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2024 में मायावती के गेम प्लान से कितना होगा बीजेपी को फायदा?

देश के दलितों की बेटी कहलाने वाली और उनकी सबसे बड़ी खैरख्वाह होने का दावा करने वाली बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने साल 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से ही एक अजीब-सी खामोशी ओढ़ रखी थी. इन पांच सालों में उन्होंने देश के सबसे ज्वलंत मुद्दों पर भी सार्वजनिक रूप से अपनी राय प्रकट करने से अक्सर परहेज़ ही किया है. हो सकता है कि इसकी एक बड़ी वजह ये भी हो कि कुछ के मामलों में सीबीआई से उन्हें क्लीन चिट नहीं मिली है. लेकिन 2024 के लिए मायावती ने अपना गेम प्लान तैयार कर लिया है. 

उन्होंने किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन न करने का ऐलान करने का जो ऐलान किया है उसके सियासी मायने भी हैं. इसीलिए सियासी गलियारों में सवाल उठ रहा है कि इसके जरिए वे अपनी पार्टी को मजबूत करेंगी या फिर किसी और ही राजनीतिक ताकत को मजबूत करने के रास्ते खोलने वाली हैं? इसमें कोई शक नहीं कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियों को सोशल मीडिया की ताकत का अहसास हो चुका है और वे उस पर भी अव्वल नंबर पर आने की होड़ में लगी हुई हैं. देर से ही सही लेकिन मायावती को भी ये महसूस हुआ है कि सोशल मीडिया को नजरअंदाज करके सियासी अखाड़े में मुकाबला नहीं किया जा सकता.

लिहाजा, बीएसपी (BSP) ने भी सोशल मीडिया पर अपना विस्तार शुरू कर दिया है. बीएसपी अब फेसबुक (Facebook) और इंस्टाग्राम (Instagram) पर भी सक्रिय हो रही है. यानी ट्विटर (Twitter) और यूट्यूब (YouTube) के बाद ये भी बीएसपी का सार्वजनिक मंच होगा. पार्टी नेता पार्टी इस नई पहल को मिशन युवा शक्ति से जोड़कर देख रहे हैं और उनके मुताबिक सबसे पहले हर स्तर पर ये कोशिश होगी कि कम से कम 50 फीसदी युवाओं की भागेदारी को इसमें सुनिश्चित किया जाए. सच तो ये है कि साल 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों के बाद से ही सूबे में मायावती की जमीन लगातार कमजोर होती जा रही है और उनके सबसे मजबूत माने जाने वाले दलित वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा बीएसपी से छिटककर या तो बीजेपी के साथ आ गया है या फिर अखिलेश यादव की सपा के पाले में चला गया है. 

हालांकि एक जमाना वह भी था, जब दलित, मुस्लिम और अति पिछड़ा वोट बैंक मायावती की सबसे बड़ी ताकत रहा है. वैसे तो मायावती चार बार सूबे की मुख्यमंत्री रहीं हैं लेकिन साल 2007 से 2012 तक सिर्फ एक बार ही उन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है. यूपी की राजनीति के जानकार मानते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में भी खामोश रहने वाली मायावती अगर एकाएक सक्रिय हो उठी हैं तो इसके गहरे सियासी मायने भी हैं क्योंकि राजनीति में आम लोगों को वह खेल नहीं दिखता जो पर्दे के पीछे से चल रहा होता है. दलित-मुस्लिम वोट बैंक को एक बार फिर अपने पाले में खींचने के लिए मायावती ने जो प्लान बनाया है, उसका उन्हें कितना फायदा होगा, ये तो फिलहाल कोई नहीं जानता. लेकिन उन्होंने शतरंज की बिसात बिछाने की तैयारियां तो शुरू कर ही दी हैं.

पिछले महीने शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली की पार्टी में वापसी और इमरान मसूद को पार्टी से जोड़ना मायावती की इसी मुहिम का हिस्सा माना जा रहा है. बीते दिनों ही अतीक अहमद की पत्नी ने भी बीएसपी का दामन थाम लिया है. लेकिन वह जातीय समीकरण भी साध रही हैं और इसी के चलते उन्होंने पिछले दिनों विश्वनाथ पाल को बीएसपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर एक संदेश देने की कोशिश भी की है. लेकिन एक बड़ा सवाल ये भी है कि मायावती 2019 की तरह ही अगले लोकसभा चुनाव में सपा या किसी अन्य दल के साथ गठबंधन आख़िर क्यों नहीं करना चाहती हैं? 

हालांकि उनका जवाब तो यही है कि हमने काफी सोच समझकर किसी भी पार्टी से गठबंधन न करने का फैसला किया है क्योंकि गठबंधन करने से बीएसपी को कोई फायदा नहीं होता. उलटे, गठबंधन में बीएसपी का वोट तो दूसरे दल को ट्रांसफर होता है मगर दूसरे दलों के वोट बैंक का बसपा को कोई फायदा नहीं मिलता इसलिए बीएसपी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. ये तो था, मायावती का जवाब. लेकिन इसमें एक ऐसा सियासी पेंच भी फंसा हुआ है जो बीएसपी के अकेले चुनावी-मैदान में कूदने से अखिलेश यादव की एसपी को नुकसान पहुंचाएगा तो बीजेपी के लिए उन सीटों पर फायदे का सौदा साबित होगा जहां पार्टी कमजोर है और जो सीटें फिलहाल उसकी झोली में नहीं हैं.

शायद इसीलिए सियासी जानकार ये मान रहे हैं कि 2024 की सियासी जंग नजदीक आने के साथ ही एसपी-बीएसपी के बीच मुस्लिम वोट बैंक की जंग और तीखी होगी. हालांकि बीते विधानसभा चुनाव में मुस्लिमों ने एसपी को एकतरफा वोट देकर अखिलेश यादव को सत्ता में लाने की भरपूर कोशिश की थी फिर भी वो कामयाब नहीं हो पाए. उसके बाद मुसलमानों से जुड़े कई मसलों पर अखिलेश की चुप्पी ने समुदाय के बड़े तबके को नाराज कर दिया था. अब उनके पास सिर्फ दो ही विकल्प बचते हैं कि बरसों बाद या तो वे कांग्रेस का हाथ थामें या फ़िर मायावती पर भरोसा करें. हालांकि पूरे सूबे के मुस्लिम समुदाय के मिजाज़ को समझना और उसका कोई नतीजा निकलना फिलहाल जल्दबाजी ही होगी. लेकिन मायावती मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी करने में अपनी कोई कसर बाकी नहीं रखेंगी क्योंकि मुस्लिम वोटों के बंटवारे से आखिरकार फायदा तो बीजेपी को ही होगा.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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