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दूध की डेयरी खोलने पर कैसे मिलती है मदद? जानें पूरा प्रोसेस

खुद की दूध डेयरी खोलकर अच्छी कमाई करने का सपना है. तो यूपी सरकार नंद बाबा दुग्ध मिशन के तहत 50% तक बंपर सब्सिडी लेने के लिए करें आवेदन. जानें कैसे सीधे आपके खाते में लाखों रुपये की सब्सिडी आएगी?

गांवों से लेकर शहरों तक में डेयरी फार्मिंग का बिजनेस काफी कमाई दे रहा है. यह एक ऐसा बिजनेस है जिसमें मंदी का कोई खतरा नहीं रहता. दूध और उससे बने प्रोडक्ट्स की मांग बाजार में साल के 12 महीने लगातार बनी रहती है. हर धर में इनकी दरकार होती है. लेकिन जब कोई पहली दफा खुद की डेयरी शुरू करने की सोचता है तो सामने कई दिक्कतें आती हैं. जिनमें पहली होती है भारी-भरकम पूंजी की आती है. अच्छी नस्ल की गाय-भैंस खरीदना, उनका पक्का शेड बनाना और चारा काटने की मशीन जैसी व्यवस्थाओं में लाखों का खर्च लग जाता है. 

इसी आर्थिक परेशानी को दूर करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने नंद बाबा दुग्ध मिशन जैसी शानदार योजनाएं शुरू की हैं. इस मिशन के तहत सरकार डेयरी खोलने के लिए न सिर्फ बैंक से आसान लोन दिलवाती है. बल्कि उस पर आपको 50 फीसदी तक की अच्छी खासी सब्सिडी भी दी जाती है. अगर आप दूध की डेयरी खोलने का मन बना रहे हैं. तो जान लीजिए सरकार इसमें आपको किस तरह मदद देगी.

किन योजनाओं में मिलती है सब्सिडी?

उत्तर प्रदेश सरकार के नंद बाबा दुग्ध मिशन के तहत अलग-अलग लेवल पर डेयरी शुरू करने के लिए कई स्कीमें चलाई जा रही हैं. इनमें मुख्यमंत्री स्वदेशी गो-संवर्धन योजना और नंदिनी कृषक समृद्धि योजना काफी पाॅपुलर हैं. अगर आप साहीवाल, गिर, थारपारकर जैसी स्वदेशी नस्ल की 2 से 4 दुधारू गायों से छोटी शुरुआत करना चाहते हैं. तो सरकार कुल लागत पर 50 प्रतिशत तक का भारी अनुदान देती है. वहीं अगर आप 25 दुधारू गायों वाली बड़ी कमर्शियल डेयरी यूनिट लगाना चाहते हैं.

तो प्रोजेक्ट कॉस्ट पर 50 फीसदी यानी अधिकतम 15 से 30 लाख रुपये तक की सरकारी मदद सीधे बैंक खाते में सब्सिडी के तौर पर भेज दी जाती है. यह सब्सिडी गायों की खरीद, उनके चारे, पक्के शेड बनाने के लिए, ऑटोमैटिक मिल्किंग मशीन और तीन साल के पशु बीमा खर्च को कवर करने के लिए दी जाती है. जिससे पशुपालक पर शुरुआती बोझ बिल्कुल नहीं पड़ता.


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फॉर्म भरने से पहले क्या चाहिए?

यूपी सरकार की ओर से दी जाने वाली डेयरी सब्सिडी का फायदा उठाने के लिए कुछ बुनियादी शर्तें और कागजात पूरे होने जरूरी हैं. सबसे पहले आवेदक उत्तर प्रदेश का मूल निवासी होना चाहिए और उसके पास पशुपालन का कम से कम 3 साल का एक्सपीरिएंस होना चाहिए. इसके अलावा आवेदक के पास पशुओं के शेड और हरे चारे की बुवाई के लिए अपनी खुद की या 7-10 साल के रजिस्टर्ड लीज वाली जमीन होनी चाहिए. 

डाॅक्यूमेंट्स की बात करें तो आपके पास आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पासबुक, पासपोर्ट साइज फोटो, निवास प्रमाण पत्र और जमीन की खतौनी की नई नकल होनी चाहिए. अगर आपने पशुपालन विभाग या किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से डेयरी फार्मिंग की ट्रेनिंग ली है. तो फिर उसका सर्टिफिकेट जरूर लगाएं. ट्रेनिंग सर्टिफिकेट होने से आपके आवेदन के सेलेक्ट होने के चांस काफी बढ़ जाते हैं.

कैसे करना है अप्लाई?

सरकारी मदद पाने के लिए आपको ज्यादा भागदौड़ करने की जरूरत नहीं है. इसके लिए आपको सबसे पहले पशुपालन विभाग के आधिकारिक नंद बाबा मिशन पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करना होगा. पोर्टल पर अपनी बेसिक डिटेल, जमीन का जानकारी और जिस योजना के तहत जितने पशुओं की डेयरी खोलनी है उसे सिलेक्ट करके सभी जरूरी दस्तावेज अपलोड करने होते हैं. 


दूध की डेयरी खोलने पर कैसे मिलती है मदद? जानें पूरा प्रोसेस

फॉर्म जमा होने के बाद जिला स्तर पर मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता वाली कमेटी आपके दस्तावेजों और मौके पर जमीन का फिजिकल वेरिफिकेशन करती है. वेरिफिकेशन में अगर सब कुछ सही पाया जाता है. तो फिर  प्रोजेक्ट को मंजूरी देकर बैंक से लोन पास कराया जाता है. जैसे ही आप यूनिट शुरू करते हैं और पशु खरीदते हैं. सरकार सब्सिडी की रकम सीधे आपके बैंक लोन खाते में ट्रांसफर कर देती है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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