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दो साल पहले ऑफर ठुकराने वाले नीतीश की पार्टी को मंत्री की कुर्सी चाहिए!

नई दिल्लीः केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की संभावनाओं के बीच बिहार में सियासी सरगर्मी तेज है. साल 2019 में जब दूसरी बार पीएम मोदी शपथ ग्रहण कर रहे थे उस दिन चौंकाने वाले घटनाक्रम में दो घंटे पहले जेडीयू ने सरकार में शामिल नहीं होने का एलान किया था. अब वहीं जेडीयू दो साल बाद सरकार में शामिल होने की इच्छा जता रहा है. पार्टी के अध्यक्ष आरसीपी सिंह चाहते हैं कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में जेडीयू की हिस्सेदारी हो.

अब सवाल ये है कि अगर जेडीयू सरकार में शामिल होता है तो फिर उसे कितने मंत्रीपद मिलेंगे? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए थोड़ा अतीत के पन्नों को खंगालना होगा.

साल 2019 में जब जेडीयू ने सरकार में शामिल नहीं होने का एलान किया उस वक्त एक खबर बड़ी तेजी से उड़ी थी. खबर ये थी कि जेडीयू को एक कैबिनेट मंत्री का पद ऑफर किया गया है. लेकिन पार्टी अपने दो बड़े नेताओं के लिए दो मंत्री पद चाह रही थी. ये दो नेता लोकसभा में पार्टी संसदीय दल के नेता ललन सिंह और राज्यसभा में संसदीय दल के नेता आरसीपी सिंह थे.

अब दो साल बाद भी ये दोनों नेता दावेदारी की रेस में हैं. आरसीपी सिंह अब पार्टी के अध्यक्ष हैं. अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जेडीयू को दो कैबिनेट मंत्री पद देने पर राजी होते हैं तो स्वभाविक है कि ये दोनों ही मंत्री बनेंगे. जैसा कि इनकी ख्वाहिश है.

लेकिन, एक मंत्री की कुर्सी मिली तो फिर विवाद होगा. वैसे आरसीपी सिंह पार्टी के अध्यक्ष हैं और पहला हक इनका बनता है. जहां तक एक व्यक्ति एक पद की सिद्धांत की बात करने वाले लोगों का सवाल है तो ये सिद्धांत जेडीयू पर लागू नहीं होता.

हां जातीय गणित के आधार पर आरसीपी सिंह भले ही कमजोर पड़ सकते हैं. क्योंकि नीतीश और आरसीपी दोनों एक ही कुर्मी जाति से आते हैं. ऐसी स्थिति में नीतीश के भरोसेमंद और भूमिहार जाति से आने वाले राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह का नाम फाइनल होगा. पर सवाल ये है कि क्या आरसीपी सिंह राजी हो जाएंगे?

राजनीतिक गलियारों में जो चर्चा है उसके मुताबिक आरसीपी सिंह, ललन सिंह के साथ साथ पूर्णिया के सांसद संतोष कुशवाहा का नाम भी (राज्य) मंत्री की रेस में लिया जा रहा है. लेकिन सब कुछ निर्भर करता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसले पर .

जहां तक बिहार की राजनीति का सवाल है तो जेडीयू में इस वक्त अंदरुनी राजनीति ठीक नहीं है. माना जाता है कि आरसीपी सिंह का प्रभाव पार्टी कैडर पर तेजी से बढ़ा है. विपक्ष कह भी रहा है कि जल्द ही जेडीयू नीतीश और आरसीपी दो खेमों में बंटेगा. वैसे इसमें शत प्रतिशत सत्यता नहीं भी माने तो कुछ गुंजाइश तो नजर आती ही है.

पिछले साल अचानक से लिये गये फैसले में आरसीपी सिंह को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था. कहा जाता है कि नीतीश कुमार को फीडबैक मिला था कि बीजेपी के साथ मिलकर आरसीपी कोई गेम कर सकते हैं.

लिहाजा, नीतीश ने उन्हें अध्यक्ष बनाकर शांत किया. इसी फैसले के बाद पुराने लोगों को वापस लाने की कोशिश शुरू की गई . इस कोशिश में उपेंद्र कुशवाहा को वापस लाया गया. संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाकर आरसीपी सिंह के बराबर खड़ा करने की कोशिश की गई.

माना जाता है कि आरसीपी और कुशवाहा के बीच राजनीतिक संबंध वैसे मधुर नहीं हैं जैसे होने चाहिए. उपेंद्र कुशवाहा नीतीश कुमार के पुराने करीबी रहे हैं. लेकिन नीतीश दरबार में हैसियत कम होने के बाद कुशवाहा ने सालों पहले रास्ते अलग कर लिया था.

2020 के विधानसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी का जहां खाता नहीं खुला वहीं नीतीश की हैसियत भी तीसरे नंबर की पार्टी की हो गई. इसके बाद साथ आने की जरूरत दोनों ने महसूस की लेकिन ज्यादा जरूरत नीतीश कुमार को थी. इसकी वजह ये भी है कि नीतीश चेक एंड बैलेंस की नीति पर चलने वाले नेता हैं.

आरसीपी को अध्यक्ष बनाने के बाद उन्हें लगा होगा कि पार्टी पर पकड़ कमजोर हो सकती है तो उन्होंने वशिष्ठ नारायण सिंह के जरिये कुशवाहा को साधने की तैयारी शुरू की . और फिर दोनों साथ आ गए.

अब अगर आरसीपी सिंह केंद्र में मंत्री बन जाते हैं तो पार्टी का एक धड़ा उन्हें अध्यक्ष पद से हटाने की मुहिम शुरू कर सकता है. ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा इस कुर्सी के प्रबल दावेदार हो जाएंगे. फिलहाल, केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने की चर्चा के बहाने जेडीयू की राजनीति चर्चा में है. सहयोगी बीजेपी में भी मंत्री बनने के लिए नेता लॉबिंग कर रहे हैं.

राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी वैसे तो प्रबल दावेदार हैं लेकिन प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल की दावेदारी ने सुशील मोदी की राह में रोड़ा खड़ा कर दिया है. पूर्व मंत्री राजीव प्रताप रूडी का नाम भी बिहार से रेस में है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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