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BLOG: वाराणसी में प्रियंका गांधी का यह 'सरप्राइज मूव' बीजेपी के लिए संकट पैदा कर सकता है!

ट्वीट से स्पष्ट है कि प्रियंका गांधी ने गलती की है. लेकिन सियासी संदेह की पाठशाला कहती है कि सियासत में सबकुछ यूं ही नहीं होता.

रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं---तुम्हें बताऊं यह कि कूटनीतिज्ञ कौन है? वह जो रखता याद जन्मदिन तो रानी का, लेकिन, उसकी वयस(उम्र) भूल जाता है.

आज कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कश्मीरियों को नवरेह की जगह गलती से नवरोज की शुभकामनाएं दे दीं. इसके बाद ट्विटर पर लोगों ने याद दिलाया कि आज नवरोज नहीं नवरेह है. ट्विटर पर तमाम लोग मजाक उड़ाते हुए बताने लगे कि आपके दिवंगत दादा फिरोज गांधी पारसी थे और दिवंगत जवाहर लाल नेहरू कश्मीरी पंडित, फिर भी आपको नवरोज और नवरेह में अंतर नहीं पता.

ट्वीट से स्पष्ट है कि प्रियंका गांधी ने गलती की है. लेकिन सियासी संदेह की पाठशाला कहती है कि सियासत में सबकुछ यूं ही नहीं होता. अब सवाल यह है कि कहीं जानबूझकर किसी रणनीति की तहत ये गलती तो नहीं की गई है. क्योंकि सोशल मीडिया पर अब सियासी युद्ध शुरू हो चुका है. अब यहीं ध्यान देने वाली बात है कि इसी सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैलायी जाती रही है कि गांधी परिवार के पूर्वज मुसलमान थे. अब वे ही लोग प्रियंका गांधी के ट्वीट के सहारे पारसी बताने में जुट गये हैं. ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस ट्वीट में भगवान विष्णु की तस्वीर है. इस तरह एक चूक के जरिए कहीं सोशल मीडिया पर उपस्थित अपने विरोधियों के जरिए ही प्रियंका गांधी ने खुद के मनमुताबिक नरेटिव तो सेट नहीं करा दिया.

अब ट्वीट की भाषा देखिए.. और अपनत्व की पराकाष्ठा एक और आशंका को जन्म देती है. पारसी समुदाय भारत में बेहद धनी माना जाता है. कांग्रेस के भीतर यह चर्चा रहती है कि पारसी समुदाय आर्थिक रूप से कांग्रेस को काफी मदद करता रहा है. 2004 से 2014 तक के दौर में इस समुदाय ने कांग्रेस में खुद को अपेक्षित महसूस किया और धीरे-धीरे कांग्रेस से छिटककर बीजेपी के साथ चला गया. उदाहरण के जरिए समझना तो ध्यान दीजिए रतन टाटा को गुजरात में मोदी ने खुले दिल से गले लगाया और मौका दिया. अब प्रियंका गांधी के इस ट्वीट की भाषा को एक बार फिर पारसी समुदाय को अपने तरफ जोड़ने की पहल भी माना जा सकता है. खैर.. यह सिर्फ संभावनाएं हैं. सच्चाई खुद प्रियंका गांधी जानती होंगी.

प्रियंका के इस चूक से उनकी सियासत को समझिए

अब जरा इस बात पर ध्यान दीजिए... कि लोकसभा चुनाव से महज ढाई महीने पहले सक्रिय राजनीति में प्रियंका गांधी का आना और महासचिव बनने के साथ ही प्रधानमंत्री के इलाके की चुनौती भरी जिम्मेदारी का लेना. अब इसे समझने के लिए आपको एक उदाहरण से समझाते हैं. मान लीजिए किसी पहाड़ी पर आपके पास मशीनगन है. आप दूर से सैकड़ों दुश्मनों को सही रणनीति से मार सकते हैं. क्योंकि आप अपने दुश्मनों को स्पष्ट रूप से देखते हैं. लेकिन आपके सामने अचानक 20 मीटर दूरी पर बायें तरफ 20 ही दुश्मन हों, उन्हें मारने के लिए एक बार फिर आपको अपना मशीनगन ट्राईपॉड से उतारना या मोड़ना होगा. इसमें वक्त लगता है और महज 20 दुश्मन को मारना, दूर खड़े और स्पष्ट दिख रहे सैकड़ों दुश्मनों को मारने से ज्यादा कठिन हो जाएगा.

अब शायद आप आसानी से समझ पाएंगे कि बीजेपी की पूरी रणनीति राहुल गांधी पर फोकस थी. यदि प्रियंका गांधी सक्रिय राजनीति में पहले आ गईं होतीं तो बीजेपी के पास इनके खिलाफ तैयारी करने का पूरा मौका होता. और आसानी से प्रियंका फैक्टर पर बीजेपी भारी पड़ जाती. अब प्रियंका गांधी को पूर्वांचल की जिम्मेदारी और केरल के वायनाड से राहुल गांधी के चुनाव लड़ने के निर्णय को ध्यान से देखें तो कई बातें बेहद स्पष्ट हो जाती हैं. केरल जाने के निर्णय की टाइमिंग को देखिए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस वहां भी बीजेपी समेत अन्य दलों को तैयारी का कोई मौका नहीं देना चाहती थी. हुआ भी यही.. केरल जाने के निर्णय के पीछे एक वजह यह भी हो सकती है कि सहयोगी दलों और स्थानीय क्षत्रपों से ब्लैकमेल होकर कांग्रेस परेशान हो चुकी है. उसकी रणनीति अब इससे पीछा छुड़ाने की है. इसीलिए राहुल गांधी को वहां से उतारकर कांग्रेस दक्षिण में पहले से और मजबूत अवस्था में उपस्थित होने की तैयारी में जुटी है.

उत्तर भारत में प्रियंका गांधी बिल्कुल नये चेहरे की तरह हैं. दूसरी बात कि उत्तर भारत में मजबूत बीजेपी के विकल्प के रूप में कांग्रेस को लाने के लिए प्रियंका रणनीतिक लड़ाई लड़ रही हैं. इसके तहत पिछले लेख में बताया था कि कांग्रेस क्षत्रपों को कमजोर करके खुदके नंबर बढ़ाने पर फोकस करेगी. जिन राज्यों में कांग्रेस और बीजेपी के बीच आमने-सामने लड़ाई नहीं हैं वहां पर कांग्रेस नंबर दो या नंबर तीन आने के लिए प्रयासरत है. सीटें भले ना बढ़ें कम से कम वोट प्रतिशत इतना जरूर बढ़े कि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस या तो खुद बीजेपी के सामने विकल्प के तौर पर तैयार हो जाए या जोरदार मोलभाव कर सके.

क्या वाराणसी से लड़ेंगी चुनाव? पहली चर्चा यह है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने वाराणसी के हर बूथ स्तर पर जाति, धर्म, आयु के आधार पर आंकड़ें मंगाए हैं. तमाम ट्रेडर्स और ग्राम स्तर पर पुराने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के नाम और नंबर मंगाए गये हैं. संत और अखाड़ों की जानकारी, कौन कहां से प्रभावित हो सकता है, उसकी डीटेल मंगाई गई है. वाराणसी संसदीय क्षेत्र के सभी ग्राम प्रधान, पूर्व ग्राम प्रधान, बीडीसी तक के नाम, पते और मोबाइल नंबर कांग्रेस हाईकमान ने मंगाए हैं. आप ध्यान दीजिए भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर से प्रियंका गांधी मिलती हैं और उसके तुरंत बाद चंद्रशेखर ने वाराणसी से चुनाव लड़ने का एलान कर दिया. यदि मान लीजिए प्रियंका गांधी वहां से खुद चुनाव लड़ती हैं तो यह एक सरप्राइज मूव होगा. फिर आसान मानी जाने वाली सीट पर बीजेपी के माथे पर चिंता की लकीरें तो उभर ही आएंगी. और इस तरह पूरे पूर्वांचल में मृत प्राय पड़ी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में एक जोश आ सकता है.

दूसरी चर्चा यह भी है कि अमेठी में दरअसल प्रियंका सालों से जनसंपर्क करती रहती हैं तो राहुल गांधी जीतने के बाद अमेठी को प्रियंका के लिए छोड़ दें. खैर.. सियासत संभावनाओं का खेल है. लेकिन प्रियंका के सियासत में आने के बाद सरप्राइज मूव तो दिख ही रहे हैं.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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