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काश! विराट अपनी जिद और टीम की जरूरत का फर्क समझ पाते...

सेंचुरियन टेस्ट मैच में भारत को 135 रनों से हार का सामना करना पड़ा. भारतीय गेंदबाजों के मुकाबले भारतीय बल्लेबाजी एक बार फिर फीकी नजर आई. दक्षिण अफ्रीका ने भारत के सामने चौथी पारी में 287 रनों का लक्ष्य रखा था. भारतीय टीम सिर्फ 151 रन जोड़कर ऑल आउट हो गई. इसके साथ ही दक्षिण अफ्रीका ने टेस्ट सीरीज जीत ली. इससे पहले मेजबान टीम ने केपटाउन टेस्ट मैच में भी जीत हासिल की थी.

सेंचुरियन टेस्ट मैच में भारत को 135 रनों से हार का सामना करना पड़ा. भारतीय गेंदबाजों के मुकाबले भारतीय बल्लेबाजी एक बार फिर फीकी नजर आई. दक्षिण अफ्रीका ने भारत के सामने चौथी पारी में 287 रनों का लक्ष्य रखा था. भारतीय टीम सिर्फ 151 रन जोड़कर ऑल आउट हो गई. इसके साथ ही दक्षिण अफ्रीका ने टेस्ट सीरीज जीत ली. इससे पहले मेजबान टीम ने केपटाउन टेस्ट मैच में भी जीत हासिल की थी.

वक्त आलोचना से ज्यादा विराट कोहली के लिए आत्ममंथन का है. क्या उनकी जिद टीम की जरूरत पर भारी पड़ रही है. ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि किसी कप्तान के जिद्दी होने की चर्चा हो रही हो. धोनी को भी बड़ा जिद्दी कप्तान माना जाता था. फर्क ये है कि विराट कोहली जिस सोच और जिन बयानों से चर्चा में रहते हैं, उसे असलियत में बदलने में वो नाकाम रहे हैं. पहली पारी में उन्होंने शानदार शतक लगाया. बतौर बल्लेबाज उन्होंने साबित किया कि दुनिया के किसी भी मैदान पर कितने ही खतरनाक गेंदबाजों के आगे उन्हें बल्लेबाजी करना आता है लेकिन बतौर कप्तान वो वही गलतियां कर बैठे, जिसका डर था. विराट को अगर लंबे समय तक कप्तानी करनी है तो टीम की जरूरत और अपनी सोच के बीच के बारीक फर्क को सावधानी से समझना होगा.

अजिंक्य रहाणे टीम में क्यों नहीं?

पहले टेस्ट मैच के बाद ही ये सवाल उठा था कि अजिंक्य रहाणे को प्लेइंग 11 में शामिल क्यों नहीं किया गया है. वो टीम के उपकप्तान हैं, लेकिन प्लेइंग 11 का हिस्सा नहीं. विराट कोहली ने पहले टेस्ट मैच के बाद कहा भी था कि उन्होंने मौजूदा फॉर्म के आधार पर टीम चुनी थी, क्योंकि रोहित शर्मा पिछली सीरीज में बेहतरीन फॉर्म में थे इसलिए उन्हें प्राथमिकता दी गई. विराट कोहली का ये तर्क समझ में आता है, लेकिन जब पहले टेस्ट मैच में रोहित शर्मा बुरी तरह फेल हुए तो दूसरे टेस्ट में उन्हें मौका देने की क्या जरूरत थी.

मान लेते हैं कि विराट कोहली ये कहेंगे कि जिस मैच में सभी बल्लेबाज फ्लॉप हुए हों उसमें किसी एक बल्लेबाज को बाहर करने से गलत संदेश जाएगा, तो ये तर्क नहीं पचता. ये तर्क इसलिए नहीं पचता क्योंकि यही विराट कोहली पिछले साल घरेलू टेस्ट सीरीज के एक मैच में अच्छी खासी सफलता के बाद अगले टेस्ट मैच से भुवनेश्वर कुमार को बाहर बिठा चुके हैं क्योंकि उन्हें लगा था कि पिच भुवनेश्वर कुमार के मुफीद नहीं हैं. इसके अलावा ये वही विराट कोहली हैं जिन्होंने कुछ महीनों कहा था कि उन्होंने टीम में हर खिलाड़ी को समझाया है कि टीम सबसे पहले हैं. ऐसे में रोहित शर्मा को भी ये बात बड़ी आसानी से समझाई जा सकती थी.

पार्थिव से क्यों नहीं कराई ओपनिंग

पार्थिव पटेल का एक अच्छा इस्तेमाल ओपनर के तौर पर किया जा सकता था. वो शुरूआत में कम से कम दक्षिण अफ्रीका के तरोताजा गेंदबाजों को थोड़ा थकाने का काम कर सकते थे. विराट कोहली ने अपने बल्लेबाजी क्रम में कोई बदलाव नहीं किया. ऐसा नहीं है कि पार्थिव पटेल ने पहले टेस्ट मैच में ओपनिंग नहीं की है. करियर के 24 टेस्ट मैचों में वो कुछ मौकों पर ओपनिंग कर चुके हैं. उन्होंने जब जब ओपनिंग की है, उनका औसत मिडिल ऑर्डर में बल्लेबाजी से बेहतर रहा है. उन्होंने बतौर सलामी बल्लेबाज 60 से ज्यादा की औसत से रन बनाए हैं. जो उनके करियर औसत 32 का लगभग दोगुना है.

तेज गेंदबाजों के चयन पर सही फैसला नहीं

इस बात में कोई दोराय नहीं है कि अब तक खेले गए दोनों टेस्ट मैचों में भारतीय गेंदबाजी अच्छी रही है. बावजूद इसके तेज गेंदबाजों के कॉम्बिनेशन को लेकर विराट को और सोचने की जरूरत है. मौजूदा दौरे पर ईशांत शर्मा, उमेश यादव, भुवनेश्वर कुमार, मोहम्मद शामी और जसप्रीत बुमराह बतौर तेज गेंदबाज टीम में शामिल हैं. दक्षिण अफ्रीका की पिचों पर भुवनेश्वर कुमार, मोहम्मद शामी और उमेश यादव की तिकड़ी शायद बेहतर विकल्प होगा. ऐसा नहीं कि इन बातों पर चर्चा नहीं हुई होगी लेकिन मुद्दा अटकता है विराट कोहली के फैसले पर. भूलना नहीं चाहिए कि इस दौरे से पहले विराट कोहली ने प्रैक्टिस मैच ना खेलकर सबको चौंकाया था कि वो टीम प्रैक्टिस करना बेहतर समझते हैं. दूसरा उनका बयान बहुत चर्चा में था कि पिच कोई भी हो मानसिक तौर पर तैयार बल्लेबाज हर जगह रन बना सकता है. उनकी बातें गलत नहीं हैं लेकिन उन बातों को जब तक वो साबित नहीं करेंगे तब तक उनसे सवाल किए ही जाएंगे.

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