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नीतीश की अगुआई वाली महागठबंधन सरकार कर रही है बेजोड़ काम, लेकिन अपराधों पर नहीं कसी लगाम तो चुकाना होगा दाम

हाल-फिलहाल एक झटके में किसी भी राज्य में सवा लाख लोगों को नौकरियां नहीं दी गयी हैं. यह कमाल नीतीश कुमार ने किया है. उन्होंने इंडिया गठबंधन को दो बड़े मुद्दे दिए हैं. जातिगत सर्वेक्षण के बाद 75 फीसदी आरक्षण की सीमा बढ़ाकर और शिक्षकों की बंपर बहाली कर नीतीश अभी बिहार में राजनीतिक दृष्टि से सबसे आगे चल रहे हैं. हालांकि, उनकी सफेद चादर पर लॉ एंड ऑर्डर के दाग बहुत दूर से दिख रहे हैं. 

सफेद चादर पर गैरकानूनी धब्बे

महागठबंधन की जो सरकार है, जिसके मुखिया नीतीश कुमार हैं, उसने जो काम किए हैं, वह अद्भुत हैं और आनेवाले लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं. कानून-व्यवस्था की जहां तक बात है, तो पिछले सात-दस दिनों में तीन-चार ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे लगता है कि बिहार में कानून-व्यवस्था की हालत खराब हुई है. हालांकि, एक राइडर के तौर पर लेखक याद दिलाना चाहता है कि बिहार में जो 1990 के दशक में अपराध का परिदृश्य था, और जो 2023 का आपराधिक परिदृश्य है, वह पूरी तरह अलग हैं. उसमें अंतर देखने को मिलता है. अभी हाल में घटी तमाम घटनाओं को पहले याद करना चाहिए. बीते एक सप्ताह में एक ही परिवार के छह लोगों की हत्या प्रेम-प्रसंग में हुई, एक पुलिसवाले को बालू-माफिया ने मारा, छठ के दौरान ही गोपालगंज में हूच-ट्रेजेडी भी हुई. नकली औऱ जहरीली शराब पीकर कुछ लोगों की मौत हो गयी. वैसे, इसमें सांत्वना देने की बात एक ही रही कि पिछली बार जब मोतिहारी में जहरीली शराब का शिकार लोग हुए थे, तब कोई मुआवजा नहीं मिला था, लेकिन इस बार नीतीश कुमार ने माना भी और मुआवजा भी दिया. शराबबंदी बिहार में पिछले सात-आठ वर्षों से लागू है और बीच-बीच में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, हालांकि एनसीआरबी तो 2022 तक ऐसी मौतों की संख्या केवल 23 बताता है, लेकिन यह हम सभी जानते हैं कि यह बहुत कम है. 

सत्ताधारी दल ले मामले की सुध

यह जरूर है कि सुशासन बाबू की छवि में डेंट लगा है. जिस तरह बालू-माफिया ने एक एसआई की हत्या कर दी, या जेडीयू के एक नेता ने अपने पेट्रोल पंप पर लेडी एसआई पर हमला किया, ये सभी बेहद चिंताजनक बात हैं, लेकिन यह कहना भी गलत है कि यह जंगलराज-2 है. लॉ एंड ऑर्डर और गुड गवर्नेंस के मामले में नीतीश कुमार के पहले शासनकाल के मुकाबले कमी तो आयी है. हमें याद रखना चाहिए कि उस दौरान स्पीडी ट्रायल होते थे, संपत्तियां जब्त होती थीं और करीबन 50 हजार अपराधियों को जेल के अंदर किया गया था. उसमें कमी जाहिर तौर पर आयी है, लेकिन अपराध के चरित्र में भी परिवर्तन आया है. पहले जो रंगदारी मांगी जाती थी, अपहरण एक उद्योग था, लोग डरे-सहमे रहते थे, वह नीतीश कुमार के आने के बाद बंद हुआ. एक दिक्कत यह आयी कि अपराध का जब चरित्र बदला, तो अपराधियों ने रूट भी बदल दिया. अब वो बालू माफिया हैं, लैंड माफिया हैं, लिकर माफिया हैं और वो संगठित होकर काम कर रहे हैं. जिस सुशासन के लिए नीतीश कुमार जाने जाते हैं, जिस तरह का काम महागठबंधन की सरकार कर रही है. जातिगत सर्वेक्षण के बाद आरक्षण की सीमा 75 फीसदी करना हो या फिर सवा लाख शिक्षकों की नियुक्ति हो, वह सारा बढ़िया काम इन कुछ धब्बों की कालिमा में फीका पड़ जा रहा है. इससे ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि 12-14 करोड़ की आबादी में ये घटनाएं होती रहती हैं, या फिर दूसरे राज्यों में भी वह होती रहती हैं. सवाल यहां उम्मीदों का है, भरोसे का है. यह पॉलिटिकल और राजनीतिक कामों के साथ ही जरूरी है. आप जो भी सामाजिक या राजनीतिक काम कर रहे हैं, उसके साथ कानून-व्यवस्था की स्थिति को चौकस रखना भी आपकी ही जिम्मेदारी है. 

नीतीश से है बहुत उम्मीदें

क्राइम कंट्रोल करना और क्राइम के लिए जीरो टॉलरेंस नीतीश कुमार को दिखाना ही होगा, वह पॉलिसी लानी ही होगी. बिहार का सबसे बड़ा विवाद का मसला जमीन है. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में जितनी हत्याएं होती हैं, उनमें सबसे अधिक तो जमीन के मामले होते हैं. लैंड को सरकार ऑन रिकॉर्ड लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन लैंड माफिया से निबटने में अभी काफी सख्त कदम उठाने की जरूरत है. 2014 के बाद जितने भी विधानसभा या लोकसभा चुनाव हुए, भाषायी मर्यादा का स्तर जितना अभी गिरा है, उससे अधिक कभी नहीं गिरा था. यह राष्ट्रीय स्तर का मामला है. यह बात मैं नीतीश कुमार के हालिया बयानों और उन पर उठे सवालों के बाद कह रहा हूं. यह तय है कि चुनाव अब भाषायी बयानों पर नहीं होंगे, बल्कि बिहार में जो काम हो रहा है, जो सामाजिक इंजीनियरिंग हो रही है, उस पर ही होगा. अपराध जैसे मुद्दे उठ सकते हैं, सदन के भीतर मुख्यमंत्री ने क्या कहा, यह बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बन पाएगा. विपक्ष को इस बात की काट खोजनी चाहिए कि नीतीश के फैसलों के बरक्स वो क्या लोक-लुभावन काम कर सकते हैं, या करने की सोच सकते हैं. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]

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