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यूपी चुनाव से पहले ओबीसी को लुभाने का बड़ा सियासी दांव

नयी दिल्लीः अगले साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में होने वाले चुनाव से पहले अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी समुदाय को रिझाने के लिए मोदी सरकार ने आज बड़ा सियासी दांव खेलते हुए लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पारित करा लिया. चूंकि आरक्षण ऐसा संवेदनशील मसला है जिस पर कोई भी विपक्षी दल जोखिम मोल लेना नहीं चाहता, सो इस बिल का समर्थन करना उनकी मजबूरी बन गई थी.

उत्तर प्रदेश में ओबीसी समुदाय का खासा प्रभाव है और किसी भी पार्टी को सत्ता दिलाने में उसकी अहम भूमिका रहती है. इस बिल के राज्यसभा से पारित होने और कानून की शक्ल लेने के बाद सभी राज्यों को अपने हिसाब से ओबीसी की लिस्ट तैयार करने का अधिकार मिल जायेगा. जाहिर है कि यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार चुनाव से पहले इस कानून का फायदा उठाते हुए कुछ और जातियों को ओबीसी की सूची में शामिल करेगी, जिसमें निषाद जाति प्रमुख है, जो राज्य की सौ से ज्यादा विधानसभा सीटों पर अपना वर्चस्व रखती है. ओबीसी की श्रेणी में शामिल होने वाले नई जातियां ही बीजेपी के दोबारा सत्ता में आने की राह आसान करेंगी.

दरअसल, मोदी सरकार को यह 127वां संविधान संशोधन विधेयक लाने की जरुरत इसलिए पड़ी क्योंकि गत 5 मई को सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को लेकर ओबीसी की पहचान करने और सूची बनाने के राज्यों के अधिकार को अवैध घोषित कर दिया था.

कोर्ट का कहना था कि 102 वें संविधान संशोधन के बाद राज्यों को सामाजिक व आर्थिक आधार पर ओबीसी जातियों की पहचान करने व सूची बनाने का अधिकार नहीं है, यह सिर्फ केंद्र का ही अधिकार है.

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा व नौकरी के क्षेत्र में मराठा आरक्षण को असंवैधानिक करार देते हुए अपने फैसले में कहा था कि मराठा समुदाय को आरक्षण के कोटा के लिये सामाजिक, शैक्षणिक रुप से पिछड़ा घोषित नहीं किया जा जा सकता है क्योंकि यह साल 2018 के महाराष्ट्र राज्य समानता के अधिकार कानून का उल्लंघन करता है. कोर्ट ने यह भी कहा था कि मराठा को आरक्षण देने से 50 फीसदी की तय सीमा का भी उल्लंघन होगा.

फिलहाल ओबीसी की केंद्र और राज्यों की सूची अलग-अलग है.राज्यों की ओबीसी लिस्ट में कई ऐसी  जातियां शामिल हैं जो केन्द्री सूची में नहीं हैं. इसी तरह राज्यों की सूचियों में भी परस्पर विरोधाभास है. बिहार में बनिया ओबीसी में हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में इन्हें अपर कास्ट माना जाता है. इसी तरह हरियाणा में जाट ओबीसी में नहीं हैं लेकिन राजस्थान में वे इस सूची में हैं.अब कानून बन जाने का फायदा विभिन्न राज्यों में उन प्रभावशाली जातियों को मिलेगा, जो लंबे समय से ओबीसी का दर्जा दिए जाने की मांग कर रही हैं.राज्यों के पास ओबीसी सूची में अपनी मर्जी से जातियों को अधिसूचित करने का अधिकार होगा. मसलन, महाराष्ट्र में मराठा समुदाय, हरियाणा में जाट समुदाय, गुजरात में पटेल समुदाय और कर्नाटक में लिंगायत समुदाय को ओबीसी वर्ग में शामिल होने का मौका मिल सकता है.

उल्लेखनीय है कि हाल ही में मेडिकल एजुकेशन की रिजर्व सीटों में भी केंद्र सरकार ने ओबीसी समुदाय और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगों के लिए सीटें आरक्षित करने का फैसला लिया था.

हालांकि कांग्रेस समेत अधिकांश विपक्षी दलों ने इस बिल का समर्थन किया लेकिन फिर भी लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन ने सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए पूछा, 'सवाल ये है कि आखिर आज ओबीसी विधेयक में संशोधन करने की नौबत क्यों आई.' केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, '2018 में 102वां संविधान संशोधन लाया गया. आपने ओबीसी कमीशन बनाया लेकिन आपने राज्यों के अधिकारों का हनन किया. यूपी, उत्तराखंड में चुनाव हैं, इसलिए आप लोगों को खुश करने के लिए ये संशोधन लाए. आप मजबूरी में ये संशोधन लाए. जनहित के लिए हम इस बिल का समर्थन करते हैं.लेकिन हमारी मांग है कि 50 फीसदी की बाध्यता पर कुछ किया जाए. जैसे, तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण है. इसी तरह दूसरे राज्यों को भी ये ताकत दी जाए कि वो आरक्षण की व्यवस्था को 50 फीसदी से ज्यादा बढ़ा सकें.'

लेकिन सवाल ये है कि सियासी फायदे के लिए इसी तरह से जातियों को ओबीसी में शामिल करने का ये सिलसिला कहीं रुकेगा भी कि नहीं क्योंकि हर राजनीतिक दल ये चाहता है कि आरक्षण की 50 फीसदी सीमा को बढ़ा दिया जाए.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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