Opposition Unity: अहंकार पहले कौन खत्म करेगा- सोनिया गांधी या ममता बनर्जी?

Sonia Gandhi vs Mamata Banerjee: देश की राजनीति का इतिहास बताता है कि जब दो महिलाओं का अहंकार सियासी रंजिश में तब्दील हो जाए, तो वो अक्सर राजनीति को उस मुकाम तक ले जाता है, जहां सिवाय तबाही के और कुछ नहीं बचता.पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उस जमाने में जयपुर की महारानी रह चुकीं गायत्री देवी की अदावत को आधुनिक राजनीति में एक-दूसरे के अहंकार का बदला लेने की सबसे बड़ी मिसाल के तौर पर देखा जाता है.
हालांकि फिलहाल सोनिया गांधी और ममता बनर्जी के बीच वैसी दुश्मनी होती तो नहीं दिखती लेकिन पिछले दिनों में मुंबई जाकर ममता ने यूपीए के खात्मे को लेकर जो बयान दिया था. उससे लगता है कि दोनों के बीच अहंकार का वजूद कुछ इतना बढ़ गया है कि संबंधों की खाई को कुछ ज्यादा ही चौड़ा कर दिया है. चूंकि ममता ने जिन हालातों में इस बार अकेले अपने दम पर बंगाल का चुनाव जीता है, उससे उनका कद तो कुछ ऊंचा हुआ ही है लेकिन इस जीत ने उनकी महत्वाकांक्षा को भी पर लगा दिए हैं. लिहाजा, वे 2024 के लोकसभा चुनाव में संयुक्त विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के लिए आतुर हो चुकी हैं. वैसे ममता ये भी जानती हैं कि बगैर कांग्रेस के ये मुमकिन हो भी नहीं सकता और वे इससे भी बखूबी वाकिफ हैं कि कांग्रेस के कुछ नेता गांधी परिवार को भड़काकर उनकी उम्मीदों के पूरा होने में रोड़ा डालने से बाज़ नहीं आने वाले, इसीलिए वे विपक्षी खेमे में ही एक तरह से दबाव की राजनीति कर रही हैं.
ममता की उसी सियासत को भांपते हुए विपक्षी एकता को बचाए रखने की कमान संभालने के लिए सोनिया गांधी को ही आगे आकर मोर्चा संभालना पड़ा. मंगलवार को सोनिया गांधी ने अपने आवास पर विपक्ष के कद्दावर नेताओं को न्योता दिया और उनके साथ मंत्रणा करके ये रास्ता तलाशने की कोशिश करी कि आखिर ममता बनर्जी को कैसे समझाया जाए और उन्हें समझाने की जिम्मेदारी कौन अपने कंधों पर लेगा. चूंकि सोनिया भी इस हकीकत से वाकिफ हैं कि संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले ममता दिल्ली आईं लेकिन उनसे मुलाकात किए बगैर जिस तरह से वापस लौट गईं, उसके सियासी मायने साफ हैं कि वे अब उन्हें या कांग्रेस को तवज्जों देने के मूड में नहीं हैं.
सोनिया के यहां हुई बैठक के बाद दावा तो यही किया गया कि इसमें संसद की कार्यवाही को लेकर सरकार के बर्ताव और राज्यसभा से 12 विपक्षी सदस्यों के निलंबन व उनकी माफी मांगने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई. इस बैठक में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार, नेशनल कान्फ्रेंस के मुखिया फारूक अब्दुल्ला, शिवसेना नेता संजय राउत, डीएमके सांसद टीआर बालू, कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, केसी वेणुगोपाल और राहुल गांधी जैसे नेता मौजूद रहे.बताया गया कि प्रदेशों में विपक्षी एकजुटता को और मजबूत करने की रणनीति बनाने पर चर्चा हुई.
लेकिन सूत्रों की मानें, तो इस बैठक का मुख्य मकसद यही था कि बेलगाम होती ममता बनर्जी पर लगाम कसने का फार्मूला क्या हो, ताकि विपक्षी एकता में बिखराव की दरार कहीं और गहरी न हो जाए. बताते हैं कि बैठक में सबकी राय जानने के बाद लुब्बेलुबाब यही निकला कि मौजूदा सियासी माहौल में ममता बनर्जी सिवाय एक वरिष्ठ नेता के किसी और की बात नहीं सुनने वाली हैं. लिहाजा तय किया गया कि एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ही ममता को समझाएंगे कि वे इस तरह के बयान देने से खुद को रोकें कि "अब यूपीए का कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया है और यह भी कि कांग्रेस के बगैर भी विपक्षी एकता हो सकती है."
गौरतलब है कि पीएम उम्मीदवार बनने की दौड़ में लगी ममता विपक्ष की तमाम क्षेत्रीय पार्टियों के प्रमुख नेताओं से मुलाकात कर अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी हुई हैं. इसी मकसद से उन्होंने हाल ही में मुंबई में शरद पवार और शिवसेना सुप्रीमो व महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे एवं संजय राउत से मुलाकात की थी.उसके बाद ही ममता ने ये बयान दिया था कि अब यूपीए अस्तित्व में ही नहीं है.
दरअसल, ममता को लगता है कि देश में एक मजबूत व वैकल्पिक ताकतवर विपक्ष के रुप में कांग्रेस अपनी पहचान बनाने में नाकाम रही है. इसलिए वे इस विकल्प की कमान अपने हाथ में लेना चाहती हैं. यही वजह है कि ममता ने 1 दिसंबर को मुंबई में शरद पवार व ठाकरे से हुई मुलाकात के बाद कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उसे नसीहत देने की हिम्मत भी की थी. तब ममता ने नाम लिए बगैर ही राहुल गांधी पर ये कहते हुए निशाना साधा था कि "अगर कोई कुछ करते नहीं हैं, विदेश में रहते हैं, तो ऐसा कैसे चलेगा." कांग्रेस की इसी निष्क्रियता वाले रवैये की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने ये भी कहा था कि इसलिए हमें बंगाल से निकलकर कई दूसरे राज्यों में जाना पड़ा. तब ममता के इस बयान की तारीफ करते हुए शरद पवार ने कहा कि "सीधी बात है. आज पश्चिम बंगाल में ममता की जो जीत हुई है, वो फील्ड में रहकर ही हुई है. लाखों कार्यकर्ताओं की मेहनत से ही जीत हुई है. हम उनके बयान का स्वागत करते हैं." पवार का वह बयान ही कांग्रेस के लिए खतरे का सबसे बड़ा संकेत समझा गया और विपक्षी खेमे को बूंदी के लड्डू की तरह बचाये रखने के लिए आखिरकार सोनिया को ही पहल करनी पड़ी.
वैसे महाराष्ट्र की महाअघाड़ी सरकार में एनसीपी और कांग्रेस, दोनों ही शिव सेना के सहयोगी हैं लेकिन जब बात सत्ता की हो. तब इन तीनों में से कोई भी ये नहीं चाहेगा कि ममता के किसी बयान से आपस में मनमुटाव इतना बढ़ जाए कि नौबत सरकार गिरने-गिराने तक आ जाए. जाहिर है कि पवार राजनीति के सबसे अनुभवी व मंझे हुए खिलाड़ी हैं. लिहाजा उन्होंने सोनिया-राहुल गांधी समेत कांग्रेस के अन्य नेताओं की शिकायतों को गौर से सुना भी होगा और उनके जख्मों पर मरहम लगाने के लिए खुद ही आगे बढ़कर ये भी कहा होगा कि ममता को समझाने की जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ दीजिए लेकिन कांग्रेस की तरफ से भी ऐसा कोई बयान न आए, जिससे बंगाल की शेरनी खुद को आहत महसूस करने लगें.
बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि अपने राज्य के मजबूत प्रादेशिक दल अपने-अपने राज्यों में विपक्ष के तौर पर मजबूती से सामने आएं. इसको लेकर साझा रणनीति बनाने पर भी चर्चा हुई. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि विपक्षी एकता को बचाए रखने के लिए अपना अहंकार पहले कौन खत्म करेगा-सोनिया गांधी या ममता बनर्जी?
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