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BLOG: गुरुदत्त-बेनेगल जैसी लंबी लकीरों के बीच कल्पना लाजमी की छोटी पर, चमकीली लकीर

औरतपना, किसी ने कल्पना लाजमी की 1997 की फिल्म ‘दरम्यान’ देखकर कहा था, कि उनकी हर फिल्म में होता है. औरतपना, औरतों की फिल्मों में नहीं होगा, तो किनमें होगा? ‘

हम कल्पना लाजमी को भूल गए थे. उनकी मौत ने उन्हें न याद करने की भूल याद दिलाई. कल्पना शुरुआती फेमिनिस्ट फिल्मकारों में से एक थीं. अब ऐसी कलाकार कम ही हैं- किडनी की बीमारी के बाद उनका चले जाना, उस जगह को रीता कर गया है. यूं हिंदी सिनेमा में महिला फिल्मकार कम ही हैं, और जो हैं भी, वे औरतों के इर्द-गिर्द अपनी कहानियां कम ही बुनती हैं. मीरा नायर न्यूयार्क में जा बसी हैं और तरह-तरह की फिल्में बना रही हैं. दीपा मेहता की दो साल पहले आई ‘एनाटोमी ऑफ वॉयलेंस’ को ज्यादा लोग देख नहीं पाए. अपर्णा सेन का अधिकतम काम बांग्ला में है. नंदिता दास ने तो अभी तक महिला विषयों को हाथ ही नहीं लगाया. बाकी की महिला फिल्मकार कमर्शियल सिनेमा के झूले में झूल रही हैं. कल्पना का यूं चले जाना, एहसास करता है कि औरतों के मुद्दे, औरतपने के साथ सिनेमा में दिखाने वाली औरतें मानो अब बची ही नहीं हैं. औरतपना, किसी ने कल्पना लाजमी की 1997 की फिल्म ‘दरम्यान’ देखकर कहा था, कि उनकी हर फिल्म में होता है. औरतपना, औरतों की फिल्मों में नहीं होगा, तो किनमें होगा? ‘पिंक’ जैसी फिल्म अगर कोई फीमेल डायरेक्टर बनाती तो अमिताभ ‘दीपक सहगल’ बच्चन नैय्या का खेवैय्या क्यों बनाए जाते. भला हर मोर्चे पर औरतों को आदमियों की क्यों जरूरत है? अलंकृता श्रीवास्तव की ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ इसी को साबित करती है कि औरतें, औरतों की अच्छी कंपेनियन बन सकती हैं. दुख बांटने के लिए उन्हें अपनी सहेलियों से अच्छा कोई नहीं मिल सकता. कुल मिलाकर कल्पना लाजमी का फेमिनिज्म हमें आज खूब याद आ रहा है. उनकी पहली फिल्म ‘एक पल’ से लेकर आखिरी फिल्म ‘चिंगारी’ तक औरतों की कहानियां हैं, जो अपने किए पर शर्मिन्दा नहीं. अपनी सेक्शुएलिटी को कंट्रोल करना उन्हें खूब आता है. रिलेशनशिप्स में एजेंसी किसकी होगी, वे तय कर सकती हैं. ‘एक पल’ 1986 की फिल्म थी. लव ट्राएंगल थी- शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह और फारुख शेख के अभिनय से सजी. एक वर्कोहलिक पति, एक उदास बीवी और बीवी का एक चार्मिंग एक्स ब्वॉय फ्रेंड. एक पल में तीनों के रिश्ते बदल जाते हैं. औरत शादी से इतर अपने संबंध पर शर्मिन्दा नहीं. न ही उस संबंध से होने वाली संतान को छोड़ना चाहती है. पति स्वीकार करे, या न करे. पति को स्वीकार करना ही होता है. यह अपने दौर से आगे की कहानी थी. मशहूर बांग्ला लेखिका मैत्रेयी देवी की कहानी पर बेस्ड. विवाहेतर संबंधों पर फिल्में बनती हैं, लेकिन लड़की हारकर अपनी गलती मान बैठती है. पर यहां औरत का एक अलग सा, डेयरिंग पोट्रेअल था. इसके बाद कल्पना की ‘रुदाली’ में भी ठोस औरतपना था. यह ‘एक पल’ के बाद की उनकी दूसरी फिल्म थी जो 1993 में आई थी. ‘एक पल’ की तरह यह भी एक महिला राइटर- महाश्वेता देवी की कहानी पर आधारित थी. जाति और जाति विभाजन के व्यापक संदर्भ में जेंडर और पितृसत्ता पर हथौड़ा मारती हुई. एक ऐसी औरत की कहानी जो किसी भी दुख के वक्त रोती नहीं. रो ही नहीं पाती. लेकिन एक रुदाली से अपनापे के बाद खुद रुदाली बन जाती है. रुदाली कौन, राजस्थान के कुछ इलाकों में जिन्हें अगड़ी जातियों के मर्दों की मौत पर रोने के लिए बुलाया जाता है. जाहिर सी बात है, ये औरतें ‘नीचे’ की जातियों की होती हैं. रोना ही उनकी आजीविका होती है. रुदालियों पर डीटेल में ‘द लॉस्ट जनरेशन : क्रॉनिकलिंग इंडियाज़ डाइंग प्रोफेशंस’ नाम की किताब में पढ़ा जा सकता है. बाकी, कल्पना की फिल्म से इसे समझा जा सकता है. औरत की कहानी, औरत की जुबानी. एक ऐसी प्रथा, जिसके बारे में ज्यादा लोग जानते ही नहीं. न रुदालियों की व्यथा-कथा को जानते हैं. कल्पना की इस फिल्म में रुदाली बनी डिंपल कपाड़िया ने राष्ट्रीय पुरस्कार भी हासिल किया था. औरत के संघर्षों में भटकती, फिर भी झींकती नहीं थीं कल्पना. हर कुछ साल बाद उनके पास एक नई कहानी होती थी. कल्पना की तीसरी फिल्म ‘दरम्यान’ इसी बात को पुख्ता करती थी. औरतपना उनकी इस फिल्म में भी था. कहानी चालीस के दशक की फिल्म इंडस्ट्री की थी. शोहरत के शिखर से फिसलती, बुढ़ाती नायिका, और उसका अकेला सहारा उसकी ट्रांसजेंडर संतान इम्मी. सेक्शन 377 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्यों कल्पना की यह फिल्म याद नहीं आई, पता नहीं. फिल्म साफ करती है, जन्म के समय आपकी लैंगिकता महज एक संयोग है. न तो यह आपकी पहचान की शुरुआत है, न ही उसका अंत. उससे पार जाना ही आपको मानवीय बनाता है. इनसानियत पर आपका भरोसा कायम करता है. थर्ड जेंडर पर एक खूबसूरत फिल्म- उन तमाम व्यथाओं को संजोये जो समाज के बीच उन्हें भोगनी पड़ती है. इसी तरह 2001 में आई कल्पना की ‘दमन’ शादी में बलात्कार का दर्द साफ दिखाती थी. बीवी है तो पैर की जूती- मैरिटल रेप का कारण यही सोच है. पर ‘दमन’ की दमित नायिका दुर्गा जब पलटकर वार करती है तो मर्दपने के परखच्चे उड़ जाते हैं. ‘दमन’ ने रवीना टंडन को राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया था. फिर 2006 की ‘चिंगारी’ एक ऐसी वेश्या की कहानी थी जो समाज की हिप्पोक्रेसी का शिकार है लेकिन बाद में उसी के खिलाफ उठ खड़ी होती है. यह फिल्म कल्पना के लाइफलॉन्ग पार्टनर और मशहूर असमिया आर्टिस्ट भूपेन हजारिका की रचना पर आधारित थी. फिल्म कमर्शियल बॉक्स ऑफिस फ्लॉप थी लेकिन एक ज्वलंत मसले को जरूर उठाती थी. ‘चिंगारी’ के बाद कल्पना शांत हो गईं. सालों बीत गए. हम कल्पना को सचमुच भूल गए. उनकी फिल्मों को भी. पर उनकी मौत ने हमें झकझोर दिया. उनका महत्व सिर्फ इस बात से नहीं बढ़ जाता कि वह गुरुदत्त-श्याम बेनेगल परिवार की सदस्य थीं. इस बात से भी नहीं बढ़ता कि उनकी शुरुआत बेनेगल की फिल्मों की एसिस्टेंट बनकर हुई थी. गुरुदत्त-बेनेगल जैसी लंबी लकीरों के बीच कल्पना की छोटी सी ही सही, लेकिन चमकीली लकीर दिखाई देती है. यही उनका महत्व है. किस्सा कहने का अपना अंदाज, अलग-अलग चरित्रों पर गौर करना. हर चरित्र के मन में गहरे और गहरे उतरने का कौशल भी, साहस भी. ऐसी साहसी महिला फिल्मकारों की जरूरत हमें आज भी है. (नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)
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