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उत्तराखंड त्रासदी: आखिर कैसे टूटते हैं ग्लेशियर, क्या है वजह ? एक क्लिक में जानिए सबकुछ

उत्तराखंड के चमोली में एक बार फिर कुदरत का कहर टूटा. यहा रविवार को ग्लेशियर टूटने से भारी तबाही हुई. कई गांवों से संपर्क टूट गया और कई पुल भी बह गए . इस त्रासदी में 150 से ज्यादा लोग बह गए और कई लोग अभी भी लापता हैं. ऐसे में ये जानना बेहद जरूरी है कि आखिर ग्लेशियर होते क्या हैं और ये कैसे टूटते हैं ?

उत्तराखंड के चमोली जिले में रविवार को एक ग्लेशियर टूटने से भारी बाढ़ आ गई थी,  जिसके बाद हजारों की तादाद में अलकनंदा और धौलीगंगा नदियों के पास रह रहे लोगों को सुरक्षा मुहैया कराई गई थी. ऋषिगंगा और एनटीपीसी बिजली संयंत्रों के पास बाढ़ से काफी नुकसान हुआ था. कई लोग अभी भी लापता है. वहीं इस तबाही ने एक बार फिर साल 2013 में केदारनाथ की भयंकर आपदा की याद को ताजा कर दिया. अब सवाल ये उठता  है कि आखिर ये ग्लेशियर कैसे टूटा?  ग्लेशियर क्या होते हैं और ये क्यों और कैसे टूटते हैं. आइए इन सभी सवालों के जवाब जानते हैं.

क्या होता है ग्लेशियर

ग्लेशियर बर्फ के एक जगह जमा होने की वजह से बनता है. ये दो प्रकार के होते हैं. पहला अल्पलाइन ग्लेशियर और दूसरा आइस शीट्स. जो ग्लेशियर पहाड़ों पर होते हैं उन्हें अल्पलाइन की श्रेणी में रखा जाता है.  गौरतलब है कि पहाड़ों पर ग्लेशियर टूटने की कई वजह हो सकती है.  जैसे कि किसी भू-वैज्ञानिक हलचल (गुरुत्वाकर्षण, प्लेटों के नजदीक आने, या दूर जाने) की वजह से जब इसके नीचे गतिविधि होती है तब यह टूटता है. कई बार ग्लोबल वार्मिंग की वजह से भी ग्लेशियर के बर्फ पिघल कर बड़े-बड़े बर्फ के टुकड़ों के रूप में टूटने लगते हैं. यह प्रक्रिया ग्लेशियर फटना या टूटना कहलाता है.

ग्लेशियर टूटने से भारी तबाही आती है

ग्लेशियर टूटने के बाद उसे अंदर ड्रेनेज ब्लॉक में मौजूद पानी अपना रास्ता खोज लेता है और जब वह ग्लेशियर के बीच से बहता है तो बर्फ के पिघलने का रेट भी बढ़ जाता है. इससे उसका रास्ता बड़ा हो जाता है और पानी एक सैलाब के रूप में आता है. इससे नदियों में अचानक से बहुत तेजी से जल स्तर भी बढ़ जाता है. नदियों के बहाव में आई तेजी से आसपास के इलाके जलमग्न हो जाते हैं और भारी तबाही मचती है.

ग्लेशियर लेक में कितना पानी जमा हो पाता है

ग्लेशियर लेक में पानी के जमा होने की मात्रा अलग-अलग होती है, इसमें लाखों क्यूबिक मीटर पानी जमा हो सकता है. अगर बर्फ का पिघलना जारी रहा तो यह पानी हिमनद झील से कुछ मिनटों में भी निकल जाता है, इसमें कुछ घंटे भी लग सकते हैं और कई दिन भी लग जाते हैं. लेकिन, अगर ये अचानक होता है तो इसी से भयंकर तबाही की आशंका अधिक होती है.

गौरतलब है कि छोटे-छोटे ग्लेशियर तो आए दिन टूटते ही रहते हैं लेकिन बड़ा ग्लेशियर दो या तीन साल के अंतर पर टूटता है जिसका पहले अनुमान लगा पाना मुमकिन नहीं हो पाता है

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