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(Source: ECI/ABP News)

ब्लॉग: हिंदुस्तानियों के दिल पर राज करने का अकबरी हुनर

ABP न्यूज़ नेटवर्क के समूह संपादक शाज़ी ज़मां की नई किताब अकबर इन दिनों चर्चा में है. इस किबात में मुगल बादशाह अर्श आशियानी जलालुद्दीन अकबर के हर पहलु पर गहराई और विस्तार से प्रकाश डाला गया है. इस हद तक विस्तार है कि किताब पढ़ते समय लगता ही नहीं कि आप किताब पढ़ रहे हैं. ऐसा लगता है कि आप अकबर के दरबार में एक कोने में खड़े हैं और सबकुछ देख सुन रहे हैं. आप मुगल बादशाह के साथ शाही भोजन कर रहे हैं जिसमें सौ से ज्यादा व्यंजन परोसे जा रहे हैं. आप ज़िल्लेइलाही के साथ शिकार पर जा रहे हैं और चीता मार रहे हैं. आप बादशाह के मुंह से गाली भी सुन रहे हैं और मोहब्बत का पैगाम भी. इतिहास को इतने दिलजस्प अंदाज में लिखना आसान नहीं होता. लेकिन इतने दिलचस्प अंदाज में लिखा गया है कि आपको लगता है कि आप उपन्यास पढ़ रहे हैं. बादशाह अकबर के बहाने उनके पिता हुमायूं और दादा बाबर का भी जिक्र बार बार आता है. मुगल सल्तनत का हिंदुस्तान पर शासन का एक पूरा सिलसिला सिलसिलेवार ढंग से पाठक की आंखों के सामने घूमने लगता है.

अकबर पढ़ कर ही पता चला कि बादशाह अकबर डिस्लेक्सिया बीमारी के शिकार थे. आपको याद होगा कि आमिर खान ने अपनी फिल्म तारे ज़मीन पर में इस मुद्दे को उठाया था. अकबर पढ़ कर ही इल्म हुआ कि बादशाह अकबर के शासनकाल में कुल मिलाकर पच्चीस साल तक अलग अलग मौकों पर आए पादरी उन्हें ईसाइयत की तरफ ले जाने की कोशिश करते रहे. जब कामयाब नहीं हो पाए तो मन मसोस कर बादशाह के लिए बोले.....जैसे जिए वैसे मरे. ना किसी को पता किस दीन में जिए, ना ही किसी को पता किस दीन में मरे.

अकबर पढ़ कर ही ज्ञान हुआ कि बादशाह अकबर दिल के हाथों मजबूर हो जाया करते थे और बागियों को अक्सर माफ कर दिया करते थे. (जबकि बादशाह अकबर के दादा बादशाह बाबर कहा करते थे कि भाईचारे का हुकूमत से कोई लाल्लुक नहीं. अगर भाई की तरह बर्ताव करना चाहते हैं तो तख्त छोड़ दीजिए. अगर बादशाह की तरह बर्ताव करना चाहते हैं तो भाईचारा छोड़ दिया जाए). अकबर पढ़ कर ही पता चला कि उस समय भी गाय और गौहत्या बड़ा मुद्दा था जिसे बादशाह ने अपने तरीके से सुलझा लिया था.

बादशाह सलामत ने गाय का गोश्त खाना हराम कर दिया. इस पर मुल्ले इतने भड़के कि अकबर को काफिर करार कर दिया. मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने चिढ़ कर लिखा...... गाया का गोश्त हराम करने की वजह ये थी कि बादशाह बचपन से ही कट्टर मजहबी हिंदुओं के साथ उठता बैठता था और गाय का एहतराम करना हिंदुओं के अकीदे के मुताबिक दुनिया की सलामती का सबब है और उन हिंदुओं की गलत बातें बादशाह के दिल में घर कर गयी थी और बादशाह गोमांस, लहसुन, और प्याज के खाने और दाढ़ी वाले और इस तरह के लोगों से परहेज करने लगे थे.....हिंदु काफिर जिनके बिना काम नहीं चलता, जो बहुत जल्द फौज और मुल्क का आधा हिस्सा लेंगे और मुगल और हिंदुस्तानी मुसलमानों में उन जैसा ताकतवर कोई नहीं, उनसे बादशाह सलामत का दिल नहीं भरता. बाकी लोग चाहें जो मांगे, मिलते उन्हें लात और घूंसे ही.......जब फतहपुर सीकरी में ये बात कही जाने लगी कि बादशाह सलामत हिंदू हो गये हैं तो बादशाह की तरफ से उनके वकील शेख अबुल फजल को जवाब देना पड़ा......इस गलत बात के पीछे था ये कि बादशाह सलामत अपने खुले दिलों दिमाग की वजह से हिंदू मुनियों से करीब से मिलते, हिंदुओं के ओहदे बढ़ाते और मुल्क की बेहतरी के लिए उनके साथ नेकी का बर्ताव करते...... यहां अबुल फजल सुलहेकुल का भी जिक्र करते हैं जो बादशाह अकबर ने चलाई थी और जजिया कर भी खत्म कर दिया था.

इसी तरह ईसाइयों के प्रति भी बादशाह अकबर नरम दिल रहे.. यहां तक कि 1602 में ईसाइयों की एक बहुत बड़ा मांग शाही फरमान निकाल कर पूरा कर दी. तब आगरा के पादरियों ने बादशाह सलामत से फरियाद की थी. आईंदा हमें कोई परेशान न करे, इसके लिए हमें एक फरमान दीजिए जिसमें ईसाइयों के लिए आपकी नेकदिली जाहिर हो ताकि पूरी सल्तनत में सब जान लें कि आप हमें अपना समझते हैं. इसके लिए मसौदा भी बादशाह को सौंपा गया. इसमें लिखा गया कि हजरत बादशाह की रिआया ये जान ले कि वो बिना रोक टोक के ईसाई बनने के लिए आजाद हैं. इस मसौदे से दरबार में खलबली मच गयी. दरबारियों ने कहा कि फरमान में ये बात नहीं होनी चाहिए. लेकिन बादशाह सलामत ने ऐसा फरमान जारी कर दिया.

अकबर पर गुफ्तगू करते हुए उपन्यासकार शाजी जमां अकबर पर गुफ्तगू करते हुए उपन्यासकार शाजी जमां

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने खासतौर से अपनी किताब में लिखा कि अगर कोई हिंदू, बच्चा या बड़ा, मर्जी के खिलाफ मुसलमान बनाया जाए तो वो चाहे तो अपने बुजुर्गों के दीन में लौट सकता है. कोई इंसान किसी के मजहबी मामले में दखल नहीं देगा और हर कोई अपनी मर्जी के दीन में जा सकता है....अगर कोई काफिर अपने गिरिजाघर, मंदिर या यहूदी अपनी इबादतगाह बनाना चाहे या पारसी अपने अंतिम संस्कार के लिए जगह बनाना चाहे तो कोई उन्हें रोके नहीं. अपने आप में यह फरमान ऐतिहासिक भी था और क्रांतिकारी भी. बादशाह अकबर शायद अपने दादा बादशाह बाबर की उस बात से कायल थे जिसका जिक्र बाबरनामा में किया गया है. उसमें लिखा गया है कि हिंदुस्तान में राज करना है तो गाय के मांस से परहेज करना चाहिए.

इसकी तुलना अगर आज के हिंदुस्तान से करे जहां गौमांस और गौहत्या को लेकर उथलपुथल मची है तो हम कह सकते हैं कि बादशाह अकबर कहीं ज्यादा दूरदर्शी थे. हर दीन के मानने वाले पर यकीन करना, उसे मौका देना और किसी तरह की रोकटोक नहीं लगाना....वो भी उस समय में जब मुल्लापन सर चढ़ कर बोल रहा था. ऐसा सिर्फ बादशाह अकबर ही कर सकते थे क्योंकि वो हिंदुस्तान पर राज करने नहीं आए थे. वो हिंदुस्तानियों के दिल पर राज करने आए थे. ऐसा उन्होंने अपने दादा बादशाह बाबर से सीखा था.

अकबर बादशाह बहुत पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन किताबें सुनना खूब पसंद करते थे. उनकी पसंदीदा किताब अखलाके नासिरी (जिंदगी जीने के तौर तरीकों पर लिखी गयी किताब ) थी. उसमें लिखा था कि...बादशाह को चाहिए कि वो अपने राज दिल में ही रखे ताकि जब चाहे अपना ख्याल बदल भी ले और ये बदकिस्मती भी सर पर न आए के खयाल बदलते दिख जाएं. इससे ज्यादा ये कि अगर दुश्मन को बादशाह के इरादों का पता चल गया तो चौंकन्ना हो जाएगा. राज भी रखना और अक्लमंदों से सलाह भी लेना, ये दोनों काम एक साथ इस तरह हो सकते हैं....सिर्फ ऐसे लोगों से सलाह लेनी चाहिए जो रुतबे, इज्जत, समझ और तदबीर वाले हों और जो अपनी राय सबके सामने बयान न करें. ऐसे लोगों से ना बोलें जो कमजोर अक्ल के हों.....जब कोई फैसला हो जाए तो उस फैसले की तरफ जाने वाले कदमों में ऐसे कदमों को भी मिला दीजिए जो बिल्कुल दूसरी तरफ जाते हों. ऐसा ना हो कि जिस तरफ का फैसला हुआ है बिल्कुल उस तरफ चल पड़ें या उससे बिल्कुल उल्टी तरफ. दोनों ही सूरत में शक पैदा हो सकता है या असल इरादा खुल सकता है. यह बात आज की राजनीति में भी बिल्कुल खरी उतरती है. या यूं कहा जाए कि बादशाह अकबर की शासन चलाने की जो रणनीति थी उसी पर आज के लोकतांत्रिक शासक भी अमल कर रहे हैं.

बादशाह अकबर एक शासक से क्या उम्मीद करते थे इसका एक उदाहरण हमें उनके उस खत से मिलता है जो उन्होंने अपने बेटे शहजादे मुराद को लिखा था जब शहजादे को मालवा का शासन संभालने भेजा गया था. तब अकबर ने लिखा था......कोई माफी मांगे तो उसे माफ कर दो. अपनी राय में लचीलापन रखो. दूरअंदेश, सही सोच वाले और बिना किसी लगाव के काम करने वाले इंसान से ही सलाह लो. आरामतलबी मत करो. ये बादशाहों का काम नहीं है. विदेशी परेशान न हों. इस बात का खास ख्याल रखो कि कारोबारी तुम्हारे बारे में अच्छी राय रखें क्योंकि ये राय दूर तक जाती है. चापलूसी की जबान से गुमराह न हो. इस सीख को आज के संदर्भ में देखा जाए तो सटीक बैठती है. किसी भी अच्छे जनसेवक के लिए इस पर अमल करना जरुरी है तभी वह चुनाव फिर से जीत सकता है और शासन कर सकता है.

एक दिन शहजादे ने पूछा...कोई एक दो किताब मुझे मिले जो जहन को बुलंद करे और पुरानी सोच को दूर करे तो इसमें मुझे हिदायत मिलेगी. अकबर ने तब महाभारत का तर्जुमा शहजादे के भेजा था.

बादशाह अकबर राजा बीरबल को बहुत मानते थे. बीरबल की मौत के बाद उनका शव नहीं मिला तो बादशाह बहुत रोए थे और राजा मानसिंह को शव का पता लगाने के लिए भेजा था. बादशाह ने मानसिंह से कहा था कि शव मिल जाए तो हिंदु रीतिरिवाजों के अनुसार गंगा में बहा देना.

एक बार बादशाह, शहजादा सलीम और बीरबल शिकार पर गये. गर्मी के वजह से बादशाह और शहजादे ने अपने अपने नीम आस्तीन और दोशाला उतार कर बीरबल को दे दिया.

बादशाह ने मजाक में कहा....गधे का बोझ है. राजा बीरबल ने तुरंत जवाब दिया....दो गधों का.

एक बार बादशाह सलामत ने बीरबल से पूछा. कौन चाहे है बरसना, कौन चाहे है धूप कौन चाहे है बोलना, कौन चाहे है चूप. बीरबल ने जवाब दिया. माली चाहे है बरसना, धोबी चाहे धूप बादशाह चाहे जो बोलना, चोर चाहे चूप.

ये किताब ई-कॉमर्स वेबसाइट अमेजन पर भी उपलब्ध है. इस लिंक को क्लिक करके आप अकबर खरीद सकते हैं.

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