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Goncha Festival 2023: 600 साल पुरानी परंपरा, जानिए क्या होती है बस्तर की तुपकी, दी जाती है भगवान जगन्नाथ को सलामी

Goncha Festival 2023: बस्तर में गोंचा पर्व परअनोखी परंपरानिभाई जाती है, यहां भगवान जग्गनाथ के रथ यात्रा में तुपकी से सलामी देने की परंपरा है, तुपकी बांस के नली से बनी एक बंदूक की तरह होती है.

Bastar News: पूरे देश में गोंचा पर्व की धूम मची हुई है. उड़ीसा के पुरी जगन्नाथ में धूमधाम से रथ यात्रा निकाली जा रही है. वही छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी खास अंदाज में गोंचा का महापर्व मनाया जाता है. जहां इस पर्व में 360 आरण्यक ब्राह्मण  समाज के लोगों के  साथ ही आदिवासी परंपरा की भी झलक देखने को मिलती है. बकायदा इस गोंचा महापर्व में छत्तीसगढ़ के दूसरे जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पर्व में शामिल होने आते हैं. यहां भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के दर्शन करने के साथ तुपकी चलाने का भी लुत्फ उठाते हैं.

दरअसल बस्तर में मनाए जाने वाली गोंचा पर्व में तुपकी  चलाने की परंपरा है. बांस से बनी तुपकी (बंदूक) की आवाज यात्रा के आनंद को और दोगुना कर देती है. खास बात यह है कि पूरे भारत में तुपकी चलाने की परंपरा बस्तर के अलावा और कहीं नहीं देखने को मिलती है. भगवान जगन्नाथ ,देवी सुभद्रा और बलभद्र के रथारुढ़ होने पर तुपकी "बांस से बनी बंदूक "से सलामी (गार्ड ऑफ ऑनर ) दी जाती है. तुपकी बस्तर के आदिवासियों के द्वारा तैयार की जाने वाली एक बांस  की बनी बंदूक होती है.

तुपकी का चलन सैकड़ों सालों से चला आ रहा है
600 सालों से अधिक पुरानी परंपरा है. बस्तर के जानकार हेमंत कश्यप बताते हैं कि बस्तर के ग्रामीण बांस की नली से तुपकी तैयार करते हैं. जिसमें एक जंगली मालकांगनी के फल को बांस की नली में डालकर फायर किया जाता है. जिससे गोली चलने की आवाज आती है. हेमंत कश्यप ने बताया कि तुपकी  शब्द मूलतः  तुपक  से बना है जो तोप का ही अपभ्रंश माना जाता है. वहीं 360 आरण्यक ब्राह्मण समाज के लोगों का कहना है कि बस्तर में गोंचा पर्व के दौरान तुपकी का चलन सैकड़ों सालों से चला आ रहा है. जो केवल बस्तर में ही देखने को मिलता है.इक्कीस तोपों से दी जाती है सलामी
बस्तर में 600 सालों से मनाए जाने वाले गोंचा पर्व में तुपकी खास आकर्षण का केंद्र भी होता है. यही वजह है कि ग्रामीण इन तुपकी को रंग- बिरंगी कागज और पन्नियों से सजाकर इसे और भी आकर्षक बनाते हैं. 21 तोपों की सलामी के तर्ज पर दी जाती है. तुपकी से सलामीबस्तर के ग्रामीण अंचलों में रहने वाले आदिवासियों के द्वारा तुपकी को तैयार किया जाता है इस पर्व के दौरान अंदरूनी गांव से आने वाले ग्रामीणों को तुपकी बेचकर एक अच्छी आय भी होती है.

तुपकी की तरह अलग-अलग खिलौने तैयार हो गए हैं
तुपकी चलन को भले ही आदिवासी अपने लिए खेल सा मानते हैं लेकिन पर्व के विधान से जुड़े लोगों का मानना है कि भगवान जगन्नाथ की यात्रा के दौरान उन्हें दिए जाने वाले सम्मान में इसे सलामी की तरह देखा जाता है. जिस तरह से रियासत काल में 21 तोपों की सलामी दी जाने की परंपरा थी उसी प्रकार बस्तर में जब गोंचा रथ यात्रा निकलती है तो बकायदा श्रद्धालु तुपकी को आसमान में फायर करते हैं. जिसे भगवान जगन्नाथ  के रथ यात्रा के सम्मान में एक सलामी का नाम दिया जाता है, हालांकि पिछले  कुछ सालों की तुलना में तुपकी चलन में  कमी आई है, तुपकी विक्रेताओं का कहना है कि आधुनिक काल में अब  तुपकी की तरह अलग-अलग खिलौने तैयार हो गए हैं ,जिसके चलते पहले की तुलना में अब तुपकी की कम बिक्री हो रही है.

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