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गोवा चुनाव: समन्दर वाले प्रदेश में ये 'बैनर प्रदूषण' आखिर किसके लिए होगा फायदेमंद?

देश में प्रदूषण किन चीजों से फैलता है,ये स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा भी हमसे ज्यादा जानता है. लेकिन इस देश की राजनीति में पहली बार ये सुनने को मिल रहा है कि पोस्टर-बैनर भी प्रदूषण फैला सकते हैं,जबकि हर चुनाव से पहले हमें ऐसे सियासी बैनर-पोस्टरों से सामना करने की लगभग आदत-सी पड़ चुकी है. ये अलग बात है कि किसी भी राज्य में होने वाले चुनाव से पहले वहां के अधिकांश लोग न तो इन्हें गंभीरता से लेते हैं और न ही उन पर लिखे गए राजनीतिक पार्टियों के लुभावनी नारों-दावों के जाल में ही इतनी आसानी से फंसते हैं. अपने समंदर से देश-विदेश के पर्यटकों को ललचाने वाला बेहद खूबसूरत प्रदेश है गोवा, जो सियासी हैसियत से तो देश का सबसे छोटा राज्य है लेकिन कहते हैं कि वो मायानगरी मुंबई से कई गुना आगे है क्योंकि वहां आपको रातोंरात अमीर बनाने का ख्वाब दिखाने वाला जुआ यानी कैसिनो गैर कानूनी नहीं है, बल्कि वो आपको अपनी पूरी बाजी जीतने-हारने के किसी भी कानूनी जंजाल में नहीं फंसाता.

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश के साथ ही इस सबसे छोटे राज्य में भी विधानसभा चुनाव का एलान अगले कुछ दिनों में होने वाला है. फिलहाल वहाँ बीजेपी की सरकार है और पहले भी रह चुकी है लेकिन इस बार ममता बनर्जी की टीएमसी के अलावा दिल्ली वाले अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी पहली बार वहां अपनी किस्मत आजमा रही है. चूंकि दोनों ही अपने स्तर पर क्षेत्रीय पार्टियां हैं, लिहाज़ा उनके चुनाव-प्रचार करने का तरीका भी राष्ट्रीय दलों से थोड़ा अलग है. वे अपने बैनर-पोस्टरों के जरिये कुछ ऐसी बात कह जाते हैं, जो लोगों के दिलो-दिमाग में कुछ अलग तस्वीर बना लेती है और वही उनका साइलेंट वोट बैंक बन जाता है, जिसके बूते पर ही ममता पश्चिम बंगाल में और केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पर राज कर रहे हैं.

वैसे तो गोवा विधानसभा में महज़ 40 सीटें हैं लेकिन फिर भी ये तटीय प्रदेश हर सियासी दल के लिये बेहद अहम है.बरसों तक कांग्रेस की ही सत्ता रही लेकिन जब बीजेपी ने यहां अपने पैर पसारने शुरु किये, तो उसने कांग्रेस के भी होश उड़ा दिए कि अल्पमत में होने के बावजूद वो छोटी स्थानीय पार्टियों को ऎसी कौन-सी सियासी घुट्टी पिला देती है कि लगातार सत्ता में बने रहती है.

लेकिन इस बार बीजेपी और कांग्रेस, दोनों के लिये ही मामला कुछ पेचीदा बनता दिख रहा है,लिहाज़ा सत्ताधारी बीजेपी इसे अपने लिये खतरे का बड़ा सिग्नल मानकर चल रही है.अन्य प्रदेशों की तरह गोवा में भी हर पांच साल में विधानसभा चुनाव होते हैं लेकिन वहां के सियासी इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री को ये कहना पड़ा हो कि दो बाहरी पार्टियां वहां 'बैनर प्रदूषण’ (Poster Pollution) फैला रही हैं.बेशक गोवा वह राज्य है,जो देसी-विदेशी पर्यटकों को सबसे ज्यादा अपनी तरफ खींच कर लाता है लेकिन चुनावी मौसम में किसी भी पार्टी के प्रचार को पर्यटन की आड़ में पाबंदी लगाने के फैसले को भला कौन जायज़ ठहरायेगा.

इसके लिए चुनाव आयोग की एक तय आचार संहिता है और जो भी दल उसके खिलाफ जाता है,आयोग अपनी ताकत के हिसाब से उसके खिलाफ कार्रवाई भी करता है.लिहाज़ा,गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने सोमवार को इस बारे में जो फैसला लिया है,उसे राजनीतिक हलकों में बीजेपी के आशंकित डर के रुप में देखा जा रहा है. वहां की राजनीति पर पकड़ रखने वाले विश्लेषक मानते हैं कि ये हड़बड़ी में लिया गया ऐसा फैसला है,जो चुनाव से पहले सत्ताधारी दल की हताशा तो बताता ही है लेकिन चुनाव के वक़्त यही बैकफायर भी कर सकता है.

दरअसल,मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने सोमवार को आम आदमी पार्टी और टीएमसी पर विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में ‘बैनर प्रदूषण’ (Poster Pollution) फैलाने का आरोप तो लगाया ही है. लेकिन साथ ही  उन्होंने अधिकारियों से ऐसे बैनर को लेकर उन दलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश भी दिया है, जो पर्यटन केंद्रित प्रदेश में संपत्तियां और सार्वजनिक स्थानों को कुरूप बना रहे हैं.

प्रमोद सावंत ने सोमवार को जो ट्वीट किया है,उसकी गोवा से लेकर दिल्ली तक में चर्चा इसलिये भी हो रही है कि ऐसा करके उन्होंने ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल को कहीं और ताकतवर बनने का मौका तो नही दे दिया.मुख्यमंत्री सावंत ने अपने ट्वीट में लिखा कि, ‘‘गोवा जो इस चुनाव में एक बहुत बड़ा अंतर देख रहा है, वह बैनर प्रदूषण है जिसे अरविंद केजरीवाल एवं ममता बनर्जी के राजनीतिक दलों ने शुरू किया है. सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति पर पर्चे चिपकाना प्रशासन एवं गोवा की सुंदरता के प्रति खुल्लमखुल्ला अवमानना है.’’

वैसे सियासी गलियारों में सावंत की राजनीतिक परिपक्वता को लेकर भी सवाल इसलिये उठाये जा रहे हैं कि जब अभी चुनाव की तारीख का ऐलान ही नहीं हुआ,तो उससे पहले दो बाहरी दलों के खिलाफ सीधे मोर्चा खोलकर उन्हें तवज्जो देने की आखिर जरुरत ही क्या थी.चुनाव-तारीखों का एलान होते ही आचार संहिता लागू हो जाती है और तब इस इस तरह के मामलों की शिकायत मिलने के बाद चुनाव आयोग ही उससे निपटता है.ऐसे में,सावंत के इस हड़बड़ी में लिए गए निर्णय को एक बड़ी सियासी चूक के बतौर देखा जा रहा है,जिसे अपने पक्ष में भुनाने के लिये ममता और केजरीवाल अपना पूरा जोर लगाने से पीछे नहीं हटेंगे.

कहते हैं कि सियासत एक ऐसा अखाड़ा है,जहां खुद कमजोर होने के बावजूद सामने वाले पहलवान के दिमाग में ये मनोवैज्ञानिक असर डालना होता है कि आप उससे भी ज्यादा ताकतवर हैं.लिहाज़ा, इस चुनावी माहौल में ये सवाल उठना वाजिब भी बनता है कि सावंत इस सियासी मनोविज्ञान को समझने में कहीं पिछड़ तो नहीं गए ?

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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