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जनसुराज बिहारी राजनीति के स्थिर तालाब में एक कंकड़, पीके पर आरोप तो लगेंगे ही

जनसुराज ने बिहार की राजनीति के स्थिर तालाब में एक कंकड़ जैसी हलचल तो पैदा कर ही दी है. वह फलां पार्टी की बी-टीम है या उसे फलां से पैसा मिल रहा है या यह अमुक की अमुक के खिलाफ साजिश है, जैसे आरोप भी उस पर चस्पां होने लगे हैं. राजनीति में किसी भी गैर-राजनीतिक विरासत वाले व्यक्ति या समूह की एंट्री के साथ ही ऐसे शब्दों से स्वागत किए जाने की रवायत हिन्दुस्तान में पुरानी रही है. जनसुराज और प्रशांत किशोर के लिए भी फिलहाल ऐसे ही शब्दों/आरोपों के इस्तेमाल किए जा रहे हैं. ये आरोप कितने सही हैं, कितने गलत, इस पर अभी कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता है. इसके लिए यकीनन जनता को इंतज़ार करना होगा. आम आदमी वैसे भी जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लेता. मीडिया और बुद्धिजीवी भले ऐसा करते रहे हैं और अक्सर ग़लत साबित होते रहे हैं. बहुत सूक्ष्म विश्लेषण करेंगे, तो राजनीतिक इकोसिस्टम के भीतर एक किस्म का “सत्ता का लौह सिद्धांत” पाएंगे, जहां सब मिले हुए हैं और मिल कर किसी भी नए प्रवेश-उत्साही के लिए दरवाजा नहीं खोलना चाहते. 

एजेंट और बी-टीम आरोपों का संक्षिप्त इतिहास 

अंग्रेज नौकरशाह ए ओ ह्यूम को कांग्रेस की स्थापना का आर्किटेक्ट कहा जाता है और यह भी कि कांग्रेस की स्थापना अंग्रेजों ने अपने सेफ्टी वाल्व के तौर पर की थी. आरएसएस, इसकी एक राजनीतिक शाखा बीजेपी है, की स्थापना करने वाले हेडगेवार के करीबी मित्र और संघ की स्थापना के प्रेरक, बीएस मुंजे के बारे में आपको यह जानकारी आसानी से मिल जाएगी कि इटली जा कर उन्होंने मुसोलिनी से मुलाक़ात की थी और उसकी राजनीतिक पार्टी का सूक्ष्म अध्ययन किया था. फिर भारत की जितनी भी कम्युनिस्ट पार्टियां है, उनका वैचारिक गर्भनाल का संबंध सोवियत रूस और चीन से रहा है. आप ध्यान देंगे, तो पाएंगे कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के मूल अंगरेजी नाम इस तरह है, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया यानी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी. बोलचाल में भले हम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बोल लेते है. इसका एक सरल भावार्थ यह हुआ कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां महज इंटरनेशनल कम्युनिस्ट रिवोल्यूशन की एक शाखा है और आज भी ये रूस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टियों (मार्क्स-लेनिन-माओ) की वैचारिकी पर चलते हैं.

तो क्या ये सब किसी के एजेंट है? क्या ये सब किसी की बी या सी टीम है? आज भी हिन्दुस्तान में ओवैसी हों या केजरीवाल, इन पर किसी न किसी की बी-टीम होने के आरोप लगते रहे हैं. यह अलग बात है कि बी-टीम का आरोप झेलते-झेलते केजरीवाल ने दिल्ली और पंजाब में भाजपा और कांग्रेस को बी अथवा सी ग्रेड की पार्टी बना दिया. अब जा कर कुछ ऐसा ही बिहार में देखने को मिल रहा है, जब प्रशांत किशोर की जनसुराज पर किसी दल के बी या सी टीम होने का आरोप लग रहा है. 

इतिहास भूलना नेताओं की बीमारी या मजबूरी!

नीतीश कुमार हो, लालू प्रसाद यादव हो, रविशंकर प्रसाद हो, सब जानते हैं की कैसे जेपी या मोरारजी भाई देसाई तक को इंदिरा गांधी की तत्कालीन कांग्रेस ने विदेशी एजेंट तक बताया था. ऐसा इसलिए की वर्षों से सत्ता पर काबिज एक राजनीति दल यह मान चुका था कि इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा. तो क्या इतिहास भूल जाना हमारे राजनेताओं की आम बीमारी है या फिर एक मजबूरी? यानी, जो नेता, जो दल खुद किसी न किसी आन्दोलन से निकले हैं, वे आज पीके को बिहार पब्लिक सर्विस कमिशन में हुई धांधली पर संघर्ष कररहे छात्रों के समर्थन में आने के कारण अपना निशाना बना रहे हैं. उन्हें एजेंट या बी-टीम बता रहे हैं. फिर तो इस हिसाब से जब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने दिल्ली के इशारे पर जेपी के ऊपर लाठी चलवाए थे, तो उसे ठीक मान लिया जाना चाहिए? क्या नीतीश कुमार या लालू प्रसाद यादव इस तर्क को मानेंगे? कभी नहीं. मेरा दृढ मत है, जो लालू प्रसाद यादव के मत का ही समर्थन है कि तवा पर रोटी एक तरफ ज्यादा समय तक रह जाए, तो जल जाती है. इसलिए तवे पर रोटी को उलटते-पलटते रहना चाहिए. ऐसे में, एक नया दल, एक नया व्यक्ति, एक नया समूह आ कर इस 20 साल से तवे पर पड़े एक रोटी को बदलने की कोशिश करें, तो क्या उसे किसी की साजिश बता कर खारिज कर देना प्रजातांत्रिक मूल्यों का संवर्द्धन माना जाना चाहिए? 

डेटाक्रेट का पॉलिटिकल होना.. 

प्रशांत किशोर बेसिकली एक डेटाक्रेट हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव से ले कर जनसुराज के निर्माण के बीच, वे राजनीतिक दलों को चुनाव जिताने का ठेका लेते थे. एक हवा सी बनी देश में कि जिसके पास ज्यादा डेटा, वहीं चुनाव जीतेगा और पीके डेटा के मास्टर आदमी. तो नीतीश कुमार ने पहले उन्हें अपने चुनाव के लिए साथ लिया और बाद में अपनी पार्टी में शामिल कराया. पीके हालांकि महत्वाकांक्षी हैं और वे किसी राजनीतिक दल में किसी एक पद से संतोष कर लेने वाले नहीं दिखते. 


जनसुराज बिहारी राजनीति के स्थिर तालाब में एक कंकड़, पीके पर आरोप तो लगेंगे ही

किसी जमाने में बिहार के लिए यह कहानी बड़ी मशहूर थी कि यहाँ बाहुबल के सहारे बूथ कैप्चरिंग कराने वालों का राजनीतिक दलों में बड़ी मांग थी. वाकई ऐसा था भी. बेगूसराय से संभवतः बूथ कैप्चरिंग की कहानी शुरू हुई मानी जाती है. बाद में बूथ कैप्चर कराने वालों को लगा कि जब हम ही इन्हें (नेताओं को) जिताते हैं, तो हम ही खुद क्यों न नेता बन जाए. फिर, 90 के दशक के बाद, आप देखेंगे तो बिहार की राजनीति में अपराधियों की एक बड़ी एंट्री होती है. कोई भी सत्ताधारी दल इस ट्रेंड को रोकने में असमर्थ था, सो उन्हें विभिन्न राजनीतिक दलों में जगह भी मिलती गयी. हालांकि, मैं प्रशांत किशोर की तुलना बूथ कैप्चर करने वालों से नहीं कर रहा हूं, लेकिन ट्रेंड के मुताबिक़, चुनाव जितवाते-जितवाते निश्चित ही प्रशांत किशोर को लगा होगा कि जब मैं दूसरों को जितवा सकता हूँ तो खुद ही क्यों न चुनाव लड़ लूं, पार्टी बना लूं, और आगे ऐसा हुआ भी. यहां एक पेंच है. एक बाहुबली का बूथ कैप्चरिंग से अकेले विधायक-सांसद बन जाना अलग बात है, लेकिन एक डेटाक्रेट का राजनीतिक दल बना कर उसे आगे ले जाना बहुत ही मुश्किल और यह मुश्किल प्रशांत किशोर के सामने भी थी.

यह मुश्किल पैसे या संसाधन की नहीं, रणनीति की थी, परसेप्शन गढ़ने की क्षमता का अभाव के रूप में था. वैनिटी वैन से पहले उन पर जनसुराज यात्रा के दौरान टेंट सिटी बसाने जैसे आरोप भी लगे हैं. वैसे, राजनीति जब परसेप्शन का खेल हो तो परसेप्शन बनते-बिगड़ते कहां समय लगता है? सो, प्रशांत किशोर के पक्ष में भी एक बड़ा परसेप्शन तब बनना शुरू हुआ, जब बिहार पब्लिक सर्विस कमिशन में हुई कथित धांधली के बाद छात्रों का आन्दोलन शुरू हुआ. 

प्रशांत किशोर को मिली है जनता की सहानुभूति

पिछले 2 सालों में प्रशांत किशोर को जनता की वो सहानुभूति नहीं मिली थी, जो उन्हें जनवरी के पहले सप्ताह मात्र में मिल गयी. कारण था एक आन्दोलन. इन पंक्तियों का लेखक पूर्व में भी लिख चुका है कि जब तक पीके सड़क पर नहीं उतरेंगे, बिहार में उनकी सफलता संदिग्ध रहेगी. जैसे ही पीके ने अनशन शुरू किया, परसेप्शन बदलने लगा. जिन मुद्दों के साथ इस लेख की शुरुआत हुई हैं, वैसी ही घटनाएं घटने लगी. सत्ताधारी दल तो उन पर हमलावर हुआ ही, बिहार का विपक्ष (पप्पू यादव सबसे मुखर विरोध में हैं) भी प्रशांत किशोर पर हमलावर हो गया. उन पर बीपीएससी परीक्षा के नाम पर राजनीति करने के आरोप लगने लगे. तो सवाल है कि जिस आयोग की हर दूसरी-तीसरी परीक्षा के पेपर लीक हो रहे हो, परीक्षाएं स्थगित हो रही हो, उस पर कोई राजनीति न करेगा तो क्या भजन-कीर्तन का प्रोग्राम किया जाना चाहिए? और, राजनीतिक दल राजनीति न करेगा, तो क्या वह डाक्टरी करेगा? फिर यह भी कि विपक्ष के नाते जो काम तेजस्वी यादव को करना चाहिए था, जो काम बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह को करना चाहिए था, वह काम प्रशांत किशोर को क्यों करना पडा? तेजस्वी यादव पूरा बिहार घूम रहे है. लेकिन, उन्हें एक बार संघर्ष कर रहे छात्रों के बीच भी जा कर बैठने में क्या दिक्कत थी? 

प्रशांत किशोर की चुनौतियां 

तो दिक्कत यह थी कि प्रशांत किशोर के रूप में एक गैर-राजनीतिक विरासत वाला व्यक्ति या समूह सत्ता के लोहे वाले पिंजरे को तोड़ कर उसमें घुसने की हिम्मत दिखा रहा है. अब, चाहे पप्पू यादव हों, तेजस्वी यादव हों, नीरज कुमार हों, नीतीश कुमार हों, लालू प्रसाद यादव हों या आगे चल कर भाजपा के कोई नेता (जल्द ही सब मिल कर जनसुराज पर हमला बोलेंगे), वो भला सत्ता में एक और भागीदार भला क्यों चाहेंगे? इसलिए, आज सत्ताधारी दल से ले कर विपक्ष तक के लिए प्रशांत किशोर “अपराधी” हैं, लेकिन, यह हमला ही प्रशांत किशोर को मजबूत बनाएगा, बशर्ते वे ऐसे और अधिक से अधिक हमलों के लिए माहौल बनाते रहे और उन हमलों को झेलते रहे. आखिर, नेता का निर्माण ऐसे ही हमलों से होता है. ऐसे हमले एक आन्दोलन, एक बदलाव की सफलता की गारंटी हैं. फिर ये हमले जेपी पर हुए हों या केजरीवाल पर. इतिहास इसका गवाह है. पीके 6 जनवरी को गिरफ्तार न हुए होते, उन्होंने सशर्त जमानत लेने से मना न किया होता और शाम होते होते अपने वकील और नेता कुमार अमित की विधिक समझदारी से बिना शर्त (सरकार की तरफ से कोई शर्त उन्होंने नहीं मानी है, पर्सनल बांड भर कर वे बाहर आए हैं) पुलिस हिरासत से बाहर न निकले होते तो आज पूरे बिहार में प्रशांत किशोर और उनके वकील कुमार अमित की चर्चा न हो रही होती. 

प्रशांत किशोर की आगे की राह

6 जनवरी की घटना के बाद से ही सत्ताधारी दल के प्रवक्ता, विपक्ष सब पीके और उनके वकील कुमार अमित पर हमलावर हैं और यही पीके की पहली नैतिक जीत है और अनायास ही उन्हें रास्ता भी मिल गया कि आगे क्या करना है ताकि ऐसे हमले और तेज हों. आज या कल के बीच वे अपनी अगली रणनीति तय करेंगे. देखते हैं, उनकी नई रणनीति क्या होगी? बहरहाल, पहली नैतिक जीत के बाद भी प्रशांत किशोर के समक्ष अभी भी कुछ चुनौतियां बनी रहेंगी. उन चुनौतियों से पार पाना भी उनके लिए एक बड़ा राजनैतिक टास्क होगा. आइये, एक नजर उन चुनौतियों पर भी डालते हैं. 

प्रशांत किशोर को यह बात हर वक्त याद रखनी होगी कि बिहार, दिल्ली नहीं है. दूसरी दिक्कत उनका सामान्य जाति से होना है. यानी उनका कोई अपना वोट-बैंक न होना है. तीसरी दिक्कत देश में दशकों से चला आ रहा एक इकोसिस्टम है. यह इकोसिस्टम उन बुद्धिजीवियों का है, जो परसेप्शन गढ़ने के मामले में काफी प्रभावी माने जाते रहे हैं. वे अभी तक खुल कर प्रशांत किशोर के समर्थन में नहीं आए है. और सबसे बड़ी बात, खुद प्रशांत किशोर की टीम. उनकी टीम में एकाध चेहरे ऐसे है, जो लगते तो चांद-सितारे हैं, लेकिन उनमें रोशनी मोमबत्ती भर भी नहीं दिखती. अन्यथा, जैसा अनशन और आन्दोलन हुआ, जिस तरह से गिरफ्तारी हुई और बाद हाई वोल्टेज ड्रामा चला, उनके स्टार टीम मेम्बर कहां थे, क्या कर रहे थे, वे सोशल मीडिया पर कौन सा तीर चला रहे थे, कम से कम मुझे न देखने को मिला, न समझने को. मेरी खबर तो यह है कि सशर्त जमानत पर जब बात न बनी तो उनकी टीम के एक बड़े वकील साहब पटना हाई कोर्ट में अपील करने की बात कह घर चले गए थे. वो तो बाद में प्रशांत किशोर की इंटरनल टीम से बाहर रहने वाले और पटना हाई कोर्ट में हाल ही में प्रैक्टिस शुरू करने वाले वकील कुमार अमित ने अपने विधिक ज्ञान का प्रयोग किया और सरकारी शर्त को बिना माने, उन्हें पुलिस हिरासत से बाहर करवा लाए.

ऐसे में, मेहनत, जनसंपर्क और पैसे खर्च करने के बावजूद, प्रशांत किशोर के लिए बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव में एक ठीकठाक सफलता पाना मुश्किल हो सकता है. और बेहतर सफलता के फिलहाल दो ही उपाय उनके समक्ष दिख रहे हैं. पहला कि जिस रास्ते से उन्हें पहली जीत मिली है, उस रास्ते पर अपनी यात्रा की गति बढाएं और दूसरा कि समय-समय पर अपनी टीम की ताकत भी परखते रहे, जांचते रहे और जरूरत पड़ने पर तवा पर पड़ी रोटी को उलटते-पुलटते रहें.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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