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तेजस्वी का डर है या फिर भाजपा का, तभी तो विधानसभा का चुनाव भी साथ ही चाह रहे हैं नीतीश कुमार 

बिहार में लोकसभा के साथ ही विधानसभा के चुनाव भी हो जाए, आजकल बिहार के सियासी गलियारे समेत मीडिया में भी ऐसी चर्चाएँ सुनने को मिल रही हैं. तो क्या इन चर्चाओं का कोई आधार है या ये बस ऐसे ही अफवाहें भर हैं? यकीनन, ये चर्चा आधारहीन नहीं है. कुछ तो है, जिसका डर है, जिसकी पर्दादारी है. दबे-छिपे चर्चा यही है कि नीतीश कुमार की हार्दिक इच्छा है कि लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव भी करवा दिए जाएं, बस बात बनने भर की देर है. बात बननी भी है तो भाजपा आलाकमान से, जिसे अगर अपना फायदा नजर आया तो, वे भी आसानी से तैयार हो जाएंगे. 

नीतीश-भाजपा डील की शर्तें!    

सिर्फ ये मान लेना कि नीतीश कुमार अपनी पार्टी में टूट के डर से भाजपा के साथ चले गए, बेवकूफी होगी. बल्कि, मैं तो यह मानता हूँ कि ललन सिंह और राजद के जरिये जद(यू) में टूट की खबरें मीडिया में प्लांट करवाई गयी थी, नीतीश कुमार को भयभीत करने के लिए और ऐसी खबरें प्लांट करवाने वाले लोगों को यह अच्छे से पता था कि पिछले कुछ समय से नीतीश कुमार को अपने अलावा किसी पर भरोसा नहीं रहता. किसी पर नहीं मतलब किसी पर नहीं. यहाँ तक कि आरसीपी सिंह, उपेन्द्र कुशवाहा और ललन सिंह जैसे अपने नजदीकी लोगों पर भी नहीं. और इसका असर भी हुआ. पहले नीतीश कुमार ने ललन सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाया और फिर महागठबंधन से नाता तोड़ भाजपा के साथ चले गए, 
हालांकि, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आखिर भाजपा के साथ वे किन शर्तों पर गए? क्या महज 17 लोकसभा सीटों के लिए, जो संभवत: राजद के साथ रहते हुए भी उन्हें मिल सकता है, या एकाध सीटें कम मिलती. निश्चित ही इस डील की सबसे बड़ी शर्त यह रही होगी कि अगला 5 साल एक बार फिर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के तौर पर मिले. नीतीश कुमार यही चाहते रहे होंगे कि वे लोकसभा चुनाव में भाजपा को फ़ायदा पहुंचाएं और विधानसभा चुनाव में भाजपा उन्हें एक बार फिर अगले 5 साल के लिए बड़े भाई की भूमिका में देखे. यह डील मानना भाजपा के लिए इतना आसान होगा? 

तेजस्वी का डर! 

नीतीश कुमार इंडिया एलायंस के निर्माण के दौरान ही सार्वजनिक घोषणा कर चुके थे कि 2025 का चुनाव (विधानसभा) तेजस्वी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा. इंडिया एलायंस में भाव न मिलने, यथोचित पद या सम्मान न मिलने (पीएम पद का उम्मीदवार) से वे आहत थे. हालांकि, इंडिया अलायंस के निर्माण में उनकी महती भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन, कांग्रेस ने इस मोड पर आ कर ओबीसी कास्ट सर्वे, आरक्षण सीमा बढाने जैसे नीतीश कुमार के मुद्दे को लपक लिया और यहां पर नीतीश कुमार ने खुद को ठगा महसूस किया. मैंने बहुत पहले यह लिखा था कि बिहार में शिक्षक भर्ती और के के पाठक का मसला महागठबंधन को भारी पड़ सकता है. क्रेडिट लेने की जो होड़ मची, उससे भी नीतीश कुमार को लगा कि वे इस रेस में पीछे छूट गए हैं. हालांकि यह भी सच है कि 10 लाख सरकारी नौकरी का वादा तेजस्वी यादव ने ही अपने चुनावी घोषणापत्र में किया था, जिस वजह से बिहार के विगत विधानसभा चुनाव का पूरा माहौल ही बदल गया था. राजद से नाता तोड़ने के बाद, तेजस्वी यादव की जन विश्वास यात्रा और रैली में जिस तरह से भीड़ जुटी है, उसे देखते हुए भी नीतीश कुमार का आत्मविश्वास कहीं न कहीं डोला है और अब वे चाहते होंगे कि जल्द से जल्द लोकसभा के साथ ही विधानसभा के भी चुनाव हो जाए.    
भाजपा पर भरोसा? 

नीतीश कुमार को किसी पर भरोसा नहीं और भाजपा के लिए अब नीतीश कुमार को बड़े भाई के रूप में स्वीकारना आसान नहीं, ऐसे में नीतीश कुमार दोनों चुनाव एक साथ करवा कर गिव एंड टेक फार्म्यूला पर काम करना चाहते है और उसके बाद भी उनके पास पाला बदलने का ऑप्शन रहेगा, लेकिन, क्या भाजपा के लिए यह इतना आसान होगा? बिलकुल नहीं. बिहार में नीतीश कुमार पिछले 20 सालों से भाजपा और राजद के बीच बफर स्टेट की भूमिका में रहे हैं. भाजपा यह अच्छी तरह जानती है कि नीतीश कुमार अभी अपने राजनीतिक करियर के सबसे बुरे और कमजोर दौर से गुजर रहे है. नीतीश कुमार को भी इस बात का एहसास है कि उनके जूनियर (पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव) अब काफी परिपक्व हो चुके हैं और तकरीबन मास लीडर में कनवर्ट हो चुके हैं. आगे बिहार की लड़ाई राजद बनाम भाजपा की ही होने वाली है. फिर नीतीश कुमार इस बात को भी कैसे भूल सकते है कि उनके मौजूदा साथी (भाजपा) ने पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान चिराग पासवान के जरिये उन्हें और अधिक कमजोर बना दिया था, वह भी साथ चुनाव लड़ते हुए. तो फिर 1 साल बाद होने वाले बिहार विधान सभा चुनाव से पहले भाजपा न जाने क्या-क्या कर सकती है? यह अन्देशा नीतीश कुमार को है, इसीलिए वे भीतर ही भीतर यह चाहते होंगे कि दोनों चनाव एक साथ हों लेकिन भाजपा फिलहाल लोकसभा चुनाव पर फोकस्ड है. उसका लक्ष्य यही होगा कि वह ओबीसी कास्ट सेन्सस, ओबीसी आरक्षण जैसे मुद्दों की सवारी कर बिहार से 40 के 40 सांसद जीत कर आए, विधानसभा की बाद में देखेंगे, लेकिन नीतीश कुमार अगर 17 के 17 लोकसभा सीटें जीत भी जाते हैं तो उनके हाथ क्या आएगा? 2025 में उनके हाथ में क्या मुख्यमंत्री का पद रहेगा? यह सवाल नीतीश कुमार को परेशान कर सकता है, बल्कि परेशान कर रहा है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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