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India China Relations: महात्मा और माओ आज कितने प्रासंगिक? भारत और चीन के रिश्ते बनने और बिगड़ने की कहानी

महात्मा गांधी और माओ-त्से-तुंग. बीसवीं सदी में एशिया की दो बड़ी सभ्यताएं – भारत और चीन के इन दो प्रमुख नेताओं ने जितना प्रभाव दुनिया पर डाला है उतना शायद ही किसी और ने डाला हो. गांधी ने देश की आजादी के लिए अहिंसा का रास्ता चुना और माओ ने सशस्त्र क्रांति का. लेकिन मूल रूप से दोनों ही उत्कृष्ट मूल विचारक और बेहतरीन जन आंदोलनकारी थे. दोनों ने अपने-अपने देश को विदेशी प्रभुत्व और गुलामी के चक्र से आजाद कराया. अगले साल हम आजादी के 75 साल पूरे कर रहे हैं, दो साल बाद चीन की भी आज़ादी की उम्र 75 की हो जाएगी. दोनों देशों में इतना कुछ मिलता-जुलता है, तो फिर ये टकराव क्यों हैं? 

महात्मा गांधी के 152वें जन्म दिवस के मौके पर भारत और चीन के बीच के रिश्तों को नए सिरे से देखने की जरूरत है. दोनों देशों ने अलग-अलग तरीकों से आजादी हासिल की है, लेकिन आज दोनों का लक्ष्य एक है. दुनिया में अपनी पहचान बनाना और रुतबा बढ़ाना. चीन ने इस दिशा में कामयाबी पाने के लिए विस्तारवाद को भी एक हथियार बनाया है. इसे लेकर दुनिया के कई देशों के साथ उसका टकराव है. भारत भी उनमें से एक है. दोनों देशों के बीच सीमा विवाद अब कभी न खत्म होनेवाला मसला बन गया है. भारत और चीन के रिश्ते को समझने के लिए हमें एक सदी पीछे जाकर स्थितियों को समझना होगा. 

बात 1930 की है जब भारत पर राज कर रहे अंग्रेजों ने नमक पर टैक्स लगा दिया था. उस वक्त महात्मा गांधी ने इस कानून के खिलाफ आंदोलन छेड़ा. इस ऐतिहासिक सत्याग्रह में गांधी समेत 78 लोगों के अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से समुद्र के तट पर बसे दांडी तक 390 किलोमीटर की पैदल यात्रा की. रास्ते में हजारों लोगों ने गांधी को समर्थन दिया और उनका उत्साह बढ़ाया. गांधी जनता से जुड़ने और बड़े पैमाने पर विरोध मार्च का नेतृत्व करने में बड़े शिल्पकार थे. 

उसी दौर में चीन में कम्यूनिस्ट पार्टी के क्रांतिकारी नेता माओ त्से तुंग भी पैदल मार्च के जरिए चीन के युवाओं को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहे थे. बात 1930 के दशक की है जब चीन में गृह युद्ध की स्थिति थी. उस वक्त चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी और नेशनलिस्ट पार्टी के बीच खूनी संघर्ष चल रहा था. 1934 में कम्यूनिस्ट पार्टी के मुखिया माओत्से तुंग ने हार से बचने के लिए अपने साथियों को चीन के पूर्वी हिस्से से उत्तरी हिस्से की तरफ कूच करने का आदेश दिया. करीब 9 हजार किलोमीटर लंबी इस यात्रा में उनके साथ हजारों लोग निकल पड़े. इसे इतिहास में लॉन्ग मार्च के नाम से जाना जाता है. एक साल चले इस ऐतिहासिक लॉन्ग मार्च ने कई चीनी युवाओं को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. 

दूसरी तरफ भारत में 1940 के दशक में आजादी की लड़ाई अपने चरम पर थी. महात्मा गांधी के नेतृत्व में जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल जैसे कई दिग्गज नेता अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल थे. लंबे संघर्ष के बाद 1947 में भारत को आजादी मिली. पूरी दुनिया ने गांधी के अंहिसा के रास्ते का लोहा माना. 

भारत को आजादी मिल चुकी थी लेकिन चीन में संघर्ष जारी था. पूर्व राजनयिक और गांधी विशेषज्ञ पास्कल एलन नाज़रेथ के मुताबिक गांधी का असर चीन की राजनीति पर भी था. माओत्से तुंग के युग से पहले कई चीनी विचारक गांधी के विचारों से प्रभावित होकर उनसे मिलने भारत भी आए थे. आपको जानकर हैरानी होगी कि चीन में 1920 से 1940 के अंत तक गांधी और गांधीवाद पर आधारित 27 पुस्तकें प्रकाशित हुईं थी. महात्मा गांधी खुद कभी चीन नहीं गए लेकिन चीन की घटनाओं पर नजर रखते थे. उन्होंने चीन के खिलाफ आक्रामकता के लिए जापान की कड़ी आलोचना भी की थी. 

चीन और जापान के बीच 19वीं सदी के अंत से लेकर बीसवीं सदी के मध्य तक लगातार टकराव रहा. 1937 से लेकर 1945 के बीच भी दोनों के बीच लंबा युद्ध भी चला. इस युद्ध में चीन की कम्यूनिस्ट और नेशनलिस्ट पार्टी ने मिलकर जापानियों का मुकाबला किया लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद हालात ऐसे बन गए कि दोनों फिर भिड़ पड़े. चीन में फिर से गृह युद्ध शुरू हो गया. आखिरकार 1949 में नेश्नलिस्ट पार्टी की हार हुई और माओ की कम्यूनिस्ट पार्टी ने 1 अक्टूबर 1949 को पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के स्थापना की घोषणा की. भारत पहला गैर कम्युनिस्ट देश था जिसने इसे मान्यता दी थी. आजादी के बाद शुरुआती सालों में भारत और चीन के बीच टकराव नहीं था. पहली बार रिश्तों में दरार तब आयी, जब भारत ने तिब्बत के बौद्ध धर्म गुरू दलाई लामा को अपने यहां शरण दी.

तिब्बती धर्मगुरू तेंजिन ज्ञात्सो यानी 14वें दलाई लामा ने भारत में 30 मार्च 1959 को क़दम रखा. उस वक्त वो सिर्फ 24 साल के थे. तिब्बत की राजधानी ल्हासा से 15 दिन पैदल चलते हुए, हिमालय को पार कर वो अरुणाचल प्रदेश के तवांग से भारतीय सीमा में दाखिल हुए थे. उस वक्त के राजनीतिक हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दलाई लामा को भारत में शरण देने का फैसला किया. नेहरू खुद 28 अप्रैल 1959 को उत्तराखंड के मसूरी में दलाई लामा से मिलने गए और भारत में उनका स्वागत किया. भारत का दलाई लामा को शरण देना चीन को अच्छा नहीं लगा. तब चीन में माओत्से तुंग का शासन था.

चीन और तिब्बत के बीच विवाद सदियों पुराना है. चीन कहता है कि तिब्बत 13वीं शताब्दी के मध्य से चीन का हिस्सा रहा है लेकिन तिब्बतियों का कहना है कि तिब्बत कई सदियों से एक स्वतंत्र राज्य है. बीसवीं सदी की शुरू में जब चिंग वंश के राजाओं ने तिब्बत पर कब्जा किया तो तिब्बतियों ने 3 साल के अंदर ही उन्हें खदेड़ दिया. 1912 में 13वें दलाई लामा ने तिब्बत को स्वतंत्र घोषित कर दिया था. इसके क़रीब 40 साल के बाद यानी 1950 में चीनी सरकार ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया. चीन का यह आक्रमण तब हुआ जब वहां 14वें दलाई लामा यानी कि मौजूदा दलाई लामा को चुनने की प्रक्रिया चल रही थी. तिब्बत को इस लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा. स्थितियां बिगड़ती देख दलाई लामा को लगा कि वो चीनी चंगुल में फंस जाएंगे. आखिरकार 1959 में उन्होंने भारत का रुख़ किया. उनके साथ भारी संख्या में तिब्बती भी भारत आए.

भारत का दलाई लामा को शरण देना चीन ने अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप माना. वो इसलिए क्योंकि इस घटना से ठीक 5 साल पहले ही भारत ने पंचशील समझौते के तहत तिब्बत को चीन के एक इलाके के तौर पर स्वीकार किया था. 1954 में पीएम नेहरू और चाइनीज पीएम जो एनलाई के बीच पंचशील समझौते में जिन पांच बिंदुओं पर सहमति बनी थी, वो थे – 

- दूसरे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना
- एक-दूसरे देश पर आक्रमण न करना
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना
- परस्पर सहयोग और लाभ को बढ़ावा देना
- और सभी देशों द्वारा अन्य देशों की क्षेत्रीय अखंडता और प्रभुत्ता का सम्मान करना

दरअसल भारत की आजादी के समय अमेरिका, पाकिस्तान का पक्ष लेता था इसलिए भारत ने अपने पड़ोसी देश चीन से मधुर रिश्ते रखने की कोशिश की. यही कारण है कि भारत ने 1950 में चीन के तिब्बत पर कब्ज़ा करने का पुरजोर विरोध नहीं किया और 1954 में पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर भी किए. 

पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले भारत और चीन के बीच अचानक रिश्ते इतने बिगड़ जाएंगे कि नौबत युद्ध तक आ जाएगी ये किसी ने नहीं सोचा था. भारत और चीन के बीच जंग की शुरुआत 20 अक्टूबर 1962 को हुई. चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश यानी कि उस वक्त के नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी में अचानक हमला कर दिया. मैकमहोन लाइन को पार करते हुए चीनी सैनिक भारत की सरहद में घुस आए. हमले की शुरुआत होने के बावजूद भारत को पूरा भरोसा था कि नौबत युद्ध तक नहीं पहुंचेगी क्योंकि 1959 से 1962 के बीच भी भारत और चीन के बीच सीमा पर छोटे-मोटे संघर्ष होते रहते थे. यही वजह थी कि भारत ने बड़ी तैयारी नहीं की थी. लेकिन इस बार बात अलग थी. चीनी सेना संख्या में भारतीय सेना से न सिर्फ़ दोगुनी थी बल्कि उनके पास बेहतर हथियार थे और वो लड़ाई के लिए पूरी तरह से तैयार थे. भारत को इस युद्ध में हार झेलनी पड़ी. चीन ने लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र पर भी कब्जा कर लिया. इसी युद्ध के बाद भारत ने आधुनिक हथियार और बेहतर डिफेंस सिस्टम पर काम शुरु किया. पीएम नेहरू चीन से मिली हार को आखिरी दम तक भुला नहीं पाए. 

नेहरू का कहना था कि चीन ने भारत पर हमला इसलिए किया क्योंकि उन्होंने दलाई लामा को भारत में शरण दी थी. उनका ये भी मानना था कि युद्ध की अहम वजह ये भी है कि चीन एशियाई जगत में अपने आपको सर्वश्रेष्ठ साबित करना चाहते था.

नेहरू के बाद इंदिरा गांधी के दौर में भी चीन से सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार तनावपूर्ण स्थिति आई लेकिन इस तनाव को युद्ध की स्थिति तक कभी पहुंचने नहीं दिया गया. साढ़े तीन हजार किलोमीटर की सीमा से जुड़े दोनों देश सीमा विवाद को निपटाने का अभी तक इंतजार कर रहे हैं.

इंदिरा गांधी ने चीन को लेकर 1966 में कड़ा रुख दिखाया था जब चीनी सैनिक भूटान के डोकलाम इलाके में घुसपैठ की कोशिश कर रहे थे. चीन को डोकलाम से दूर रखने के लिए भारत ने भूटान का साथ दिया था. भारत के इन कदमों से भड़के चीन ने सितंबर 1967 में सिक्किम में पड़ने वाले नाथूला पास पर हमला कर दिया था. उस वक्त तक सिक्किम भारत का हिस्सा नहीं हुआ करता था. वहां पर राजशाही का शासन था. भारतीय सेना ने नाथू ला पास और चो ला पास पर चीनी सेना को वापस खदेड़ दिया. इसी तरह सिक्किम के भारत में विलय को लेकर भी भारत और चीन में वाद-विवाद हुआ. आखिरकार 1975 में सिक्किम भारत का हिस्सा बन गया लेकिन चीन ने इसे 2003 में जाकर ही मान्यता दी. 

चीन से द्विपक्षीय रिश्तों पर जमी बर्फ 1988 में पिघली जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी चीन गए. 34 साल में किसी भारतीय पीएम का वो पहला चीन दौरा था. 1954 में नेहरू की चीन यात्रा के बाद किसी भारतीय पीएम ने चीन की यात्रा नहीं की थी. राजीव गांधी का चीन में जबर्दस्त स्वागत हुआ. इस दौरे से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों के विस्तार और विकास पर सहमति बनी. सीमा विवाद को सुलझाने पर भी दोनों के बीच बातचीत हुई. 
 
भले ही अगले तीस सालों तक भारत और चीन के बीच कोई बड़ा टकराव नहीं हुआ लेकिन चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति को जारी रखा. 14 देशों से उनकी सीमा जुड़ी हुई है लेकिन कम से कम 23 देशों की जमीन या समुद्री सीमाओं पर वो अपना दावा जताते हैं. इसी विस्तारवादी सोच के तहत चीन के सभी पड़ोसी देशों के साथ विवाद चल रहा है. 

1988 और 1998 में चीन और भूटान के बीच समझौता हुआ था कि दोनों देश डोकलाम इलाके में शांति बनाए रखने के लिए काम करेंगे. लेकिन 2017 में चीन ने समझौते का उल्लंघन करते हुए डोकलाम तक सड़क बनाने का काम शुरु किया. चूंकि भूटान सैन्य ताकत के लिहाज से चीन का मुकाबला करने में सक्षम नहीं है इसलिए भारत को एक बार फिर बीच में आना पड़ा. डोकलाम भारत, भूटान औऱ चीन के तिराहे पर है. ऐसे में चीन का सड़क के जरिए यहां तक पहुंचना भारत के लिए रणनीतिक तौर पर भी खतरा है. चीन की विस्तारवादी नीतियों की वजह के अरुणाचल प्रदेश औऱ जम्मू-कश्मीर में भी सरहद से जुड़े इलाकों में बरसों से तनाव रहा है. 

दरअसल भारत, चीन के साथ 3488 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है. ये सीमा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से होकर गुज़रती है. विवादों की वजह से दोनों देशों के बीच कभी सीमा निर्धारण नहीं हो सका. हालांकि यथास्थिति बनाए रखने के लिए लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी का इस्तेमाल किया जाने लगा.

चीन का मुकाबला करने के लिए भारत भी सरहदी इलाकों में रोड बनाने का काम कर रहा है जिसमें लद्दाख भी शामिल है. ये बात चीन को पसंद नहीं है. पिछले साल 15 और 16 जून को लद्दाख की गलवान घाटी में एलएसी पर चीन और भारतीय सैनिकों की जबर्दस्त झड़प हुई जिसमें 20 भारतीय जवान शहीद हो गए थे. लेकिन भारतीय सैनिकों ने मुकाबला करते हुए चीन को इस इलाके से वापस पीछे खदेड़ दिया. तब से दोनों देशों की सरहद पर तनाव बना हुआ है.

चीन के विस्तारवादी मंसूबों पर लगाम लगाने के लिए भारत ने कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों का भी इस्तेमाल किया है. इन्ही में एक है क्वाड. क्वाड का अर्थ है क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग'. इस ग्रूप में भारत के अलावा जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका भी हैं. क्वाड का मकसद मूल रूप से एशिया- प्रशांत क्षेत्र में व्यापार को आसान करना है लेकिन अब ये व्यापार के साथ सैन्य बेस को मजबूती देने पर भी ध्यान दे रहा है ताकि इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखा जा सके.

भारत और चीन दोनों परमाणु शक्तियां हैं. इन दोनों देशों में दुनिया की लगभग एक तिहाई आबादी रहती है. दोनों एक दूसरे की ताकत औऱ कमजोरी को अच्छी तरह से समझते हैं. प्रधानमंत्री बनने के बाद पीएम मोदी ने कारोबारी रिश्ते सुधारने औऱ सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से कई बार मुलाकात की. 2014 में मोदी के पीएम बनने के सिर्फ चार महीने बाद ही शी जिनपिंग भारत का दौरा भी किया था. गुजरात में दोनों नेताओं के बीच हुई बैठक की ये तस्वीरें बयां करती है कि शी जिनपिंग के लिए भारत कितनी अहमियत रखता है. प्रधानमंत्री नरेंद्री मोदी भी चीन को कितना अहम मानते हैं वो इस बात से साबित होता है कि वो सबसे ज्यादा बार चीन जाने वाले भारतीय प्रधानमंत्री हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 7 साल में पीएम के तौर पर अब तक 5 बार चीन जा चुके हैं जबकि शी जिनपिंग चीन के राष्ट्रपति बनने के बाद पिछले 8 साल में 3 बार भारत आ चुके हैं. 

2020 में लद्दाख के गलवन में हुई हिंसा से बाद से भारत और चीन के बीच में राजनैतिक स्तर पर बातचीत बंद है और सेनाएं अभी भी सरहद पर तैनात हैं. हालांकि युद्ध किसी भी तरह से मुमकिन नहीं दिखता क्योंकि दोनों ही देश परमाणु ताकत हैं. Stockholm International Peace Research Institute के मुताबिक 2020 तक - 

• चीन के पास 320 परमाणु बम हैं, जबकि भारत के पास 150 परमाणु बम हैं.
• चीन की सेना में 21 लाख जवान है जबकि भारतीय सेना में 14 लाख जवान.
• चीन के पास 2 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं और भारत के पास एक.
• चीन के पास 74 सबमरीन है जबकि भारत के पास 16.
• चीन के पास 3444 लड़ाकू विमान है जबकि भारत के पास 2141 लड़ाकू विमान.
• चीन के पास 3500 टैंक हैं जबकि भारत के पास 4292 टैंक्स.

जाहिर है इतनी बड़ी सैन्य ताकत वाले दुनिया के दो इतने बड़े देश अगर युद्ध करते हैं तो इसका नुकसान पूरी दुनिया को होगा. ऐसे में युद्ध कोई विकल्प नहीं है. जरूरत है दोस्ती की. अगर दोनों प्राचीन सभ्यताएं एक-दूसरे को आगे बढ़ाएं तो पूरी दुनिया को फ़ायदा हो सकता है. उम्मीद है कि जब दोनों देश अपनी आजादी की सौवीं सालगिरह मनाएं तब दोनों में ऐसी दोस्ती हो कि दुनिया इसकी मिसाल दे. 

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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