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Blog: फूड सिक्योरिटी एक्ट हाथ बांधे पड़ा है, हम आजादी का आनंद उठा रहे हैं

पार्टियों की घेराबंदी में लहूलुहान पीढ़ी टीले पर भूखी खड़ी है. झारखंड की 11 साल की संतोषी भूख से ही मरी, यह साबित हो चुका है. भूख हमारा सच है, विश्व का हंगर इंडेक्स भी यह ऐलान कर चुका है. हम दुनिया के चंद बहुत भूखे देशों में शामिल हैं. हमारा नंबर हंगर इंडेक्स में 100वां है. रवांडा और जिबूती के बराबर. राइट टू फूड आंखें तरेरे खड़ा है. फूड सिक्योरिटी एक्ट हाथ बांधे पड़ा है. हम आजादी का आनंद उठा रहे हैं.

तिस पर एक खबर और आई है. मेडिकल जरनल लांसेट में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व में पिछले चार दशकों में पांच से 19 साल के बीच के बच्चों में ओबेसिटी यानी मोटापा दस गुना बढ़ गया है. अगर यही ट्रेंड चालू रहा तो 2022 तक अंडरवेट बच्चों की तुलना में मोटे बच्चों की संख्या अधिक हो जाएगी. पर दुनिया जहां जाएगी, हम उसके उलटे चलेंगे. हमारे यहां ओवरवेट बच्चे गिने-चुने हैं. पर अंडरवेट बच्चे इतने अधिक हैं, जितने किसी दूसरे देश में नहीं हैं. 97 मिलियन बच्चे भारत में अंडरवेट हैं. हर पांच में से एक बच्ची अंडरवेट है. शारीरिक और मानसिक रूप से अविकसित यानी जिसे मेडिकल भाषा में स्टंटेड ग्रोथ कहा जाता है, ऐसे बच्चों की संख्या भी 48.2 मिलियन है. यह दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप के चौथे सबसे बड़े देश कोलंबिया की कुल जनसंख्या के लगभग बराबर है.

डॉक्टर कहते हैं, कुपोषित, स्टंटेड बच्चों का बीमार होना बहुत आसान होता है. यही वजह है कि हमारे देश में 21 में से एक बच्चा अपना पांचवां जन्मदिन नहीं मना पाता. पांचवां जन्मदिन मनाने से पहले ही वह मौत का शिकार हो जाता है. यूनिसेफ का कहना है कि दुनिया में बच्चों की मौतों के 50 परसेंट मामलों का जिम्मेदार कुपोषण है. कुपोषण यानी अच्छा, सेहतमंद खाना न मिलना. इसमें अच्छा क्या, बुरा क्या... खाना न मिलना शामिल नहीं है. हमारे यहां तो जैसे-तैसे सूखा भात मिल जाए, यह भी एक नेमत ही है. इसीलिए अपना देश बालपन के लिए खतरा है.

बच्चों के लिए काम करने वाली एक इंटरनेशनल एजेंसी ‘सेव द चिल्ड्रन’ की रिपोर्ट स्टोलेन चाइल्डहुड में कई कारणों से भारत को बच्चों के लिए खतरनाक बताया गया है. कुपोषित बच्चों के अलावा भारत में बाल मजदूरों की संख्या भी काफी ज्यादा है. अगर कुपोषित बच्चे जोखिमपूर्ण श्रम करेंगे तो उसका नतीजा क्या होगा? यहां 31 मिलियन बच्चे वर्कफोर्स का हिस्सा हैं. इसीलिए दुनिया में जो देश बच्चों के लिए खतरनाक हैं, उन 172 देशों की सूची में हमारा नंबर 116 वां है. क्या फर्क पड़ता है, सरकार किसी की भी हो, राज्य कोई भी हो भूखा, भूखा ही रहता है.

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आंकड़े एक से एक हैं. आप बताइए, ढेर लग जाएगा. हर दिन एक नया डॉक्यूमेंट और नए निष्कर्ष. सरकारी डॉक्यूमेंट्स भी हैं, लेकिन संतोषी या उसके जैसे दूसरे बच्चे उन डॉक्यूमेंट्स के पन्ने चबाकर पेट नहीं भर सकते, जिसमें लिखा है कि सरकार राज्यों को कितनी मदद देती है. परसाई दद्दा ने लिखा था, इस देश का आदमी मूर्ख है. अन्न खाना चाहता है. भुखमरी के समाचार नहीं खाना चाहता. हम भी समाचार ही दे रहे हैं, वह भी बासी, सड़ांध भरा. परेशानी यह भी है कि भोजन हमारा हक तो है पर मौलिक अधिकार नहीं. संविधान के नीति निदेशक तत्वों में शामिल है, जिसके लिए किसी सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता. विपक्ष सरकारी नीतियों को दोषी ठहराता है, सरकार बीच-बचाव करती है. हम ठगे से खड़े रहते हैं.

पीछे यह भी पता चला है कि महिला और बाल विकास मंत्रालय एक नया प्रस्ताव लेकर आया है. आंगनबाड़ियों में टेक होम राशन की जगह बच्चों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली औरतों को कैश मनी दिया जाए. भारत में कुपोषण की स्थिति को देखते हुए यह कितना मुफीद होगा. राशन देना आईसीडीएस यानी एकीकृत बाल विकास सेवा की पोषण योजना है और दुधमुंहे बच्चों और औरतों की सेहत के लिए बहुत जरूरी है. इस समूची योजना के लिए केंद्र सरकार हर साल 16,000 करोड़ रुपए खर्च करती है और राज्य सरकारें भी उतना ही पैसा. इतने पैसे को भी कैलकुलेट किया जाए तो गर्भवती और स्तनपान कराने वाली औरतों पर प्रति औरत 7 रुपए और छोटे बच्चों पर प्रति बच्चा 6 रुपया खर्च होता है. इतने पैसे में उन्हें खाना इसलिए मिल पाता है क्योंकि खाना भारतीय खाद्य निगम सबसिडाइज्ड दरों पर मुहैय्या कराता है.

राशन की बजाय पैसा देने से यह पोषण किस हद तक प्रभावित होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है. पैसा कहीं भी खर्च हो जाएगा, क्या जरूरी है कि खाने के लिए ही हो. खास तौर से औरतों और उनके नन्हें बच्चों के लिए. फूड एक्टिविस्ट्स का कहना है, टेक अवे राशन में पौष्टिक चीजें मिली हुई होती हैं. इनकी जगह पैसे देने से ऐसे लोगों की खाने की थाली से एडिशनल न्यूट्रिशन गायब हो सकता है. वैसे खाना खरीद भी लें, तो महंगाई बढ़ने पर क्या होगा, वह राशि भी बढ़ाई जाएगी, कैश एनटाइटिलमेंट्स में इसका जिक्र नहीं है. वैसे डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर का बोलबाला है. फूड सिक्योरिटी एक्ट भी कहता है कि केंद्र और राज्य सरकारों को कैश ट्रांसफर करने की योजनाएं बनानी चाहिए. चूंकि पीडीएस के तहत राशन बांटने में परिवहन और स्टोरेज वगैरह पर काफी खर्च हो जाता है. खर्च बचाना है, हर जगह से. ताकि अच्छी नीतियां बनाई जा सकें, पर किसके लिए-मालूम नहीं. संतोषी के घर वालों से इसका जवाब पूछा जा सकता है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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