपना देखने वालों को पहले ये सोचना होगा कि आखिर क्या वजह है कि महज एक साल के भीतर ही वहां पार्टी मोतीचूर के लड्डू की तरह बिखरने लगी है.

बीजेपी को बंगाल में लग रहे झटके
साल भर पहले हुए चुनाव में बीजेपी के 77 विधायक चुनकर आये थे लेकिन अब उनकी संख्या घटकर 70 रह गई है. ये सभी 7 विधायक ममता का दामन थाम चुके हैं. यही नहीं, अपनी आवाज़ के लिए मशहूर जिस बाबुल सुप्रियो को बीजेपी ने आसनसोल सीट से चुनाव लड़ाकर जीत हासिल की थी और फिर उन्हें मंत्री बनाया था, उन्हें भी पार्टी संभाल नहीं सकी.
हैरत की बात ये भी है कि फिल्मी दुनिया से राजनीति में कूदे और वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे जिस शत्रुघ्न सिन्हा को बीजेपी नेतृत्व ने बूढ़ा मानकर हाशिये पर कर दिया था, उसी 'बूढ़े शेर' पर ममता बनर्जी ने अपना दांव लगाया. बाबुल सुप्रियो के इस्तीफा देने के बाद खाली हुई आसनसोल लोकसभा सीट से ही ममता ने उन्हें न सिर्फ उम्मीदवार बनाया बल्कि शत्रुघ्न सिन्हा ने बीजेपी उम्मीदवार को दो लाख वोटों से हराकर पहली बार इस सीट पर तृणमूल का कब्ज़ा जमाने में कामयाबी हासिल की. बीजेपी ने इस पराजय से कोई सबक लिया या नहीं, ये तो पार्टी चलाने वाले ही बेहतर जानते हैं. लेकिन बीजेपी को चार दिन पहले ही एक और बड़ा झटका लगा है.

बीजेपी के चाणक्य समझे जाने वाले नेता और गृह मंत्री अमित शाह पूरे साल भर बाद बीती 5 मई को बंगाल पहुंचे थे. उनके उस दौरे का एक मकसद ये भी था कि वहां पार्टी में मच रही भगदड़ को आखिर कैसे रोका जाये. उन्हें इसका क्या फार्मूला मिला, ये तो कोई नहीं जानता लेकिन महज़ 20 दिन बाद ही पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता ने बीजेपी का दामन छोड़कर 'दिल्ली दरबार' को बड़ा झटका दे दिया. इस बार बैरकपुर से बीजेपी सांसद अर्जुन सिंह ने पार्टी को अलविदा कहकर दोबारा तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया है.

कई बड़े बीजेपी नेताओं ने छोड़ी पार्टी
दरअसल,पिछले साल मई में ममता बनर्जी के तीसरी बार बंगाल की सत्ता संभालने के बाद से ही वहां राजनीतिक समीकरण बदलने शुरु हो गए हैं. जो नेता किसी मजबूरी में या लालचवश ममता का साथ छोड़कर बीजेपी में चले आये थे, उन्हें अब अपनी गलती का अहसास हो रहा है और वे सिलसिलेवार तरीके से 'घर वापसी' कर रहे हैं. पिछले साल भर के घटनाक्रम पर गौर किया जाये, तो राजीव बनर्जी, मुकुल रॉय, तन्मय घोष, विश्वजीत दास,सौमेन रॉय, बाबुल सुप्रियो और अब सांसद अर्जुन सिंह ने वापस टीएमसी में जाकर बीजेपी की तैयार की हुई जमीन पर मट्ठा डाल दिया है. अब इसे ममता की जादूगरी कहें या बीजेपी नेतृत्व का अहंकार लेकिन इन नेताओं के आने और फिर रूठकर वापस चले जाने की कोई तो वजह रही होगी.

अब बात करते हैं बंगाल की सीएम ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी की जिन्होंने शनिवार को मेदिनीपुर जिले के हल्दिया में तृणमूल नेताओं को ईडी और सीबीआई की ओर से बार-बार समन भेजने के लिए मोदी सरकार की जमकर खिंचाई की है. दरअसल, केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय ने भ्रष्टाचार और कथित लेनदेन के एक मामले में अभिषेक और उनकी पत्नी को आरोपी बनाया हुआ है. इसलिये उन्होंने अपबी भड़ास निकालते हुए बीजेपी को साफ लहजे में चेतावनी दे डाली कि अगर उनकी पार्टी ने अपने दरवाजे खोल दिए तो राज्य में बीजेपी पूरी तरह से साफ हो जाएगी.

अभिषेक बनर्जी के बयान के मायने
अभिषेक ने ये भी कहा कि उनको ईडी जितनी बार बुलाएगी, उतनी बार बीजेपी का कोई न कोई नेता पार्टी छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल होगा. बताया जा रहा है कि बैरकपुर के बीजेपी सांसद अर्जुन सिंह की घर वापसी के बाद उनके विधायक पुत्र पवन सिंह भी जल्दी ही तृणमूल में शामिल हो सकते हैं. हालांकि अभिषेक ने नाम लिए बिना विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी की भी खिंचाई की और उन पर पूर्व मेदिनीपुर जिले को दिल्ली के हाथों बेचने का आरोप लगाया. अभिषेक ने कहा कि जिले के एक नेता ने ईडी और सीबीआई से बचने के लिए इस जिले को दिल्ली के हाथों बेच दिया है. अभिषेक का कहना था कि ईडी ने उनको दो-दो बार पूछताछ के लिए दिल्ली बुलाया और वे दोनों बार चुपचाप वहां गए थे. लेकिन ये बंगाल का मामला है इसलिए पूछताछ भी बंगाल में ही होनी चाहिए. बार-बार दिल्ली बुलाना बंगाल को घुटने टेकने पर मजबूर करने का प्रयास है. लेकिन अगर हमने पार्टी के दरवाजे खोल दिए तो बंगाल में बीजेपी साफ हो जाएगी. दीदी बीजेपी को हरा कर तीसरा बार सत्ता में लौटी हैं. यह बात दिल्ली को याद रखनी चाहिए. ममता बनर्जी के भतीजे की ये धमकी सिर्फ सत्तारुढ़ पार्टी के लिए नहीं है, बल्कि सीधे मोदी सरकार को भी चुनौती देने वाली है. इसलिये देखना ये है कि सियासी शतरंज की इस बिसात पर मात कौन खाता है ?

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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