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Contract Farming: क्या किसानों के लिए सुरक्षित है कांट्रेक्ट फार्मिंग, जानें इससे जुड़ी जरूरी बातें

Contract Farming: कांट्रेक्टर और किसानों के बीच आपसी संपर्क साफ होना चाहिये, जिससे किसानों को झिझक ना हो और खेती में आ रही समस्याओं का समय से निदान किया जा सके.

Safety for Contract Farming: जैसा कि नाम से ही साफ है, कांट्रेक्ट फार्मिंग (Contract Farming) के तहत कृषि योग्य जमीन इस्तेमाल करने का अनुबंध होता है. इसमें सरकार और बड़े किसान अपनी जमीन को पट्टे पर या कांट्रेक्ट(Contract or Agreement) पर दूसरे किसानों को खेती करने के लिये देती हैं. इस अनुबंध में जमीन के मालिक, सरकार, बड़े किसान और कृषिरत कंपनियां (Agriculture Firms) ही कांट्रेक्टर के रूप में काम करती हैं. इस अनुबंध के तहत खेती करने वाले किसान को अपनी उपज कांट्रेक्टर (Contractor) के हिसाब से ही बेचनी पड़ती है. इतना ही नहीं, इस अनुबंध में फसल के दाम पहले से ही तय कर लिये जाते हैं. कांट्रेक्ट फार्मिंग के तहत खेती करने वाले किसान को बीज, सिंचाई और मजदूरी आदि का खर्च नहीं उठाना पड़ता. खेती की लागत और उसकी तकनीक की जिम्मेदारी भी कांट्रेक्टर की ही होती है.

क्या हैं फायदे

  • अनुबंध खेती यानी कांट्रेक्ट फार्मिंग के तहत खेती करने वाले किसानों को लागत और नुकसान की चिंता नहीं करनी पड़ती.
  • कांट्रेक्ट फार्मिंग के तहत उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य पहले से ही निर्धारित कर दिया जाता है, जिससे कांट्रेक्टर को एक निश्चित रकम चुकानी  ही होती है.
  • इस माध्यम के जरिये किसानों को नई तकनीक सीखने और अच्छी गुणवत्ता की उत्पादन लेने में मदद मिलती है.
  • कांट्रेक्ट फार्मिंग के जरिये उगने वाली फसल बाजार में हाथोंहाथ बिक जाती है, किसानों को उपज की बिक्री के लिये मोलभाव नहीं करना पड़ता.
  • इसके जरिये स्टार्ट अप करने से युवाओं और किसानों को काफी लाभ होता है.
  • कुछ अनुबंधों के तहत फसलों की प्रोसेसिंग और मार्केटिंग भी शामिल होती है, जिसमें काफी श्रम की जरूरत होती है.
  • इसके लिये ग्रामीण इलाकों में महिलाओं और किसानों को अतिरिक्त आमदनी कमाने का अवसर मिल जाता है.
  • खेती के साथ-साथ प्रसंस्करण और उसकी मार्केटिंग करवाने वाले कांट्रेक्टर ही तकनीक, लागत और मजदूरी के खर्च का पूरा उठाते हैं

किसानों के लिये चुनौतियां

  • वैसे तो कांट्रेक्ट फार्मिंग खेती करने से किसानों की खरीद-बिक्री की चिंता दूर होती है, लेकिन किसानों को मन मुताबिक खेती करने की आज़ादी नहीं होती.
  • कांट्रेक्ट पूरा करने के लिये किसानों को बताये गये समय, जमीन, खाद, बीज और तकनीक के साथ ही खेती करनी होगी, किसान अपने मन से कोई योगदान नहीं दे सकता.
  • कांट्रेक्टर किसानों से खेती करवाने के लिये मनचाही कीमत तय कर देते हैं, जिससे कम कीमत में भी किसानों को कांट्रेक्ट पूरा करना पड़ जाता है.
  • कांट्रेक्ट के तहत बाजार में अच्छे दाम मिलने के बावजूद रजिस्टर्ड किसान खेत से निकली उपज को सिर्फ कांट्रेक्टर को ही बेच सकते हैं. 

कांट्रेक्ट का सरलीकरण

  • किसान (Farmer)और कांट्रेक्टर(Contractor) के बीच सभी शर्तें साफ और खुली होनी चाहिये, जिससे किसानों के मन में कोई वहम या शंका न रहे.
  • कांट्रेक्ट फार्मिंग(Contract Farming) के तहत दोनों पक्षों के बीच कागजी कार्यवाही और पंजीकरण होना चाहिये.
  • किसानों से सलाह-मशवरा करके ही अनुबंध खेती के नियम और कानून निर्धारित करने चाहिये.
  • कांट्रेक्टर और किसानों के बीच आपसी संपर्क साफ होना चाहिये, जिससे किसानों को झिझक ना हो और खेती आ रही समस्याओं का समय से निदान किया जा सके.

 

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