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आरएसएस के गढ़ में लगातार होती हार से कोई सबक लेगी क्या बीजेपी?

इस देश में जनसंघ से लेकर बीजेपी की स्थापना करवाने वाले आरएसएस का मुख्यालय नागपुर है और वहां होने वाले किसी भी तरह के चुनाव में अगर बीजेपी को शिकस्त का सामना करना पड़े तो इसे सियासी गलियारे में चौंकाने वाला तो माना ही जायेगा. नागपुर सिर्फ संघ की बुनियाद ही नही है, बल्कि वह केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का भी गृह क्षेत्र है.

नागपुर में पिछले तीन साल से हर तरह के चुनाव में लगातार होती हुई हार बीजेपी के लिए एक बड़े खतरे का संदेश देती है. महाराष्ट्र विधान परिषद की पांचों सीटों पर सोमवार को हुए चुनावों के गुरुवार को जो परिणाम घोषित किये गये वह कुछ और ही संदेश देने वाले दिखते हैं.

इन चुनावों में नागपुर सीट के चुनाव परिणामों ने बीजेपी को तगड़ा झटका दिया है. नागपुर सीट पर एमवीए यानी महाराष्ट्र विकास अघाड़ी के सुधाकर अदबोले ने बीजेपी के नागो गानार को 7 हजार से ज्यादा वोटों से हरा दिया है. महाराष्ट्र की राजनीति में नागपुर की किसी भी चुनावी सीट को इसलिए अहम माना जाता है क्यों कि वो संघ का इकलौता सबसे बड़ा केंद्र है, इसलिये वहां हुई एक छोटी-सी हार भी संघ व बीजेपी को घेरने के लिए विपक्ष को अपने हाथ में बड़ा सियासी मुद्दा मिल जाता है. सियासी जानकार कहते हैं कि नागपुर यानी अपने गढ़ में पार्टी उम्मीदवार की इस तरह से हार बीजेपी के लिए हैरानी से कम नहीं हैं. 

महत्वपूर्ण बात ये है कि ये हार बीजेपी को ऐसे समय में मिली है ,जब राज्य की दो विधानसभा सीटों चिंचवाड़ और कस्बा पेठ पर उपचुनाव 26 फरवरी को होने वाले हैं. दोनों ही सीटों पर विधानसभा चुनावों में बीजेपी के उम्मीदवार विजयी हुए थे. उनके निधन के बाद से दोनों ही सीटें खाली हो गई हैं. जाहिर है कि नागपुर में मिली इस जीत से एमवीए के कार्यकर्ताओं का जोश तो बढ़ेगा ही और वे बीजेपी से मुकाबला करने के लिए कोई कसर भी बाकी नहीं रखेंगे, लेकिन महत्वपूर्ण बात ये है कि महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों पर हुए चुनाव-नतीजों से बीजेपी को ये सबक लेना चाहिये कि विदर्भ क्षेत्र में वह अपना जनाधार आखिर क्यों खोती जा रही है.

ये वही नागपुर है जहां 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने नागपुर की 11 विधानसभा सीटों में से 10 पर अपना परचम लहराया था, लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में यहां कांग्रेस ने अपना प्रदर्शन बेहतर किया और जिले की तीन सीटों पर जीत हासिल की. एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार जीता और बीजेपी सात सीटों पर सिमट गई.

नागपुर में एमवीए की इस जीत पर विपक्ष को तो गदगद होना ही था. महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष नाना पटोले ने नागपुर में हुई इस जीत पर खुशी जताते हुए कहा कि एमवीए ने बीजेपी के मातृ संगठन के गढ़ पर प्रहार किया है. नागपुर महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी नेता नितिन गडकरी का न केवल गृह जिला है बल्कि यहां बीजेपी के वैचारिक संगठन आरएसएस का मुख्यालय भी है. लेकिन ये पहली बार नही है कि नागपुर में बीजेपी को किसी चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा हो. ये सिलसिला साल 2020 से चला आ रहा है. नागपुर में हुए एमएलसी चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल करके बीजेपी को करारा झटका दिया था. 

दरअसल, बीते 58 सालों से इस सीट पर बीजेपी और पूर्व में जनसंघ के उम्मीदवार जीतते आए थे. एक बार खुद नितिन गडकरी भी इस सीट से ही एमएलसी बने थे. बीते साल अक्टूबर में भी नागपुर जिले में पंचायत समिति के अध्यक्षों और उपाध्यक्षों के पदों पर हुए चुनाव के नतीजों में भी बीजेपी को करारा झटका लगा था, तब कांग्रेस ने पंचायत समिति की अधिकांश सीटों पर जीत हासिल की थी और बीजेपी पंचायत समिति के अध्यक्ष का एक भी पद नहीं जीत सकी थी.

कांग्रेस ने जिले में अध्यक्ष के 13 में से 9 और उपाध्यक्ष के 13 में से 8 पदों पर जीत हासिल की थी.अगर और पीछे चलें तो साल 2021 में नागपुर के 13 तालुक्काओं की जिला परिषद की 16 सीटों के लिए उपचुनाव हुए थे. इनमें से केवल तीन पर बीजेपी को जीत मिली थी. वहीं कांग्रेस ने नौ सीटों पर जीत हासिल करके संघ के इस सबसे बड़े गढ़ को चुनौती दी थी, तब चार सीटों पर अन्य दलों ने अपना कब्जा जमाया था. इसी तरह 13 तालुका में पंचायत समिति की 31 सीटों पर भी चुनाव हुए थे. इसमें भी बीजेपी को बुरी तरह हार झेलनी पड़ी. इन 31 में से केवल छह सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी, जबकि 21 सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया था.

सवाल उठता है कि संघ के गढ़ में कांग्रेस या उसके सहयोगी दल आखिर मजबूत क्यों हो रहे हैं? महाराष्ट्र की राजनीति के जानकार कहते हैं कि नागपुर क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी के मजबूत होने के पीछे कई कारण हैं. नागपुर से दो नेता सुनील केदार और नितिन राउत महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रहे हैं. इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले भी नागपुर से हैं. कहा जा रहा है कि नाना पटोले ने खुद इन चुनावों में जमकर काम किया और उसका नतीजा पार्टी को मिला. दूसरी तरफ नागपुर से बीजेपी के दोनों कद्दावर नेता नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस पंचायत व जिला परिषद से लेकर इन चुनावों से भी दूर रहे.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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