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दरगाह को दहला सकते हो, मस्त क़लंदर को मिटा नहीं सकते!

जो सूफी मत तलवार और ख़ूनख़राबे से दुनिया को बचाने के लिए अपनी इब्तेदा से ही संघर्षरत रहा, उसी के सिंध प्रांत (पाकिस्तान) के सहवान कस्बे में स्थित एक पवित्र ठिकाने पर ख़ून की नदियां बहा दी गईं. दुनिया को ‘दमादम मस्ता कलंदर’ गीत देने वाले महान सूफी संत लाल शाहबाज़ क़लंदर (1177-1275) की दरगाह आतंकवादियों ने लहूलुहान करके रख दी और 80 लोगों की जान ले ली. घायलों और मरने वालों में महिलाएं, बूढ़े और बच्चे शामिल हैं. इस शैतानी कारनामे को आईएसआईएस ने अंजाम दिया है.

साफ देखा जा सकता है कि अठारहवीं सदी के उपदेशक मोहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब (1703–1792) के ज़माने से मुसलमानों को इस्लामी मोनोलिथ में तब्दील करने में जुटी सुन्नी पंथ की कट्टर वहाबी विचारधारा 21वीं सदी में भी उदार और मजहबी पंथों का मेल कराने वाली सूफी सरिता को ख़ून के रंग में रंगने से बाज़ नहीं आ रही. गौर करने की बात यह है कि जिस वक़्त हमला हुआ, उस वक़्त वहां ‘धमाल’ का कार्यक्रम चल रहा था, जो गीत-संगीत से सजी धार्मिक रस्म होती है. इस दरगाह पर हर गुरुवार को यह रस्म होती है जिसमें सैकड़ों लोग शामिल होते हैं. लाल क़लंदर की मृत्यु के 81 साल बाद इस दरगाह को 1356 में काफी बड़ा बनाया गया था और सिंधी काशी टाइल्स व शीशों से सजाया गया था. ईरान के एक शाह ने यहां सोने का दरवाजा दान किया था जिसे गोल्डन गेट या सुनहरी दरवाज़ा कहा जाता है. गुरुवार को इसी के पास विस्फोट हुआ.

सूफी मत में गीत-संगीत को ख़ुदा से मिलने का एक अहम जरिया माना गया है जबकि वहाबी पंथ गीत-संगीत को पापकर्म मानता है. सूफ़ीवाद या तसव्वुफ़ इस्लाम का एक रहस्यवादी पंथ है. माना जाता है कि सूफ़ीवाद ईराक़ के बसरा नगर में क़रीब एक हज़ार साल पहले जन्मा, लेकिन सूफ़ियों को पहचान अल ग़ज़ाली के समय (सन् 1100) से मिली. बाद में अत्तार, रूमी और हाफ़िज़ जैसे कवि इस श्रेणी में गिने गए. आगे चलकर सूफियों के कई घराने बने, जिनमें सोहरावर्दी, नक्शबंदिया, क़ादरी, चिश्तिया, कलंदरिया और शुस्तरिया के नाम प्रमुख हैं. लाल बाबा सुहारवर्दी सम्प्रदाय से ताल्लुक रखते थे. उनका असली नाम हज़रत सैयद उस्मान था और उनके पुरखे बग़दाद के थे.

शाहबाज़ क़लंदर बाबा दार्शनिक भी थे और पश्तोत, फारसी, तुर्की, अरबी, सिंधी तथा संस्कृकत के जानकार थे. मुल्तानि में उनकी दोस्तीश तीन और सूफी संतों से हुई जो सूफी मत के 'चार यार' कहलाए. चूंकि शाहबाज़ क़लंदर लाल वस्त्र धारण करते थे, इसलिए उनके नाम के साथ लाल जोड़ दिया गया था.

सूफीमत में देखा जाए तो इस्लाम से इतर उसमें बौद्ध, इसाई मत, हिन्दुत्व, ईरानी, जर्थुस्त्रवाद के अंशों का सम्मिलन दिखता है. सूफी संत धर्म के बाहरी आडंबरों को अस्वीकार करते हुए ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति तथा सभी मनुष्यों के प्रति दयाभाव रखने पर बल देते थे. इस्लाम ने एकेश्वरवाद यानी एक अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण का दृढ़ता से प्रचार किया और उलेमाओं ने ‘शरीयत’ नाम से एक धार्मिक कानून बनाया. लेकिन सूफी लोगों ने इन धार्मिक विद्वानों द्वारा निर्धारित कर्मकांड और आचार-संहिता को बहुत कुछ अस्वीकार कर दिया.

सूफ़ियों की दरगाह पर नाचना-गाना वहाबी विचारधारा के लोगों के लिए हराम है लेकिन सूफ़ियों की यह जान है. आईएसआईएस जिस वहाबी जीवनशैली की काइल है उसमें गीत-संगीत व नृत्य करना, पैगंबर मोहम्मद की शान में गाकर क़सीदे पढ़ना, दरगाहों पर मत्था टेकना, पैगंबर का जन्मदिन मनाना, मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइंस डे मनाना, फूल भेंट करना या चढ़ाना; यहां तक कि कुत्ते पालना भी हराम है. फुटबाल खेलने के ख़िलाफ भी फ़तवा जारी है. संगीत को तो वह शराब जैसा नशा मानते हैं. जो भी फिरक़ा या पंथ उनके कट्टर और शुद्धतावादी इस्लाम को नहीं मानता, वे उसे मार डालना ही उचित मानते हैं. यह सिलसिला धर्म उपदेशक वहाब से कई सदी पहले गुज़रे अहमद इब्न हनबल (780-855) और इब्न तयमिय्याह (1263–1328) से जुड़ता है. जबकि सूफी संत पैगंबर मोहम्मद के जीवन काल से अपना सिलसिला जोड़ते हैं. उनका मानवतावादी आंदोलन वहाबी कट्टरपंथियों के निशाने पर हमेशा रहा है. वहाबियों ने तो ख़ुद पैगंबर के रिश्तेदारों के मकबरे उड़ा दिए थे फिर सूफी संत शाहबाज़ क़लंदर दरगाह की उनके सामने क्या बिसात है.

सूफी संतों ने हमेशा इस्लाम की कट्टरता को दूर करके उसे उदार बनाने का प्रयत्न किया और भारत में हिंदू-मुसलमानों के बीच की खाई को पाटने में अहम भूमिका निभाई. फिर चाहे वह मुहम्मद गोरी के समय आए ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती हों, इल्तुतमिश के शासन-काल में दिल्ली आए ख्वाजा कुतुबुद्दीन हों, उनके शिष्य संत फ़रीद हों, ‘हनोज दिल्ली दूर अस्त’ का श्राप देने वाले ग्यासुद्दीन और मुहम्मद तुगलक के समकालीन शेख निजामुद्दीन औलिया हों, गजनवी वंश के दौर वाले बाबा शाहबाज़ क़लंदर हों- सबने अपने सीधे-सादे अपने जीवन, दरिद्रों की सेवा, जनसाधारण के साथ असाधारण जुड़ाव, राजाश्रय और लोभ से दूरी बना कर सभी धर्मों के बीच प्रेम की लौ जलाए रखी. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सूफी संत धार्मिक तथा नैतिक बंधनों से सर्वथा मुक्त रहते थे. नमाज़, रोजा, हज, ज़कात, ज़िहाद आदि से तो उनका कभी कोई लेना-देना नहीं रहा. मुस्लिम धर्मांधों की उनसे घोर नफ़रत की एक बड़ी वजह यह भी रही.

इस्लामी विद्वान बताते हैं कि कुरआन शरीफ़ में एक भी आयत ऐसी नहीं है जो संगीत के ख़िलाफ हो. इतना ही नहीं, ऐसी एक भी हदीस नहीं है जो स्पष्ट रूप से संगीत पर बंधन का उल्लेख करती हो. और जब पाक कुरआन में इस विषय पर एक भी आयत मौजूद नहीं है तो हमें यह मानना होगा कि कुरआन संगीत का निषेध नहीं करती. पैगंबर मोहम्मद से पहले नज़र डालें तो हज़रत दाऊद की गिनती एक लाख 24 हज़ार में से सर्वश्रेष्ठ समझे जाने वाले चार साहब-ए-किताब पैगंबरों में की जाती है, जिन पर पवित्र धार्मिक किताब ‘ज़ुबूर’ नाज़िल हुई थी. कहा गया है कि हज़रत दाऊद को ख़ुदा ने मौशिक़ी का शहंशाह बनाकर धरती पर भेजा था और जब वे अपने सुर लगाते थे तो पर्वत और जंगल मस्ती में झूमते हुए उनके सुर से अपना सुर मिलाने लगते थे. इतिहास है कि खुद पैगंबर हज़रत मोहम्मद ने अपने एक सहाबी अबू मूसा अशरी की आवाज़ सुनकर कहा था कि लगता है तुम्हारे गले में दाऊद का साज़ है!

ऐसे में इस्लाम और संगीत का रिश्ता आईने की तरह साफ हो जाता है. आईएसआईएस के खोल में छिपे कट्टर वहाबी आतंकवादी बाबा लाल शाहबाज़ क़लंदर की दरगाह को तो धमाकों से दहला सकते हैं, लेकिन लोगों के दिलो-दिमाग़ पर राज करने वाले बाबा की मस्त क़लंदरी को वे रहती दुनिया तक नहीं मिटा सकते!

नोट: उपरोक्त लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार है. एबीपी न्यूज़ का इनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई सरोकार नहीं है.

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