राजस्थान पुलिस ने यूपी के कांस्टेबल को भेजा जेल, जानें मामला
राजस्थान पुलिस की गलतफहमी के चक्कर में लखनऊ के एक सिपाही को 166 दिनों तक सेंट्रल जेल में रहना पड़ा. लखनऊ के गोमतीनगर निवासी सिपाही अखिलेश त्रिपाठी को राजस्थान हाईकोर्ट राहत दी.

राजस्थान पुलिस ने तमाम नियमों को ताख पर रखते हुए एक ऐसा कारनामा किया है जिसकी पूरे देश में चर्चा हो रही है. राजस्थान पुलिस ने यूपी पुलिस के एक कांस्टेबल को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. कोर्ट में लड़ाई के बाद यूपी पुलिस के जवान को रिहाई मिली और उसके बाद मामला उजागर हुआ कि राजस्थान पुलिस ने केवल नाम एक जैसा होने के करण यूपी पुलिस के कांस्टेबल को मिस्टेकन आइडेंटिटी के तौर पर उठा लिया और जेल भी भेज दिया था.
कांस्टेबल अखिलेश त्रिपाठी की पत्नी ने कानूनी लड़ाई लड़ी और अपने पति को 166 दिन बाद रिहा कराने में सफल रही. जयपुर हाई कोर्ट के आदेश के बाद सिपाही अखिलेश त्रिपाठी राजस्थान की राजधानी जयपुर के जेल से 166 दिन बाद अपने घर लखनऊ वापस पहुंचे. अब ड्यूटी भी जॉइन कर ली है. पीड़ित अखिलेश त्रिपाठी नवंनर 2010 से सुरक्षा वाहिनी गोमतीनगर में सेवारत हैं.
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शिवरात्री के दिन उठा ले गई थी पुलिस
इसी साल शिवरात्री के दिन जब अखिलेश अपने दो बच्चों के साथ मंदिर से दर्शन कर निकले थे. इसी दौरान मंदिर के बाहर बिना नंबर की खड़ी एक काली स्कॉर्पियो से चार लोग निकले और पीड़ित अखिलेश त्रिपाठी को उठा ले गए. इस दौरान बच्चों ने उन्हें छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो सके. इसके बाद अखिलेश को लखनऊ से सीधे गंगापुर सिटी जिला सवाई माधोपुर थाने ले गए और जेल में डाल दिया. पुलिस ने उन्हें बताया कि उनके खिलाफ 420 का मुकदमा दर्ज है.
पीड़ित कहता रहा वो आरोपी नहीं
अखिलेश ने कहा, "ना ही मेरे खिलाफ कोई वारंट था और ना ही कोई मुकदमा था. जिसके खिलाफ 420 का मुकदमा दर्ज था उसका भी नाम अखिलेश त्रिपाठी था और मेरा भी नाम अखिलेश त्रिपाठी है. कई बार पुलिस वालों से कहा कि मैं वो व्यक्ति नहीं हूं, लेकिन पुलिस वालों ने एक भी नहीं सुनी. थाने पर जब लेकर गए इंस्पेक्टर के सामने पेश किया. मैंने इंस्पेक्टर से कई बार इस चीज को कहा कि मैं वह व्यक्ति नहीं हूं, लेकिन इंस्पेक्टर ने नहीं सुना और लोकब में डलवा दिया गया."
अखीलेश ने बताया कि रात के 9:00 बजे किसी तरह थाने से फोन करने की इजाजत दी गई, जिसके बाद लखनऊ में पत्नी से बात हुई तो उन्होंने इस मामले की पूरी जानकारी दी कि कैसे उन्हें राजस्थान लाया गया है. इसके बाद फिर सुबह उनके परिवार के लोग गंगापुर सिटी पहुंचे. 16 फरवरी 2026 को न्यायालय सीजीएम फर्स्ट के यहां पीड़ित को पेश कर दिया गया और न्यायालय में यह एफिडेविट लगाया गया कि अखिलेश वो व्यक्ति ही नहीं हैं. इसके साथ ही हलफनामा भी लगाने को कहा गया, लेकिन इसके बावजूद कोर्ट ने यह नहीं माना. कोर्ट ने पुलिस का साक्ष्य सही मानते हुए पीड़ित के पूरे साक्ष्य को फर्जी बता दिया और जेल भेज दिया.
कोर्ट ने भी पुलिस के साक्ष्य को माना सही
गंगापुर सिटी में एक दिन जेल में रखकर 17 तारीख को फिर से कोर्ट बुलाया गया और कहा गया कि आपके सारे साक्ष्य झूठे हैं और एफिडेविट पर साइन करने के लिए कहा गया. इसके साथ ही यह कहा गया कि लिखिए कि आपके सारे साक्ष्य झूठे हैं, लेकिन पीड़ित ने यह नहीं लिखा और यह कहता रहा कि मेरे सारे साक्ष्य सत्य है और सही हैं. इसके बाद 18 तारीख को पीड़ित को भरतपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया.
पत्नी ने लड़ी लंबी लड़ाई
इसके बाद परिवार न्याय के लिए लगातार दौड़ता रहा. पीड़ित की पत्नी लगातार पीड़ित को छुड़ाने के लिए लड़ाई लड़ती रही. लखनऊ से लेकर राजस्थान तक लगातार चक्कर लगाती रही और हाईकोर्ट में रिट्स दायर की. जज ने हाई कोर्ट में कहा कि केस वापस सीजेएम फर्स्ट ले जायें. इसके बाद फिर गंगापुर सिटी वापस आना पड़ा, लेकिन सीजेएम फर्स्ट ने पुलिस के साक्ष्य को सही मानते हुए केस को खारिज कर दिया और कहा कि ये वही मुलजिम है.
हालांकि, पीड़ित की पत्नी ने हार नहीं मानी. पीड़ित की पत्नी ने जमानत याचिका हाईकोर्ट में लगाया और यह कहा गया कि यह वो व्यक्ति नहीं है, इनको जमानत दी जाए लेकिन उसकी डेट को हर बार आगे बढ़ा दिया जा रहा था. आखिरकार साढे तीन महीने बीतने के बाद एक जज ने कहा कि लगातार पीड़ित कह रहा है कि ये वो व्यक्ति नहीं है तो इसकी सुनवाई क्यों नहीं की जा रही है?
कैसे पीड़ित का सच आया सामने?
वास्तव में आरोपी अखिलेश त्रिपाठी अलीगंज के रहने वाला था. अखिलेश त्रिपाठी सन ऑफ विश्वनाथ के नाम से एक कंपनी रजिस्टर्ड थी. यह कंपनी 1994 में रजिस्टर्ड की गई थी. जब इस कंपनी की पूरी जानकारी निकाली गई तब सामने आया कि अखिलेश के पिता का नाम विश्वनाथ है और उनके पिता के नाम पर ही कंपनी रजिस्टर्ड थी. कानपुर से जब कंपनी के कागजात निकलवाए गए, तब हकीकत सामने आया कि हाईकोर्ट के आयोग ने साल 1994 में विश्वनाथ को तलब किया था.
राजस्थान हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस से कहा कि वो साबित करे कि ये अखिलेश विश्वनाथ के ही बेटे हैं, लेकिन पुलिस ये बात साबित करने में नाकाम रही. इसके बाद पुलिस सीजेएम फर्स्ट के पास गई औ यह एफिडेविट लगाया कि उसने गलत व्यक्ति को पकड़ लिया है. इसके बाद कोर्ट ने पीड़ित अखिलेश को निर्दोष मानते हुए 31 जुलाई को बेगुनाह माना और जेल से छोड़ दिया गया.
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परिवार ने झेला मानसिक और वित्तीय तनाव
पीड़ित अखिलेश ने बताया कि आज तक परिवार के दरवाजे कभी पुलिस भी नहीं गई और इस तरह की घटना के बाद पीड़ित और पीड़ित का पूरा परिवार सदमे में है. पीड़ित के बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ा है. पूरा परिवार 166 दिन किस तरीके से जी रहा है और कैसे-कैसे कर के पीड़ित की पत्नी ने पैसे जमा किये लोगों से कर्जा लिया है ये वो और उसका परिवार ही जानता है. अखिलेश उत्तर प्रदेश विशेष सुरक्षा वाहिनी में नौकरी करते हैं, लेकिन किसी ने भी कोई मदद नहीं की. लखनऊ से लेकर राजस्थान से तक किसी ने भी पीड़ित का साथ नहीं दिया.
पीड़ित लेगा पुलिसवालों के खिलाफ एक्शन
पीड़ित ने जयपुर के हाई कोर्ट में उन सभी के खिलाफ केस दायर करने की तैयारी में है जिसने उसे गलत व्यक्ति समझ कर पकड़ा था. पीड़ित ने कहा कि जो भी इस मामले में शामिल है उसे छोड़ा नहीं जाएगा. अखिलेश का बड़ा बेटा 9वींं कक्षा में पढ़ता है और छोटा बेटा 7वीं कक्षा में पढ़ता है और इस मामले से दोनों की पढ़ाई पर असर पड़ा है. ड्यूटी पर अनुपस्थिति की वजह से कॉन्स्टेबल की 6 महीने सैलरी रुक गई. इससे परिवार पर वित्तीय और मानसिक दोनों तरह से दबाव पड़ा है.
25000 के चक्कर में एक बेगुनाह फंसा
वास्तव में जिस आरोपी को पुलिस ढूंढ रही थी वो 1994 में का आरोपी था, जिसपर 420 का इल्जाम लगा था, लेकिन 7 सितंबर 1998 को ही उसकी मौत हो चुकी थी. पुलिस ने 25000 के इनाम के चक्कर में एक बेगुनाह को 166 दिन की जेल करवा दी. राजस्थान हाईकोर्ट के वकील जगमोहन भारद्वाज ने भी माना कि एक बेगुनाह को केवल इसलिए जेल में रहना पड़ा क्योंकि जो मुलाजिम था उसपर 25 हजार का इनाम था.






















