Explained: लखनऊ से दिल्ली तक... आखिर क्यों बार-बार जलती कोचिंग सेंटर की इमारतें, भारत के फायर सेफ्टी सिस्टम की खामियां क्या?
India Fire Service Week: लखनऊ की 15 जानें सिर्फ एक संख्या नहीं हैं, बल्कि वे 15 सपने थे. हर बार ऐसा होने पर हम कहते हैं कि 'काश', लेकिन इससे कुछ नहीं बदलता. इसके लिए पहले सिस्टम को बदलना होगा.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में कोचिंग सेंटर की इमारत में भीषण आग लग गई. इस हादसे में स्टूडेंट्स समेत 15 लोगों की मौत हुई है. सभी मृतकों की उम्र 20 से 30 साल के बीच थी. महज 19 दिन पहले 3 जून 2026 को दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में होटल में आग लगी थी, जिसमें 21 लोगों की मौत हुई थी और मरने वालों में कई विदेशी नागरिक भी शामिल थे. इससे पहले 2026 में ही बिहार, 2025 में हैदराबाद और 2019 में सूरत में भी अग्निकांड हुए थे. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत में फायर सेफ्टी सर्विस कमजोर क्यों हैं...
पहली वजह: 'ऊंचाई का लूपहोल'- 15 मीटर का जाल
लखनऊ की जिस इमारत में आग लगी, वह G+3 यानी ग्राउंड और तीन मंजिल की थी. भवन नियमों के मुताबिक, 15 मीटर से ऊंची इमारतों के लिए फायर NOC लेना अनिवार्य है. लेकिन यह इमारत 15 मीटर से कम थी, इसलिए उसे फायर NOC की जरूरत नहीं पड़ी.
यानी एक कानूनी खामी ने इस इमारत को फायर सेफ्टी जांच से बाहर रख दिया. लखनऊ के मुख्य फायर ऑफिसर अंकुश मित्तल ने भी कहा कि इमारत को न तो फायर NOC की जरूरत थी और न ही मालिकों ने कभी इसके लिए आवेदन किया. विडंबना यह है कि जिस ऊंचाई ने इस इमारत को सख्त फायर सेफ्टी नियमों से बचाया, उसी ऊंचाई ने इसे मौत का जाल बना दिया.
दूसरी वजह: 'रेसिडेंशियल' में चल रहा था 'कमर्शियल' कारोबार
सबसे बड़ी लापरवाही यह थी कि इमारत को रेजिडेंशियल (आवासीय) मंजूरी मिली थी. लेकिन असल में वहां चार मंजिला कमर्शियल कॉम्प्लेक्स चल रहा था. इसमें पेट शॉप, गोदाम, गेमिंग जोन, कोचिंग क्लासेज और एक एनिमेशन ट्रेनिंग सेंटर थे.
बिल्डिंग के मालिकों ने बिना अनुमति के इमारत का इस्तेमाल बदल दिया और किसी अधिकारी ने इस पर ध्यान नहीं दिया.
तीसरी वजह: बिजली का बोझ और फायर सेफ्टी क्लीयरेंस न होना
जांच में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई कि इमारत में 20 किलोवाट बिजली की अप्रूव्ड कैपेसिटी थी, लेकिन असल में 35.50 किलोवाट बिजली का इस्तेमाल हो रहा था. यानी करीब दोगुना बिजली का बोझ. इतना ही नहीं, इमारत के पास फायर और इलेक्ट्रिकल सेफ्टी विभागों से NOC भी नहीं था.
चौथी वजह: सख्त कानून, लेकिन कोई सख्ती नहीं
भारत के पास नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) है, जो आग से सुरक्षा के लिए काफी सख्त नियम बताता है. लेकिन समस्या नियमों की नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने की है.
आर्किटेक्ट विनीता सिंघानिया के मुताबिक, 'खामी अक्सर फायर NOC जारी होने के पल से शुरू हो जाती है.' मंजूरी मिलने के बाद फायर सीढ़ियां, स्मोक शाफ्ट और निकासी मार्गों को बदल दिया जाता है. कई बार तो उन्हें स्टोरेज स्पेस में तब्दील कर दिया जाता है.
दिल्ली के मालवीय नगर में हुए एक होटल में आग की घटना में भी यही हुआ. होटल को 6 कमरों की मंजूरी मिली थी, लेकिन वहां 25 कमरे चल रहे थे. आर्किटेक्ट आनंद शर्मा का कहना है कि हमारे पास टेक्नोलॉजी, AI और डेटा है, हमें बस चीजों को जोड़ने की प्रशासनिक मदद की कमी है.'
पांचवी वजह: जांच के बाद सजा, लेकिन पहले कार्रवाई नहीं
लखनऊ हादसे के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चार अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया:
- गौरव कुमार- बिजली विभाग के कार्यकारी अभियंता
- कमलेंद्र कुमार सिंह- फायर सेफ्टी अधिकारी
- अनिल कुमार- LDA के सहायक अभियंता
- प्रमोद कुमार- LDA के जूनियर अभियंता
तीन लोगों को गिरफ्तार भी किया गया. लेकिन ये सब हादसे के बाद हुआ. लखनऊ की इस इमारत का नक्शा 2014 में मंजूर हुआ था. 2016 में ही इस पर अवैध निर्माण की कार्रवाई शुरू हुई थी, लेकिन कोई नहीं रुका.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, आधुनिक इमारतों में कांच, फॉल्स सीलिंग और लकड़ी का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है. ये चीजें आग को और तेजी से फैलाती हैं. इसके अलावा शहरों की सड़कें इतनी संकरी हैं कि फायर इंजन आसानी से नहीं पहुंच पाते.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक:
- 2022 में देशभर में 7,566 आग की घटनाएं दर्ज हुईं और 7,435 लोगों की मौत हुई.
- दिल्ली फायर सर्विस की रिपोर्ट के मुताबिक, 80% से ज्यादा आग इलेक्ट्रिकल फॉल्ट की वजह से लगती है. मुंबई में यह आंकड़ा 75% है.
- 2023 में देशभर में 6,891 लोगों की मौत हुई.
- 2024 में 5,888 लोगों की मौत हुई. इनमें से 3,555 मौतें (60.4%) घरों या रिहायशी इमारतों में हुईं.
क्या अब हालात बदलेंगे या लापरवाही बनी रहेगी?
हर हादसे के बाद सबको याद आता है कि सेफ्टी जरूरी है. फिर सब भूल जाते हैं. दिल्ली हाईकोर्ट ने पांच महीने पहले ही अधिकारियों को फायर सेफ्टी में कमियों को दूर करने का निर्देश दिया था. लेकिन लागू करना अधूरा रह गय. नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) की एक रिपोर्ट कहती है कि शहरी इलाकों की 70% एजुकेशनल बिल्डिंग्स आग के खतरे के प्रति संवेदनशील हैं.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक सख्ती सिर्फ कागजों पर रहेगी, जांच के बाद ही कार्रवाई होगी और '15 मीटर' जैसी कानूनी खामियां बनी रहेंगी, तब तक ये हादसे रुकने वाले नहीं हैं.
























