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वैलेंटाईन डे स्पेशल : सोनिया गांधी और राजीव गांधी की लव स्टोरी

'पहली बार हमारी नज़रें करीब से मिली. मैं अपने धड़कते हुए दिल की आवाज़ सुन सकती थी. जहां तक मेरा सवाल था, यह पहली नज़र का प्यार था. बाद में राजीव ने मुझे बताया कि उनके लिए भी यह पहली नज़र का ही प्यार था.' राजीव उन्हें घुमाने फिराने ले जाने लगे और कुछ ही दिनों में वे करीब आ गए. वे नदी किनारे पिकनिक मनाने और संगीत कार्यक्रमों में साथ-साथ जाने लगे.

किसी साधारण सी जीवन शैली वाले एक लड़के और एक लड़की के प्यार की छोटी सी ये कहानी किसी रोमांच से कम नहीं और रुहानी अहसास देने वाली है. अगर किसी ने प्यार किया है तो वह इस दौर से जरूर गुजरा होगा भले ही परिस्थितीयां अलग रही हो, लेकिन प्यार का वह पहला अहसास कुछ इसी तरह का होता है जो सोनिया को राजीव के लिए हुआ था.

बात उन दिनों की है जब राजीव कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढाई कर रहे थे और वहीं एक इतालवी लड़की जो कि एक अंग्रेज परिवार की पेइंग गेस्ट के रूप में रहकर पढाई कर रही थी. अपने आप को बहुत अकेला और तन्हा महसूस करती जिसे रह-रहकर अपने घर की याद आती और अंग्रेजों के शहर में अंग्रेजी सही से न आना भी उनके लिए मुश्किल पैदा करता. वह अपने देश इटली के व्यंजनों की तलाश में एक यूनानी रेस्तरां में पहुँच गई जहाँ उसे अपने देश के खाने का स्वाद तो नहीं मिला लेकिन एक लड़का जरूर मिल गया. जिसका नाम था राजीव. वर्सिटी नाम के इस यूनानी रेस्तरां में राजीव से उनकी पहली बार नज़र मिली जहाँ हर शाम कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी अपने मनोरंजन के लिए आते थे. छात्र-छात्राओं के शोर-शराबे के इस माहौल में सोनिया कि निगाहें हमेशा एक युवक पर ही जमी रहती थी, जो बाकि लोगों से अलग दिखता था. सोनिया राजीव के बारे में कुछ इस तरह वर्णन करती हैं कि बडी काली आँखों वाला...बहुत ही मासूम...और मनमोहक मुस्कान वाला.

राजीव भी सोनिया से कुछ कम आकर्षित नहीं थे. उन्होनें ही सोनिया से सबसे पहले बात की और इसके लिए उन्होनें सहारा लिया जर्मनी के रहने वाले एक कॉमन दोस्त का जिसका नाम क्रिश्चियन था. क्रिश्चियन बहुत ही फर्राटेदार इतालवी बोल लेता था. एक दिन लंच के समय उसने सोनिया से राजीव का परिचय करवाया. जिसके बाद निगाहें दो से चार हुई और प्यार परवान चढ गया. हालांकि सोनिया वैलेंटाईन डे जैसे किसी दिन का जिक्र नहीं करती जब राजीव ने उन्हें प्रपोज किया था बल्कि वह उस दिन को ही वैलेंटाईन डे मानती है जब उनके दिल में राजीव के लिए प्यार के अंकुर फूटे थे.

जैसा कि होता है प्यार को उसके मुकाम तक ले जाने की जिद जिसे शादी कहते है राजीव के लिए कम आसान नहीं थी. एक साल बाद राजीव ऑरबैसेनो में सोनिया के पिता से मिलने मैनो निवास पहुँचे. इससे पहले राजीव किसी उधेड बुन में पूरे दिन ऑरबैसेनो शहर के सीटी सेंटर में घूमते रहे. रात में जब उनकी मुलाकात मैनो स्टीफेनो से हुई तो वे सीधे मुद्दे पर आ गए और उन्होनें सोनिया का हाथ माँग लिया. स्टीफेनों स्तब्ध थे क्योकिं विदेशीयों पर उन्हें विश्वास नहीं था लेकिन वह यह बात भली भांति जान चुके थे कि राजीव उनकी बेटी से विवाह करने का संकल्प ले चुके है. स्टीफेनो सोच रहे थे कि उनकी पुत्री भारत में जीवन किस तरह गुजारेगी और उन्होनें राजीव को विचलित करने के लिए प्रेम में डुबे इस युवा जोडे के सामने एक शर्त रख दी कि वे एक साल तक एक दूसरे से नहीं मिलेगें और उसके बाद वह यह फैसला करेगें कि क्या इसके बाद भी वे इकट्ठे ज़िन्दगी गुजारना चाहते हैं. यह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था जिसमें नायक के सामने नायिका का पिता ऐसी शर्त रख देता है जो असंभव सी होती है लेकिन यहाँ प्यार सच्चा था और विश्वास की एक डोर से बंधा जिसमें आविश्वास की रत्तीभर गुंजाईस नहीं थी. एक साल तक एक-दूसरे से दूर रहने की विवशता का दौर राजीव और सोनिया दोनें के लिए ही सबसे कठिन समय था. परंतु एक साल बाद वे एक-दूसरे से पहले से भी अधिक गहराई से प्रेम करने लगे. अपनी बात के पक्के सोनिया के पिता स्टीफेनो के पास अब राजीव की बात न मानने के सिवा कोई विकल्प नहीं था और दोनों की शादी के लिए उन्हें बेमन से राजी होना पड़ा. ये बात अलग है कि अपने अहम के चलते वे अपनी बेटी की शादी में शामिल नहीं हुए लेकिन प्यार की परीक्षा यहीं खत्म नहीं हुई थी. अब सोनिया को इसका सामना करना था जो राजीव कर चुके थे. हांलाकि अपने पत्रों में अपनी माँ को सोनिया के बारे में राजीव बताया करते थे जिसके बाद उनकी माँ इंदिरा सोनिया से लंदन में मिलने के लिए तैयार हो गई जहाँ वह जवाहरलाल नेहरू पर एक प्रदर्शनी का उदघाटन करने वाली थीं. लेकिन सोनिया के मन में इस मुलाकात को लेकर बहुत घबराहट थी. इंडिया हाउस में होने वाली यह मुलाकात नहीं हो सकी क्योंकि रास्ते में ही सोनिया की हिम्मत जवाब दे गई. लेकिन इंदिरा सोनिया की इस मनोदशा को समझती थी सो उन्होनें इसे सहजता से लिया.

दूसरी बार उनकी मुलाकात भारतीय हाई कमिश्नर के निवास पर तय हुई. इंदिरा को यह अहसास हो गया था कि सोनिया अंग्रेजी बोलने में असहज महसूस करती है सो उन्होनें सोनिया से फ्रेंच में बात की जिसमें सोनिया जायदा सहज थी. उस मुलाकात को याद करते हुए सोनिया लिखती है कि 'उन्होनें मुझसे फ्रेंच में बात की, क्योंकि वह जानती थी कि मैं अंग्रेजी की तुलना में इस भाषा में ज्यादा अच्छी तरह बात कर सकती हूँ. वे मेरे बारे में, मेरी पढाई के बारे में जानना चाहती थीं. उन्होनें मुझे बताया कि मुझे डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि वे भी कभी युवा थीं, बेहद संकोची थीं और प्रेम करती थीं, इसलिए वे मेरी स्थिति अच्छी तरह समझती हैं.'

इसके बाद 13 जनवरी 1968 को सोनिया दिल्ली आई. बारह दिन बाद सोनिया और राजीव ने एक सादे समारोह में सगाई कर ली और इंदिरा के परिवारिक मित्रों की सलाह पर बच्चन परिवार में सोनिया ठहरीं. यहीं पर मेंहदी की रश्म हुई और 25 फरवरी 1968 को 1 सफदरगंज रोड के लॉन में दोनों की शादी हो गई. महीना वही था वैलेंटाईन डे वाला यानि कि फरवरी. इस कहानी में रोमांस है, परिवार है, प्रतिष्ठा है और अंत में एक हो जाने की जद्दोजहद के बीच वह बहुत सी कहानियां जो फिल्मों में होती है. देश के सबसे प्रतिष्ठित परिवार गांधी परिवार की विदेशी बहू की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. भोले से मासूम चेहरे वाले, आकर्षक मासूम और मनमोहक मुस्कान बिखेरने वाले भारत के राजीव और इटली की सोनिया की कहानी. जो भारत की बहू बनी और अपने सच्चे वैलेंटाईन के प्यार में सारी जिन्दगी कुर्बान कर दी. NOTE- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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