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जितिन प्रसाद का जाना कांग्रेस हाईकमान को पंजाब में फंसाना

क्या राहुल-प्रिंयका से कांग्रेस संभल नहीं रही? उधर जी-23 में पुराने घाग लीडरों ने दबाव बना रखा है. इधर अनदेखी से परेशान उनके हम उम्र नेता पार्टी छोड़ रहे हैं. पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया गए अब जितिन प्रसाद. सिंधिया मध्यप्रदेश की राजनीति का बड़ा नाम हैं तो जितिन प्रसाद उतर प्रदेश के ब्राहमण वोट बैंक में कांग्रेस का चेहरा थे.

जितिन प्रसाद की विदाई उस वक्त हुई है जब कांग्रेस अपने सबसे मजबूत किले पंजाब में अंदरुनी कलह से लड़ रही है और इस विदाई का सीधा असर पंजाब की कलह को निपटाने वाले फैसले पर पड़ेगा. पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह पर कमेटी के जरिए दवाब बनाने वाला हाईकमान जितिन प्रसाद के जाने से खुद दवाब में आ गया है. असल में बीजेपी ने दांव ही ऐसा खेला कि कांग्रेस में नेतृत्व पर फिर सवाल उठना लाजिमी है… और उठ भी रहे हैं.

80 सीटों के साथ पंजाब में कांग्रेस की मजबूत सरकार है लेकिन कांग्रेसियों का झगड़ा भी सातवें आसमान पर है. सोनिया गांधी ने इस क्लेश को मिटाने के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई. कमेटी सूबे के सभी पार्टी नेताओं से मिली- मंत्री, विधायक, सांसद, राज्यसभा सांसद, कोई नहीं छोड़ा. यहां तक कि हारे हुए नेता भी दरबार में बुलाए गए. पार्टी के वॉर रुम, 15 रकाबगंज रोड पर चार दिन तक परेड चली. आखिरी दिन सीएम अमरिंदर सिंह ने भी तीन घंटे सबूत और सफाई पेश की. आज शाम तक या कल कमेटी की रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष को चली जाएगी.

अगले एक दो हफ्ते में राहुल और प्रियंका को निर्णय लेना है कि पंजाब में किस नेता की क्या भागीदारी होगी. कौन सरकार संभालेगा और कौन पार्टी, यह भी तय होगा. मसला कैप्टन और नवजोत सिद्धू का है लेकिन एडजेस्टमेंट की उम्मीद दो जट्ट सिख चेहरों के अलावा एक हिंदू और एक दलित चेहरे को भी है.  कमलनाथ की कलह से जब ज्योतिरादित्य बीजेपी में गए थे तो राजस्थान में सचिन पायलट गहलोत सरकार की फ्लाइट से उतर गए थे. अब जितिन प्रसाद गए हैं तो पंजाब में पार्टी निर्णायक मोड़ पर खड़ी है. जितिन का जाना हाईकमान के पंजाब पर होने वाले फैसले पर फर्क डालेगा.  अगर कैप्टन कांग्रेस के पुराने खिलाड़ी हैं तो सिद्धू में कुछ सीनियर लीडर फ्यूचर देखते हैं.

कैप्टन को लगता है सोनिया गांधी भले उनके साथ हैं लेकिन भाई बहन सिद्धू का साथ दे सकते हैं लेकिन जितिन प्रसाद के जाने से जो हालात बने हैं उसमें कांग्रेस हाईकमान पंजाब पर कोई भी फैसला लेने से पहले सौ बार प्लस माइनस करेगा. छह महीने बाद पंजाब में विधानसभा चुनाव है और उससे पहले हाईकमान ने पंजाब के नेताओं की जो इतनी चहलकदमी करवाई है उस पर फैसला भी बड़ा लेना पड़ेगा या यूं कहें कि फैसले भी बड़े लेने पड़ेंगे तो गलत नहीं होगा. दो डिप्टी सीएम के साथ तीन बिरादरी सिख, दलित और हिंदू को खुश करने का फार्मूला है. लेकिन यह फॉर्मूला नवजोत सिद्धू और उनसे असुरक्षित महसूस करने वाले पुराने कांग्रेस लीडरों को कितना जमेगा यह सिर्फ पहेली ही नहीं, नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती है, परीक्षा की घड़ी है.

सिद्धू या कैप्टन में से अगर किसी को भी हाईकमान का फैसला नागवार गुजरा तो पंजाब में पार्टी का नुकसान तय है. इसलिए नहीं कि इन दोनों में से कोई बीजेपी में चला जाएगा. पंजाब और हरियाणा में बीजेपी के लिए चांस कम हैं. लेकिन विकल्प दूसरे भी हैं. अगर सिद्धू के मन की ना हुई तो वो 2027 का इंतजार नहीं करेंगे और अगर कैप्टन को लगा कि हाईकमान उनको नीचे दिखाने की कोशिश कर रहा है तो 2022 में चुनाव में वो इंटरनल डेमेज का दांव खेल सकते हैं. कांग्रेस में बागी उतारने का कल्चर काफी पुराना है. दोनों परिस्थितियों में नुकसान कांग्रेस को ही होगा. कैप्टन और सिद्धू के बीच पावर संतुलन बनाना और संतुलन पर सबकी सहमति. राहुल प्रियंका के लिए अब बड़ा चैलेंज है क्योंकि जितिन के जाने के बाद अगर यह संतुलन बिगड़ेगा तो कांग्रेस हाईकमान की अगली फजीहत का बहाना यही बनेगा.

कैप्टन और सिद्धू के संतुलन का मसला टेड़ा इसलिए भी है क्योंकि सिद्धू चाहते हैं कि वो पंजाब में पार्टी प्रधान बनें. अमरिंदर को यह मंजूर नहीं. अमरिंदर सिंह चाहते हैं कि सिद्धू उनके डिप्टी सीएम बनें तो यह नवजोत सिद्धू को गंवारा नहीं. इन हालात में राहुल और प्रियंका दोनों में से किसको कैसे राजी करते हैं ? और उनके फैसलों पर पार्टी में विरोध भी ना हो. दोनों के लिए ये दो बड़े चैलेंज हैं. अब तक समझा जा रहा था कि भाई-बहन पार्टी हित में कड़े फैसले लेकर पंजाब से पूरे देश की कांग्रेस को स्ट्रांग मैसेज देंगे लेकिन जितिन प्रसाद की चाल ने उनको बैकफुट पर ला दिया है जल्दबाजी में लिया गया उनका कोई भी असंतुलित फैसला पंजाब में नई कलह लाएगा जो हाईकमान को मजूबत करने की बजाए और कमजोर करने का काम करेगा.

राजस्थान में भी लावा अभी धधक रहा है. हालांकि पंजाब में कांग्रेस नेताओं के बीजेपी में जाने के चांस ना के बराबर हैं. क्योंकि किसान और उनका आंदोलन यहां बड़ा मुद्दा है. कांग्रेस का हर छोटा बड़ा नेता किसानों के साथ खड़ा दिखना चाहता है. वो कृषि कानून रद्द करने की मांग का समर्थन कर रहा है. छह महीने बाद गांव में वोट मांगने जो जाना है. ऐसे में कृषि कानून रद्द हुए बगैर अगर कोई बीजेपी में जाता है तो पंजाब में सियासत चमकाने का सपना हो सकता है फिर सपना ही रह जाए. पंजाब और हरियाणा दो ऐसे राज्य है जहां का किसान छह महीने से दिल्ली के बॉर्डर पर आंदोलन कर रहा है. दोनों राज्यों में किसान और खेत से जुड़ा वोटर बीजेपी के खिलाफ है इसलिए मौजूदा हालात में बीजेपी में जाना पैरों पर कुल्हाडी मारने से कम नहीं.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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