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Raipur News: आज ही के दिन साल 1857 में बीच चौक यह वीर जवान हुआ था शहीद, जानिए कौन हैं ये क्रांतिकारी

Chhattisgarh News: नारायण सिंह ने सोनाखान में अंग्रेजों से लड़ने के लिए अपनी खुद की सेना बना ली थी. उन्होंने 900 जवानों के साथ अंग्रेजी सेना पर मुंह तोड़ जवाब देने के लिए तैयार किए थे.

Raipur News: छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) की जमीन में सबसे बड़े क्रांतिकारी शहीद वीर नारायण सिंह की शनिवार पुण्य तिथि है. 10 दिसंबर 1857 में अंग्रेजों ने रायपुर के बीच चौराहे पर नारायणसिंह को फांसी पर लटका दिया था. इस लिए इस दिन को पूरे प्रदेश में वीर नारायण सिंह के बगावत की कहानी लोग याद करते है. चलिए आज उनकी पूरी कहानी जानते हैं कि जब छत्तीसगढ़ में सूखा पड़ा था तो कैसे अंग्रेजों के नाक के नीचे से इन्होंने अनाज भंडार लूट कर ग्रामीणों में बांट दिया था.

दरअसल, वर्तमान छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले के सोनाखान इलाके के एक बड़े जमींदार थे वीर नारायण सिंह. नारायण सिंह बिंझवार की कहानी काफी दिलचस्प है. जिस समय ये क्रांति हुई, उसी समय अंग्रेजी सेना छत्तीसगढ़ में अपना कब्जा जमाना चाहते थे. तब नारायण सिंह ने अंग्रेजो की टेंशन बढ़ा दी थी. अंग्रेजों को नारायण सिंह को पकड़ने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा. कई दिनों तक नारायण सिंह और अंग्रेज फौज के बीच गोलीबारी चलती रही, लेकिन अंग्रेज नारायण सिंह को पकड़ नहीं पाए. 

ग्रामीणों की भूख मिटाने के लिए अनाज भंडार लूटा 
इतिहासकार बताते है कि 1856 में लगातार 3 साल तक लोगों को अकाल का सामना करना पड़ा. इससे इंसान तो इंसान जानवर तक को दाने-दाने के लिए तरस पड़ गया था. तब नारायण सिंह ने अनाज भंडार से अनाज लूटकर ग्रामीणों में बंटवाया था. सोनाखान इलाके में एक माखन नाम का व्यापारी था. जिसके पास अनाज का बड़ा भंडार था. इस अकाल के समय माखन ने किसानों को उधार में अनाज की मांग को ठुकरा दिया. तब ग्रामीणों ने नारायण सिंह से गुहार लगाई, तब जमींदार नारायण सिंह के नेतृत्व में ग्रामीणों ने व्यापारी माखन के अनाज भण्डार के ताले तोड़ दिए और अनाज ग्रामीणों में बांट दिया.

जेल से किसानों नारायण सिंह को बाहर निकाला
इस लूट के बाद व्यापारी माखन ने रायपुर के डिप्टी कमिश्नर से शिकायत कर दी. तो उस समय के डिप्टी कमिश्नर इलियट ने सोनाखन के जमींदार नारायण सिंह के खिलाफ वारंट जारी कर दिया और नारायण सिंह को सम्बलपुर से 24 अक्टूबर 1856 में बन्दी बना लिया. कमिश्नर ने नारायण सिंह पर चोरी और डकैती का अपराध दर्ज किया था. लेकिन नारायण सिंह अंग्रेजों के कब्जे में कब तक रहते. संबलपुर के राजा सुरेन्द्रसाय की मदद से किसानों ने नारायण सिंह के रायपुर जेल से बाहर निकालने में सफल हुए, लेकिन इस घटना के बाद अंग्रेजी शासक आग बबूला हो गए. नारायण सिंह की गिरफ्तारी के लिए एक बड़ी सेना भेज दी. 
 
नारायण सिंह ने खुद की आर्मी बनाई 
नारायण सिंह ने सोनाखान में अंग्रेजों से लड़ने के लिए अपनी खुद की सेना बना ली थी. उन्होंने 900 जवानों के साथ अंग्रेजी सेना पर मुंह तोड़ जवाब देने के लिए तैयार किए थे. लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि उस समय नारायण सिंह के रिश्ते में चाचा लगने वाले देवरी के जमींदार ने अंग्रेजों की खुलकर सहायता की. इसके बाद स्मिथ की सेना ने लंबे समय के संघर्ष के बाद सोनाखान को चारो तरफ से घेरकर नारायण सिंह को गिरफ्तार करने में सफल रही.

रायपुर के जय स्तंभ चौक में दी गई फांसी
इसके बाद अंग्रेजों ने रायपुर के जय स्तंभ चौक पर आम नागरिकों के सामने नारायण सिंह को 10 दिसंबर 1857 में फांसी दे दी, लेकिन नारायण सिंह की बहादुरी से अंग्रेजों का छत्तीसगढ़ कब्जा का सपना टूटा. इसके बाद अंग्रेजी सेना के खिलाफ जमकर विरोध हुए. आम जनता के मन में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के भाव ने जन्म ले लिया और इसके बाद आए दिन छत्तीसगढ़ की जमीन से अंग्रेजी सेना को ललकारा गया.

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