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यूपी पुलिस की इस भाषा से भाईचारा कायम होगा कि माहौल और खराब होगा?

नयी दिल्लीः गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल समझे जाने वाले उत्तर प्रदेश में सरकार के ही एक सर्कुलर में इस्तेमाल की गई वविवादित भाषा ने शिया मुसलमानों को बेहद नाराज़ कर दिया है. हज़रत मुहम्मद साहब के नाती हुसैन अली और उनके अन्य साथियों की शहादत का मातम मनाने से पहले ही सरकार ने मुस्लिमों के जख्मों पर शब्दों भरा ऐसा नमक छिड़का है, जिसका दर्द जल्द दूर होता नहीं दिखता.

इस सर्कुलर के एक हिस्से में जिस तरह की शब्दावली का प्रयोग किया गया है, उसे एक सभ्य समाज के लिहाज़ से जिम्मेदाराना तो नहीं कहा जा सकता. समाज में कानून-व्यवस्था बनाये रखना और अमन चैन कायम रखना, पुलिस की मुख्य जिम्मेदारी होती है. लेकिन अगर वही पुलिस अपने किसी आदेश में ऐसी भाषा का इस्तेमाल करे,जो समाज की फिज़ा खराब करने की वजह बन जाये,तो उसे किसी भी तरह से जायज़ भी नहीं कहा जा सकता. किसी भी राज्य सरकार की प्राथमिकता बगैर किसी भेदभाव के समाज में भाईचारा कायम रखने की होती है, न कि  एक वर्ग की भावनाओं को आहत करने या उसे उत्तेजित करने की. इसलिये सवाल यह है कि राज्य के पुलिस महानिदेशक के दफ़्तर से जारी हुए इस सर्कुलर में विवादित भाषा का इस्तेमाल करने की मंजूरी आख़िर किसने दी?

कोविड गाइडलाइन्स के मद्देनजर इस साल यूपी में मुहर्रम पर कोई जुलूस या ताजिया निकालने पर पाबंदी लगा दी गई है. पाबंदी से मुसलमानों को कोई ऐतराज नहीं है. उन्हें अफ़सोस और गुस्सा ये है कि उन पर झूठे आरोप लगाए गए हैं. चूंकि शिया मुसलमानों के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है, लिहाज़ा शिया धर्मगुरु ही सबसे ज्यादा ख़फ़ा हैं. हंगामा बढ़ते देख यूपी पुलिस ने हालांकि यही सफाई दी है कि जारी सर्कुलर में कुछ भी विवादित नहीं है और न ही उसमें कुछ नया जोड़ा गया है.

डीजीपी मुख्यालय की तरफ से जारी गाइडलाइंस के एक पाइंट पर खासतौर से शिया धर्मगुरुओं को ऐतराज़ है. गाइडलाइंस के चौथे पाइंट के एक हिस्से में लिखा है, 'पुराने लम्बित धार्मिक एवं साम्प्रदायिक प्रकरणों तथा ऐसे नये उठने वाले विवादों, अपरम्परागत धार्मिक जुलूसों एवं कार्यो, यौन संबंधी घटनाओं, गौवंश वय/परिवहन आदि घटनाओं को लेकर पूर्व में अनेक अवसरों पर साम्प्रदायिक सद्भाव प्रभावित होता रहा है. उक्त के दृष्टिगत विशेष सर्तकता अपेक्षित है.'

गाइडलाइंस की भाषा से नाराज़ शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद ने कहा कि ' इसके लिए तो यूपी पुलिस को कोर्ट में लेकर जाना चाहिए.' उनके मुताबिक 'गाइडलाइंस शिया के ऊपर झूठे आरोपों का पुलिंदा है, लिखा है कि मुहर्रम में रेप होते हैं, गाय काटी जाती हैं. क्या यह सब कोविड गाइडलाइन हैं?'

मौलाना कल्बे जवाद ने आरोप लगाया कि 'ऐसा करके सिर्फ शिया-सुन्नी नहीं बल्कि हिंदू-मुस्लिम का भाईचारा खराब करने की कोशिश की गई है और हैरानी की बात है कि वह भी सरकार की तरफ से. यह गोलियों भरा खत है, जिसमें हमारे समुदाय को गाली दी गई है.' उन्होंने इस लेटर को वापस लेने की मांग भी की. जवाद ने कहा कि वे लोग खुद कोरोना की वजह से जुलूस नहीं निकालने वाले थे.

वहीं आल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी और शिया धर्मगुरु मौलाना यासूब अब्बास ने भी इस सर्कुलर की निंदा करते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि यह भाषा किसी तालिबानी सोच वाले व्यक्ति ने लिखी है. उन्होंने इसे सऊदी और वहाबी सोच का नमूना तक कहा.

गाइडलाइंस को लेकर उठे विवाद पर एडीजी लॉ एंड आर्डर प्रशांत कुमार का कहना है कि तीन-चार साल से यही सर्कुलर जारी हो रहा है. इसमें कोई भी बात नई नहीं लिखी गई है. अगर उनकी बात सही है, तो फिर सवाल उठता है कि इस बार ही ये विवाद क्यों उठा? पुलिस ने ये सफाई भी दी है कि इंटेलिजेंस के इनपुट के आधार पर अपने अफसरों को सतर्कता बरतने के लिए यह जारी किया गया था,जो कि पुलिस विभाग का इंटरनल सर्कुलर है. किसी बाहरी व्यक्ति का इससे कोई सरोकार नहीं है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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