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ब्लॉग: 'वन नेशन वन इलेक्शन' सत्ता पक्ष और विपक्ष

वन नेशन वन इलेक्शन पर मोदी सरकार एक्शन में आ गई है। इसे लेकर सर्वदलीय बैठक हुई। हालांकि इसे लेकर विपक्ष का विरोध सामने आया है। किस तरह इन बाधाओं से पार पाएगी सरकार, ये बड़ा सवाल है।

विविधता में एकता भारत की व्याख्या इसी तर्ज पर होती आई है लेकिन अगर सियासी और चुनावों के लिहाज से इस विविधता को देखें तो कई चुनौतियां हैं। जिसमें चुनाव का खर्च, सरकारी खजाने पर बोझ और आचार संहिता की वजह से लगने की वजह से विकास के कामों पर ब्रेक जैसे बड़े मुद्दे शामिल हैं, जिन्हें लेकर मोदी सरकार लगातार मंथन कर रही है और मान कर चल रही है कि सभी दलों और राज्यों की सहमति बनी कम से कम विकास के लिहाज से वन नेशन, वन इलेक्शन का फैसला होता है तो ये राष्ट्रहित में होगा। हालांकि सरकार से अलग विपक्ष की अपनी चिंताए हैं इनमें सपा, डीएमके और टीएमसी जैसे क्षेत्रीय क्षत्रप हैं तो वहीं बीएसपी और वाम दलों जैसे राष्ट्रीय संगठन भी, व्यावहारिक तौर पर ये लोग इस फैसले के विरोध में है। इन सभी की दलील है कि फैसले से संघीय ढांचा बदल जाएगा। इसके साथ मुद्दों के साथ होने वाली प्रदेश की सियासत को लेकर भी विपक्ष के दल फिक्रमंद हैं जबकि इस मसले पर आगे बढ़ने के लिए सरकार के लिए संविधान संशोधन भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।

वन नेशन, वन इलेक्शन को हकीकत बना पाएंगे मोदी ?

मायावती, ममता और अखिलेश जैसे विरोधियों को कैसे समझाएंगे पीएम ?

एक चुनाव के संवैधानिक पेंचों से कैसे निपटेगी मोदी सरकार ?

लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर ओम बिड़ला की ताजपोशी से गदगद मोदी सरकार की फिक्र अब वन नेशन, वन इलेक्शन है। जिसके लिए पीएम मोदी की अगुवाई में बैठक बुलाई गई, इस कवायद का मकसद बेहद साफ है कि देश में राज्यों के विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनावों को एक ही वक्त पर कराया जा सके।

सरकार की इसके पीछे मंशा चुनावों के खर्चों से बढ़ने वाला बोझ कम करना है और आचार संहिता के चलते वक्त की कमी चुनौतियों से बचते हुए विकास की रफ्तार को बरकरार रखना है। सरकार की इस कवायद को बीजेपी और उसके सहयोगी नेक इरादा मान रहे हैं।

वहीं उत्तर प्रदेश में भी वन नेशन, वन इलेक्शन को लेकर तैयारी की जा चुकी है। इसको लेकर सीएम योगी के निर्देश पर बनी कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट सौंप दी है।

यूपी में भले ही तैयारी हो मगर यूपी की दो बड़ी पार्टियों सपा और बसपा ने बैठक में जाने से इनकार कर दिया है। बसपा ने तो इसे छलावा बताया है।

सपा, बसपा ही नहीं बल्कि टीएमसी, टीडीपी और डीएमके के साथ ही वाम दलों ने इसके ख़िलाफ मोर्चा खोल दिया है। इन पार्टियों ने दलील दी है कि फैसला अव्यावहारिक है और ये प्रेंसिडेशियलशिप की ओर ले जाने वाला है।

दूसरी तरफ एनसीपी बैठक में हिस्सा लेने को तैयार हुई मगर वो इसे व्यावहारिक मानने को तैयार नहीं है। वैसे मोदी सरकार की चुनौती सिर्फ विरोधियों को मनाना ही नहीं बल्कि संविधान से जुड़ी पेंचीदिगियों को भी दूर करना होगा क्योंकि 1957 के बाद से एक देश, एक चुनाव का मौका नहीं आया। लंबे समय से अव्यावहारिक हो चुकी प्रकिया को वापस पटरी पर लाना इतना आसान नहीं है क्योंकि इसके तहत कई राज्यों की सरकारों का न केवल कार्यकाल बढ़ाना होगा बल्कि कई का समय से पहले खत्म करना होगा जिसे लेकर राज्य सहमत होंगे, इसे लेकर शक है।

इसके अलावा संविधान में संशोधन की स्थिति में सरकार जरूरी समर्थन सदन में जुटा पाएगी। खास कर राज्यसभा में। फिलहाल आसान नहीं दिखता। हालांकि सरकार के लिए राहत ये है कि इसे लेकर होने वाली विपक्ष की बैठक भी रद्द हो गई यानी मसले पर विपक्ष भी एकजुट नहीं है लेकिन फिर भी कई सवाल हैं।

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