अब नेत्रहीन कैंडिडेट भी बन पाएंगे जज, सुप्रीम कोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी कैंडिडेट को उसकी शारीरिक अयोग्यता के आधार पर न्यायिक सेवा में भर्ती होने से नहीं रोका जा सकता. शारीरिक अयोग्यता वाले लोगों के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए.

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा नेत्रहीन उम्मीदवार भी जज बन सकते हैं. शीर्ष अदालत ने कहा कि नेत्रहीन उम्मीदवारों को न्यायिक सेवा में नौकरी से नहीं रोका जा सकता. अदालत ने मध्य प्रदेश के उस नियम को भी असंवैधानिक करार दिया, जो नेत्रहीन और दृष्टिहीन उम्मीदवारों को न्यायिक सेवाओं में नियुक्ति से रोकता था.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि किसी भी अभ्यर्थी को उसकी शारीरिक अयोग्यता के आधार पर न्यायिक सेवा में भर्ती होने से नहीं रोका जा सकता. बेंच ने कहा कि न्यायिक सेवा में शारीरिक अयोग्यता वाले लोगों के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए. इन लोगों का हौसला बढ़ाने के लिए राज्य सरकार की ओर से भी कदम उठाए जाने चाहिए.
द हिंदू के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला छह याचिकाओं पर सुनाया है. इनमें से एक मामले में कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था. ये याचिकाएं कुछ राज्यों में न्यायिक सेवाओं में नेत्रहीन उम्मीदवारों को आरक्षण न दिए जाने के मुद्दे पर दायर की गई थीं. इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश सेव परीक्षा नियम, 1994 के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए उन्हें रद्द कर दिया. लाइव लॉ के मुताबिक, कोर्ट ने राजस्थान न्यायिक सेवा परीक्षा से जुड़े विकलांग उम्मीदवारों की याचिका पर भी सुनवई की. उनका कहना था कि उन्हें अलग कट-ऑफ नहीं दिया गया, जिसकी वजह से वो मुख्य परीक्षा तक नहीं पहुंच सके.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो विकलांग उम्मीदवार न्यायिक सेवा की परीक्षा में शामिल हुए हैं. उन्हें फिर से चुने जाने का मौका मिलेगा. अगर वे सभी जरूरी योग्यताएं रखते हैं तो उन्हें खाली पदों पर नियुक्त किया जा सकता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विकलांग उम्मीदवारों के साथ ऐसा करना भेदभावपूर्ण होगा और सरकार को समावेशी नीति अपनानी होगी.
नेत्रहीन उम्मीदवार की मां ने पूर्व CJI को लिखा था पत्र
इस मामले की शुरुआत तब हुई जब एक नेत्रहीन उम्मीदवार की मां ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को पत्र लिखा था. इसे संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका के रूप में स्वीकार किया गया, जिसके बाद इस मामले में सुनवाई शुरू हुई. शीर्ष अदालत ने इस मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल, मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया. सुनवाई के बाद कोर्ट ने पाया कि परीक्षा में नेत्रहीन उम्मीदवारों के लिए आरक्षण नहीं दिया गया.
Source: IOCL


























