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ये अनूठी सौगात कहीं रेलवे के 'निजीकरण' की शुरुआत तो नहीं?

कई बरसों बाद भारतीय रेलवे ने कोई ऐसी अनूठी पहल की है, जिसकी तारीफ़ की जानी चाहिए. लेकिन साथ ही ये भी नहीं भूलना होगा कि सरकार जिस तेजी के साथ रेलवे और बड़े स्टेशनों के संचालन के लिए निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाती जा रही है, उसमें एक आम आदमी के लिए रेलवे का सफर करना भी कितना महंगा सौदा बनता जा रहा है.

खैर, नवजात शिशुओं संग ट्रेनों में सफर करने वाली माताओं के लिए रेलवे ने जो सौगात दी है, उसका स्वागत ही करना चाहिए. लेकिन देखना ये होगा कि रेलवे का ये प्रयोग जमीनी स्तर पर कितना कामयाब होता है. इसलिए कि पिछले कुछ सालों में रेलवे ने कई सारे नए प्रयोग शुरू तो किये लेकिन जब वे जमीनी स्तर पर सफल नहीं हो पाए, तो खुद ही हाथ पीछे खींच लिये.

अब रेलवे ने ट्रेनों में बेबी बर्थ की शुरुआत करने का ऐलान किया है. इस सुविधा से माताओं को ट्रेन यात्रा के दौरान नवजात बच्चों को सुलाने में मदद मिलेगी. बीते कल यानी 10 मई से रेलवे ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत दिल्ली- लखनऊ मेल की निचली मुख्य बर्थ के किनारे फोल्ड करने योग्य "बेबी बर्थ" लगाया है. न्यूज़ एजेंसी एएनआई ने बेबी बर्थ की एक तस्वीर भी शेयर की है. बता दें कि यह बर्थ ट्रेन की सबसे नीचे की सीट से जुड़ी है. इसे फोल्ड भी किया जा सकता है. साथ ही बच्चा गिरे न, इसके लिए एक बेल्ट भी दिया गया है. फिलहाल लखनऊ मेल के सिर्फ एक कोच में प्रयोग के तौर पर बर्थ नंबर 12 और 60 में एक बेबी बर्थ की शुरुआत की गई है, ताकि मां अपने बच्चे के साथ आरामदायक यात्रा कर सके. उत्तर रेलवे के एक अधिकारी के मुताबिक यात्रियों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने के बाद इसका विस्तार किया जाएगा.

रेलवे प्रवक्ता के अनुसार इसकी भी ठीक वैसे ही बुकिंग होगी, जिस तरह बुजुर्ग यात्री अपनी निचली सीट के लिए बुकिंग के लिए करते हैं. बुकिंग ऑप्शन के दौरान कोई यात्री अपने शिशु के साथ यात्रा करने का ज़िक्र करता है,तो वह सीट उस यात्री को बेबी बर्थ के साथ अलॉट कर दी जायेगी.रेलवे के मुताबिक इस अनूठी बेबी बर्थ का डिज़ाइन महाराष्ट्र के नंदुरबार में रहने वाले नितिन देवड़े ने किया है, जो पेशे से शिक्षक हैं.

देश की माताओं के लिए रेलवे की इस सौगात की कोई आलोचना नहीं करेगा लेकिन जब रेलवे में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की कोई भी पहल होती है,तब सरकार की नीयत पर विपक्ष के साथ लोगों के भी कान खड़े हो जाते हैं कि ये कहीं पिछले दरवाजे से रेलवे को बेचने की कोशिश तो नहीं है.

अभी पिछले महीने ही ये खबर आई थी कि दिल्ली मेट्रो की तर्ज पर भारतीय रेल भी अपने स्टेशनों के नाम निजी कंपनियों के नाम पर रख सकती है. रेलवे का दावा है कि उसके पास इसे लेकर कई सुझाव आए हैं. सूत्रों के मुताबिक रेलवे अब अपने स्टेशनों के रेट्स को तय कर रहा है. अलग-अलग कैटेगरी के स्टेशन के लिए अलग-अलग रेट रखे जाएंगे. जिन स्टेशनों पर ज्यादा फुट फॉल यानी यात्रियों जी ज्यादा आवाजाही  होती है, उन स्टेशनों के नाम के साथ जुड़ने के लिए निजी कंपनियों को ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे. यह सारी कवायद नॉन फेयर रेवेन्यू के तहत की जा रही है. इसमें किराए या माल भाड़े के अलावा और किस तरह से रेलवे अपनी आमदनी बढ़ा सकता है,इसे उसकी एक कवायद के तौर पर देखा जा रहा है.

दरअसल, सालाना अरबों रुपये का कारोबार करने वाली कंपनियां सरकार के साथ तभी जुड़ती हैं, जहां उन्हें अपना मुनाफा ज्यादा नज़र आता है. इन कंपनियों को लगता है कि मेल, एक्सप्रेस ट्रेनें ज्यादा रफ्तार से चलती हैं और इनके स्टॉपेज भी कम होते हैं, जिसकी वजह से इन ट्रेनों पर विज्ञापन देना फायदे का सौदा नहीं है. लिहाजा, वे अब बड़े व पयर्टन व धार्मिक लिहाज से महत्वपूर्ण स्टेशनों के नाम के साथ अपनी कंपनी का नाम जोड़ना चाहती हैं.लेकिन देखने वाली बात ये होगी कि रेलवे इसके जरिए जो कमाने की सोच रही है,उतनी कमाई कर भी पाती है या नहीं.

दरअसल, रेलवे के निजीकरण करने की शुरुआत होने की खबरें 1 जुलाई 2020 से ही आने लगी थीं,जब तत्कालीन रेल मंत्री पीयूष गोयल ने ट्वीट करके ये बताया था कि," भारतीय रेलवे ने 109 रूटों पर पर 151 उन्नत ट्रेन चलाने के लिए निजी कंपनियों से रिक्वेस्ट फ़ॉर क्वालीफ़िकेशन यानी आरएफ़क्यू आमंत्रित किया है.

इस प्रोजेक्ट का मक़सद रेलवे में नई तकनीक लाना, मरम्मत ख़र्च कम करना, यात्रा समय कम करना, नौकरियों को बढ़ावा देना, सुरक्षा बढ़ाना और यात्रियों को विश्व स्तरीय सुविधाएं देना है." तब रेलवे बोर्ड के चेयरमैन का कहना था कि अप्रैल 2023 में ये सभी निजी रेल सेवाएं शुरू हो जाएंगी. रेलवे की ओर से जारी बयान में के भी कहा गया था कि इस प्रोजेक्ट के तहत रेलवे में निजी क्षेत्र के 30 हज़ार करोड़ रुपए निवेश होंगे. ये भारत के रेलवे नेटवर्क पर यात्री ट्रेनों के संचालन में निजी क्षेत्र के निवेश का पहला प्रयास है.

लेकिन बीते मार्च में ही रेल मंत्री अश्विनी वैश्नव ने कहा था कि रेलवे का निजीकरण नहीं हो सकता है, क्योंकि पटरियां रेलवे की हैं, इंजन रेलवे के हैं, स्टेशन और बिजली के तार रेलवे के हैं. इसके अलावा डिब्बे और सिग्नल प्रणाली भी रेलवे की ही हैं. तो सवाल उठता है कि रेलवे के निजीकरण को लेकर पिछले मंत्री ने जो बयान दिया था, वो झूठा था या फिर मौजूदा मंत्री जो बोल रहे हैं,उस पर यकीन किया जाए? फैसला आपका.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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