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साम्प्रदायिक बनाकर रख दी गई छत्रपति शिवाजी महाराज की छवि, आगरा किले में जयंती मनाने का फैसला बेतुका

छत्रपति शिवाजी महाराज को कुछ समय के लिए आगरा किले में कैद किया गया था. ये हमारे इतिहास का एक हिस्सा है. ये किला मुगलों का बनाया हुआ है. जब राजधानी को दिल्ली से यहां शिफ्ट किया गया था और अकबर ने तो यहीं से शासन किया था. वास्तव में, दिल्ली तो औरंगजेब की राजधानी रही, लेकिन वो शिवाजी को कैद तो आगरा में किया गया वो तो हमारे इतिहास का हिस्सा है लेकिन ये बात समझना होगा कि इससे शिवाजी की जयंती का क्या संबंध होगा. जयंती वहां मनाई जाती है जो बहुत खुशी की जगह हो या फिर वहां जहां कोई व्यक्ति का जन्म स्थान हो या किसी और ऐसी काम हो जहां कैद किया हो वहां मनाइए तो समझ में आता है लेकिन किसी ऐतिहासिक मॉन्यूमेंट्स हैं इनमें अगर आप ये सिलसिला शुरू कर देंगे तो इसका कोई अंत नहीं है.

फिर आप कहीं और करेंगे. कोई मुगलों का मनाना चाहेगा फिर शाहजहां का बर्थडे मनाइए दिल्ली के लाल किले में. देखिए हिस्टोरिकल मॉन्यूमेंट्स का अपना एक अहमियत है. एएसआई ने क्यों परमिसन दिया मुझे इस पर आश्चर्य है क्योंकि इस तरह के मॉन्यूमेंट्स में पब्लिक प्रोग्राम नहीं होने चाहिए और हो भी तब जब कोई रेलेवंस हो. यहां कोई रेलेवंस ही नहीं है. ये तो समझ ही नहीं आ रहा कि क्यों ये महाराष्ट्र सरकार करना चाहती है और क्यों आगरा के किले को शिवाजी की जयंती से जोड़ रही है. ये वहीं जानते हैं.

नहीं होने चाहिए पब्लिक प्रोग्राम्स

शिवाजी की बहादुरी को आप सेलिब्रेट किजिए इसमें कोई शक नही है. ये भी सत्य है कि उनको वहां कैद करके रखा गया था लेकिन वो सब इतिहास का हिस्सा है. लेकिन फोर्ट के अंदर जयंती मनाने का कोई तर्क समझ नहीं आ रहा है सिर्फ इसलिए की उनकों यहां कैद करके रखा गया तो जयंती मनाने का कारण थोड़े ही न हुआ. तो मुझे तो समझ नहीं आ रहा वो कहावत है न पेंडुलम बॉक्स वाला वैसे आप एक बार शुरू कर दीजिए फिर तो उसके बाद हर ऐतिहासिक स्थल पर कोई न कोई आयोजन करना चाहेगा. 

सबका इतिहास के किसी न किसी के साथ संबंध है तो आप कब तक करते रहेंगे ये. मुझे यही लगता है कि ये निर्णय अजीब सा है. देखिये, इतिहास का हमारे जीवन में महत्व है लेकिन आजकल इतिहास के बारे में जो भी कुछ किया जा रहा है वो हम देख ही रहे हैं.

आज का जो इतिहास है उसकी खासकर के राजनीतिक जरूरतें ज्यादा हैं उसमें इस्तेमाल होता है. इतिहास को इतिहास की तरह कोई नहीं पढ़ता है. 16वीं और 17वीं शताब्दी में क्या हो रहा था उसका आज के संदर्भ में क्या महत्व है वो बात आ जाती है.

मराठा मानते हैं शिवाजी को हीरो

शिवाजी ने तो बहुत सारी लड़ाईयां लड़ी और वो इतिहास का हिस्सा बन गए. आप उसको कैसे देखते हैं, क्यों देखना चाहते हैं ये तो आज की राजनीति तय करते है. इतिहास का कौन सा हिस्सा आपको याद रखना है और कैसे रखना है. देखिये सबको अपने हिरो की तलाश होती है. शिवाजी एक हीरो हैं मराठा अपना उन्हें हीरो बनाते हैं. लेकिन शिवाजी के जीव ने में बहुत सी चीजें और हुईं थीं, सिर्फ बहादुरी नहीं थी. वो कैसे शासक थे, किस तरह से शासन करते थे, भेदभाव नहीं रखते थे.

सांप्रदायिक जो छवि आज बनाकर रख दी गई है शिवाजी की वो उनकी छवि नहीं थी. शिवाजी के सेना में और धर्मों के लोग थे खासकर के मुसलमान जो युद्ध लड़ते थे, तो उसकी बात आज क्यों नहीं करता है कोई. वो भी तो करना चाहिए. वो भी तो शिवाजी के जीवन का हिस्सा है. उसी तरह नॉर्थ इंडिया में महाराणा प्रताप के साथ होता है. राजपूतों की सम्मान की बात है तो सिर्फ राजपूतों के लिए महाराणा प्रताप थोड़ी न लड़ रहे थे. वो तो जो मुगल आधिपत्य है उसको चैलेंज कर रहे थे. उसमें बहुत सारे मुसलमान शामिल थे. उनकी एक बटालियन का हेड मुसलमान था. तो ये लड़ाईया सांप्रदायिक तो थी हीं नहीं. इसे सांप्रदायिक तो हमने बना दी. वे लोग तो अपने साम्राज्य और पावर के लिए लड़ाई लड़ रहे थे. उसमें सब लोग शामिल थे. मिली जुली लड़ाई थी. 

मुगल बादशाह थे उनको चैलेंज कर रहे थे. तो ये सब इतिहास में होती रही हैं और आज हम इन्हें बिल्कुल अलग नजरिए से देखते हैं. ये दुख की बात है कि हमने शिवाजी और महाराणा प्रताप को सांप्रदायिक बनाकर रख दिया है. ये उनकी छवि नहीं थी. अगर आप उनको मराठा योद्धा कह कर, सांप्रदायिक योद्धा करके जयंती मना रहे हैं तो आप शिवाजी के साथ अन्याय कर रहे हैं.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. ये आर्टिकल संजीव श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित है. ये आर्टिकल इतिहासकार इरफान हबीब से बातचीत पर आधारित है.)

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