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सोनिया के क्षेत्र में BJP ने गड़ाई आंखें, तो क्या अदिति सिंह कांग्रेस को कह सकती हैं बाय

सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र में बीजेपी ने आंखें गड़ा रखी हैं। ऐसे में रायबरेली सदर से विधायक अदिति सिंह के बगावती सुरों से लग रहा है कि वो जल्द ही बीजेपी का दामन थाम सकती हैं।

लखनऊ, (आईएएनएस)। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अब नेहरू-गांधी परिवार के गढ़ और कांग्रेस अध्यक्ष (अंतरिम) सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में आंखें गड़ाना शुरू कर दिया है। भले ही बीजेपी ने साल 2019 में पूर्ण बहुमत हासिल कर केंद्र में सरकार बनाई हो, लेकिन रायबरेली सीट पर कब्जा न जमा पाने का मलाल पार्टी को अब भी है, तभी अब बीजेपी रायबरेली में कांग्रेस के अंदर सेंध लगाने की तैयारी में हैं। यहीं कारण है कि 2019 के रण में बीजेपी ने सोनिया गांधी के खिलाफ मैदान में कांग्रेस के विधान परिषद सदस्य और गांधी परिवार के कभी खास रहे दिनेश प्रताप सिंह को उतारा था।

अदिति सिंह और राकेश सिंह के बदले सुर

इन दिनों दिनेश के भाई हरचंदपुर से विधायक राकेश सिंह भी बीजेपी के समर्थन में सुर मिलाने नजर आ रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर गांधी परिवार की ही करीबी रायबरेली सदर सीट से कांग्रेस की विधायक अदिति सिंह ने भी पार्टी के खिलाफ बगावती सुर छेड़ दिए हैं। हाल ही में अदिति केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले का स्वागत करती नजर आई थीं। तभी से ही उनके सुर बदले हुए हैं।

कांग्रेस ने किया विशेष सत्र का बहिष्कार, लेकिन अदिति हुईं शामिल

अदिति के बदले सुर की दूसरी वजह विधानसभा के विशेष सत्र में हिस्सा लेना भी है। इस सत्र का विपक्ष द्वारा किए गए बहिष्कार के बाद भी अदिति ने न सिर्फ इसमें हिस्सा लिया, बल्कि भाषण भी दिया। दरअसल, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर योगी सरकार ने 36 घंटे तक चलने वाला विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया था। इस सत्र का सपा-बसपा और कांग्रेस सहित पूरे विपक्ष ने बहिष्कार किया। पार्टी लाइन को नजरअंदाज करते हुए अदिति देर शाम विधानसभा के विशेष सत्र में पहुंचीं और अपने विचार भी व्यक्त किए। इसी दिन कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने लखनऊ में पैदल मार्च निकाला, जिसमें वो शामिल नहीं हुईं।  माना जाता है कि अदिति सिंह को राजनीति में लाने का श्रेय प्रियंका गांधी को जाता है।

अदिति को मिली Y+ श्रेणी की सुरक्षा 

ये कहा जा सकता है कि अदिति के इन बगावती तेवरों का उन्हें इनाम भी मिला है। दरअसल, सत्ता पक्ष यानी योगी सरकार की तरह उन्हें Y+ श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराई गई है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि अदिति कांग्रेस का हाथ छोड़, बीजेपी का दामन थाम करती हैं।

तो क्या बीजेपी का दामन थामेंगी अदिति सिंह?

कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद विशेष सत्र में हिस्सा क्यों लिया, इसपर जब मीडिया ने अदिति से सवाल किया, तो उन्होंने कहा, 'मुझे लगा कि रायबरेली की विधायक होने के नाते मुझे विकास के मुद्दे पर और राष्ट्रीय विषय में भाग लेना चाहिए। मुझपर विश्वास जताकर जनता ने मुझे सदन भेजा है। मैंने अपने भाषण में देशहित की बात रखी है। मुझे विकास के लिए चुना गया है।' वहीं, बीजेपी में शामिल होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि राजनीति संभावनाओं का खेल है, पर अभी ऐसा कोई विचार नहीं है।

राजनीतिक विरोधी अदिति को कमजोर करने में जुटे: राजनीतिक विश्लेषक

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल का इसपर कहना है, 'अदिति के पिता के निधन के बाद उनके राजनीतिक विरोधी उन्हें कमजोर करने में जुट गए हैं। जिस कारण अदिति कमोजर पड़ रही थीं। उनके पास मजबूती का कोई आधार नहीं था। उनके पिता की दबंगई का सिस्टम भा आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं हैं। ऐसे में उनका राहुल और सोनिया का करीबी बताया जाना उनके राजनीतिक करियर को नुकसान पहुंचा रहा था।' उन्होंने कहा कि इस स्थिति में अदिति अपने संरक्षण और राजनीतिक भविष्य की दिशा ढूंढने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि, कांग्रेस उन्हें पार्टी से निकालने का कोई भी जोखिम नहीं उठाएगी। उदाहरण के तौर पर समझा जा सकता है कि दिनेश सिंह के भाई राकेश सिंह का बीजेपी के समर्थन में बार-बार बोलने के बावजूद पार्टी ने अब तब उनपर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की।

कौन हैं अदिति सिंह

सोनिया के क्षेत्र में BJP ने गड़ाई आंखें, तो क्या अदिति सिंह कांग्रेस को कह सकती हैं बाय

  • अदिति सिंह रायबरेली सदर से पहली बार कांग्रेस विधायक चुनी गई हैं।
  • उनके पिता अखिलेश सिंह रायबरेली सीट से पांच बार विधायक रहे हैं।
  • बीते दिनों अधिलेश सिंह के निधन पर शोक जताने के लिए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ भी रायबरेली स्थित उनके आवास पर गए थे, तभी से अदिति का रुख बदला-बदला बताया जा रहा है।
  • अखिलेश सिंह ने कांग्रेस से अपना सियासी सफर शुरू किया था।
  • पहली बार साल 1993 में वह कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए थे।
  • कांग्रेस से निकाले जाने के बाद भी वो कई बार निर्दलीय विधायक चुने गए।
  • अखिलेश सिंह को हराने के लिए कांग्रेस ने कई बार एड़ी-चोटी का जोर लगाया, लेकिन सफल नहीं हो पाई। कहा जाता है कि अखिलेश सिंह का खौफ ऐसा था कि कांग्रेसी उनके डर से पोस्टर भी नहीं लगा पाते थे।
  • सितंबर, 2016 में अखिलेश सिंह की बेटी अदिति सिंह कांग्रेस में शामिल हुईं। इस दौरान अखिलेश की भी कांग्रेस में वापसी हुई।
  • चुनाव में अखिलेश सिंह के रसूख का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रायबरेली में सदर से कांग्रेस को एकतरफा वोटें मिलती थीं, जो सोनिया गांधी की जीत का अंतर बढ़ा देती थीं। लेकिन कुछ दिन पहले ही बीमारी के चलते अखिलेश सिंह का निधन हो गया। अब भाजपा अदिति सिंह को अपने पाले में लाकर कांग्रेस को मात देने के प्रयास में है।
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