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क्या तस्वीर बदल देने मात्र से महात्मा का क़द घटेगा और मोदी जी का बढ़ेगा?

खादी ग्रामोद्योग आयोग के वर्ष 2017 के कैलेंडर और डायरियों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगाने के विवाद पर लगाम लगाने की कोशिश ख़ुद खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के चेयरमैन श्री वीके सक्सेना ने की है. लेकिन अपने प्रेस नोट के उत्तर्राद्ध में उन्होंने लंदन के मैडम तुसाद म्यूजियम में गांधी प्रतिमा की अनदेखी के बहाने अपनी व्यक्तिगत गांधी-भक्ति का प्रदर्शन करते हुए जिस तरह पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह को घसीटा है, उससे उनका इरादा स्पष्ट हो जाता है.

महात्मा गांधी के स्थान पर मोदी जी की चरख़ा चलाती तस्वीर लगाने के पीछे उन्होंने वजह दी है कि कैलेंडर और डायरियों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तस्वीर लगाने की कोई अनिवार्यता अथवा नियम नहीं है. चूंकि 2017 के दौरान लुधियाना में आयोजित एक ‘खादी कार्यक्रम’ में पीएम मोदी पधारे थे और पंजाब के 500 खादी दस्तकारों को उन्होंने चरखे वितरित किए थे, इसलिए उसी अवसर की तस्वीर इस बार के कैलेंडर और डायरियों में छापी गई है. सक्सेना ने यह भी इंगित किया है कि वर्ष 1996, 2002, 2005, 2011, 2013 और 2016 में भी महात्मा गांधी की तस्वीर मुख्य पृष्ठ पर नहीं इस्तेमाल की गई थी. उनके इसी प्रेस नोट का इस्तेमाल करते हुए भाजपा प्रवक्ता कहते फिर रहे हैं कि खादी के प्रचार-प्रसार के लिए मोदी जी द्वारा किए गए प्रयासों का ही यह नतीजा है कि वर्ष 2014-2015 के दौरान खादी की बिक्री में 34% का इजाफा हुआ है जबकि वर्ष 2004 से 2014 के दस वर्षों तक यूपीए सरकार में खादी की बिक्री 2 से 7% ही होती थी.

यह आंकड़ा सही हो सकता है लेकिन यह कोई तकनीकी विवाद नहीं है. अगर उपरोक्त पांच-छह वर्षों में चरखा चलाते गांधी जी की तस्वीर मुख पृष्ठ पर नहीं भी थी तो ऐसा भी तो नहीं हुआ था कि उसी फ्रेम में डॉ. मनमोहन सिंह या सोनिया गांधी या किसी अन्य बड़े नेता की चरखा चलाती तस्वीर लगा दी गई हो. अगर मोदी जी खादी की बिक्री का प्रतिशत बढ़ाने के प्रति इतने ही प्रतिबद्ध हैं तो उनके पास इसके हज़ार तरीके हो सकते थे. अपनी ‘मन की बात’ में अगर वह एक बार भी कह देते कि ‘मैं भी खादी पहनता हूं, आप भी पहनिए’ तो इसका हज़ार गुना प्रभाव होता. उनके अनुयायी खादी पर टूट पड़ते. लेकिन चरखा चलाते गांधी जी वाले फ्रेम में ही चरखा चलाते मोदी जी की तस्वीर छापने को खादी की भलाई नहीं बल्कि गांधी जी का स्थानापन्न बनने की बचकानी कोशिश के तौर पर ही देखा जाएगा.

आज़ादी के आंदोलन के दौरान विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का आवाहन करने के बाद आख़िर जनता को विकल्प भी तो देना था. इसीलिए महात्मा ने स्वदेसी ‘चरखा’ को अपना हथियार बनाया. आज़ादी की भावना चरखे में उतार दी गई. खादी, चरखा, तकली, रुई की पोनी- सब गांधी व्यक्तित्व के अंग बन गए. सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, पंडित नेहरू, गोविंद वल्लभ पंत, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे अन्य बड़े-बड़े नेता सार्वजनिक तौर पर चरखा कातते देखे जाने लगे. बच्चा-बच्चा आज़ादी और चरखे का दीवाना हो उठा. कवयित्री कमला चौधरी की रचना है- ‘मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं/ सब मित्रों के बीच बैठकर रघुपति राघव गाऊं/ घड़ी कमर में लटकाऊंगा, सैर सबेरे कर आऊंगा/ मुझे रुई की पोनी ला दे तकली खूब चलाऊं/ मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं.’

केवीआईसी 'खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम 1956' के तहत भारत सरकार द्वारा निर्मित एक वैधानिक निकाय है. यह भारत में खादी और ग्रामोद्योग से संबंधित सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्रालय (भारत सरकार) के अंतर्गत एक शीर्ष संस्था है. अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आयोग हरसंभव तकनीकी एवं प्रचारात्मक कदम उठाने को स्वतंत्र है. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि खादी कोई लक्कड़-पत्थर का उद्यम नहीं अपितु एक ऐसा पवित्र वस्त्र है जिसे स्वयं गांधी जी ने ‘राष्ट्रीय पोशाक’ करार दिया था. पहिए की ही तरह गांधी जी ने चरखे का आविष्कार तो नहीं किया था लेकिन इसे उन्होंने स्वालंबन का प्रतीक अवश्य बना दिया था. उस समय ‘खादी इज गांधी एंड गांधी इज खादी’ का नारा दिया जाता तो अतिशयोक्ति न होती! क्योंकि खादी महज एक कपड़ा नहीं अपितु एक सशक्त दर्शन और विचार है जो गांधी जी की जीवनदृष्टि के साथ नाभिनालबद्ध है. इसीलिए विवाद भी खड़ा हुआ.

एक बार मोदी जी तस्वीर या मूर्ति अगर संसद भवन के सामने लगा देते तो शायद किसी को ऐतराज़ न होता. लेकिन चरखे के साथ मोदी जी को इस तरह जोड़ना लोगों को पच नहीं रहा. यह एक विरासत को छीनने की कोशिश है. हरियाणा के वरिष्ठ भाजपा नेता और मंत्री अनिल विज तो यहां तक कह बैठे कि खादी के साथ (महात्मा) गांधी का नाम जुड़ने से ही वह कभी उठ नहीं पाई, बल्कि डूब गई. उन्होंने यह भी कहा कि (महात्मा) गांधी एक ऐसा नाम है, जिस दिन से नोटों पर आया, उनका अवमूल्यन हो गया! हालांकि अपनी ही पार्टी का साथ न मिलने के बाद वह बयान से पलट गए लेकिन तस्वीर बदलने के पीछे छिपी मंशा तो स्पष्ट कर ही गए!

महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने इस पूरे विवाद पर अपनी राय देते हुए कहा है- “बालक फिल्म के एक गाने में बच्चा बापू से कहता है- ‘सुन ले बापू ये पैगाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम, चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम राम’ और फिर वही बालक कहता है, जो आज के लिए बिल्कुल समयोचित है- ‘तेरी लकड़ी ठगों ने ठग ली, तेरी बकरी ले गये चोर.’ यह तो तुषार गांधी का कहना है लेकिन मेरा कहना यह है कि ‘रामचरित मानस’ से गोस्वामी तुलसीदास का नाम काट कर अगर कोई कवि या संत उनकी जगह अपना नाम लिख दे तो भी सौ जन्मों तक रामचरितमानस उसकी रचना नहीं हो सकेगी. किसी के पुरुषार्थ का श्रेय किसी भी विधि कोई दूसरा, फिर वह चाहे कितना भी ताक़तवर क्यों न हो; नहीं ले सकता! महात्मा मोदी बनने के लिए मोदी जी को बिल्कुल नई और अलग रंगत की लंबी लकीर खींचनी होगी.

विशेष: उपरोक्त लेख में व्यक्त दिए गए विचार लेखक के निजी विचार है. एबीपी न्यूज़ का इनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई सरोकार नहीं है. - लेखक से ट्विटर पर जुड़ने के लिए क्लिक करें- और फेसबुक पर जुड़ने के लिए क्लिक करें- 

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