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हरदोई लोकसभा सीट पर  इस बार दिलचस्प है मुकाबला, जानें- कौन किस पर पड़ रहा है भारी

हरदोई लोकसभा सीट से इस बार 11 उम्मीदवार मैदान में हैं। यहां मुख्य मुकाबला बीजेपी के जय प्रकाश, सपा की उषा वर्मा और कांग्रेस के वीरेंद्र कुमार के बीच है।

 

हरदोई, एबीपी गंगा। राजधानी लखनऊ से सटे होने के कारण अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हरदोई लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की अहम मानी जाती रही है। यह सीट नरेश अग्रवाल के नाम से ज्यादा चर्चा में रही है और राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है।

मैदान में हैं  11  उम्मीदवार

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने निवर्तमान सांसद अंशुल वर्मा का टिकट काट दिया, तो सांसद ने बगावत कर पार्टी छोड़ दी और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। हरदोई लोकसभा सीट से इस बार 11  उम्मीदवार मैदान में हैं। यहां मुख्य मुकाबला बीजेपी के जय प्रकाश, सपा की उषा वर्मा और कांग्रेस के वीरेंद्र कुमार के बीच है। शिवपाल सिंह यादव की पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) ने संजय भारतीय को मैदान में उतारा है। यहां से 4 उम्मीदवार बतौर निर्दलीय मैदान में हैं।

राजनीतिक समीकरण

आजादी के बाद से ही हरदोई सुरक्षित सीट है और अभी तक करीब 16 बार लोकसभा चुनाव हुए हैं। 1952 में चुनाव में बुलाकी राम वर्मा यहां से सांसद चुने गए थे, इसके बाद 1957 में हरदोई लोकसभा सीट बनी। कांग्रेस 6 बार यहां से चुनाव जीतने में सफल रही, जबकि 3-3 बार बीजेपी और सपा इस सीट पर जीत का परचम लहरा चुकी हैं।

जनसंघ को मिली जीत

1957 के लोकसभा चुनाव में जनसंघ हरदोई सीट पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही, लेकिन 1957 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने इस सीट पर कब्जा जमा लिया। इसके बाद से 1977 में कांग्रेस के हाथों से ये सीट निकली, लेकिन 1980 और 1984 में फिर जीत का परचम लहराया।

राम मंदिर आंदोलन का दिखा असर

साल 1989 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता दल के परमई लाल यहां से जीतकर संसद पहुंचे। इसके बाद राम मंदिर आंदोलन के दौरान 1991 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इस सीट पर कब्जा जमाया और लगातार दो बार जय प्रकाश यहां से सांसद चुने गए, लेकिन 1998 में ऊषा वर्मा ने सपा उम्मीदवार के तौर पर उतरकर बीजेपी के जीत का सिलसिले को रोक दिया।

नरेश अग्रवाल ने बदले समीकरण

नरेश अग्रवाल ने जब कांग्रेस छोड़कर अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस का गठन किया तो 1999 में जय प्रकाश इसी पार्टी के उम्मीदवार बनकर उतरे और ऊषा वर्मा से अपनी हार का बदला लिया। इसके बाद 2004 और 2009 में ऊषा वर्मा ने सपा उम्मीदवार को तौर पर जीत दर्ज की, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में अंशुल वर्मा जीत हासिल कर बीजेपी के वनवास को खत्म किया।

सामाजिक ताना-बाना

2011 की जनगणना के मुताबिक हरदोई लोकसभा सीट पर कुल जनसंख्या 25,84,173 है। इसमें 85.55 फीसदी ग्रामीण और 14.45 शहरी आबादी है। अनुसूचित जाति की आबादी इस सीट पर 30.79 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की आबादी 0.01 फीसदी है। इसके अलावा मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 13 फीसदी है।

विधानसभा सीट

कुर्मी, ब्राह्मण मततादाओं के अलावा ओबीसी की बड़ी आबादी इस क्षेत्र में हार जीत तय करने में अहम भूमिका निभाती रही है। यह जिला लखनऊ मंडल का हिस्सा है। हरदोई लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं, इनमें सवैजपुर, शाहाबाद, हरदोई, गोपामऊ और संदी विधानसभा सीटें शामिल हैं।

2014 का जनादेश

2014 के लोकसभा चुनाव में हरदोई संसदीय सीट पर 56.75 फीसदी मतदान हुआ था। इस सीट पर बीजेपी उम्मीदवार अंशुल वर्मा ने बसपा उम्मीदवार शिवप्रसाद वर्मा को 83  हजार 343 वोटों से मात दी थी।

बीजेपी के अंशुल वर्मा को 3,60,501 वोट मिले

बसपा के शिवप्रसाद वर्मा को  2,79,158 वोट मिले

सपा के उषा वर्मा को 2,76,543 वोट मिले

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