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RBI क्रेडिट पॉलिसी: आरबीआई ने नहीं बढ़ाया रेपो रेट, जीडीपी ग्रोथ 7.4 फीसदी रहने की उम्मीद

बैंक अपनी फंड की जरूरतों को पूरा करने के लिए आरबीआई से कर्ज लेते हैं और रेपो रेट वो दर है जिस पर रिजर्व बैंक ही बैंकों को कर्ज देता है. रेपो रेट में बढ़ोतरी होने से बैंकों के लिए फंड की लागत बढ़ जाती है जिसे पूरा करने के लिए उन्हें अपने लोन की ब्याज दरों को बढ़ाना पड़ता है.

नई दिल्लीः आरबीआई ने आज अपनी मॉनिटरी पॉलिसी में रेपो रेट 6.50 फीसदी पर बरकरार रखा यानि रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को नहीं बढ़ाया है. वहीं, रिवर्स रेपो रेट भी 6.25 फीसदी पर ही है यानि इसमें भी कोई बदलाव नहीं हुआ है. जबकि दूसरे तिमाही में रिटेल महगाई दर 4 फीसदी रहने का अनुमान है. जीडीपी ग्रोथ 7.4 बने रहने की उम्मीद जताई गई है.

रिजर्व बैंक की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की 3 दिन तक चलने वाली बैठक बुधवार यानी 3 अक्टूबर से शुरू हुई थी. मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तीन दिन की बैठक आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल की अध्यक्षता में शुरु हुई थी. बैठक के पहले आर्थिक जगत के ज्यादातर जानकारों का मानना था कि आरबीआई अपनी ब्याज दरों को लगातार तीसरी बार बढ़ाने जा रहा है. आरबीआई ने इससे पहले अगस्त और जून में रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट बढ़ाए थे.

चालू वित्त वर्ष की क्रेडिट पॉलिसी में आरबीआई के फैसले अगस्त-आरबीआई ने 1 अगस्त को रेपो रेट 0.25 फीसदी बढ़ाकर 6.5 फीसदी कर दिया था. रिवर्स रेपो रेट भी 0.25 फीसदी बढ़ाकर 6.25 फीसदी कर दिया गया था. सीआरआर (कैश रिजर्व रेश्यो) में कोई बदलाव नहीं किया गया और ये 4 फीसदी पर कायम रखा गया.

जून-आरबीआई ने 6 जून को रेपो रेट 0.25 फीसदी बढ़ाकर 6.25 फीसदी कर दिया था. वहीं रिवर्स रेपो रेट भी 0.25 फीसदी बढ़कर 6 फीसदी कर दिया था. सीआरआर में कोई बदलाव नहीं किया गया था और ये 4 फीसदी रखा गया.

अप्रैल- रिजर्व बैंक ने क्रेडिट पॉलिसी में नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं करते हुए रेपो रेट 6 फीसदी और रिवर्स रेपो रेट 5.75 फीसदी पर बरकरार रखा था. कैश रिजर्व रेश्यो यानि सीआरआर भी 4 फीसदी पर बरकरार रखा गया था.

रेपो रेट बढ़ने से क्यों महंगे होते हैं बैंकों के लोन बैंक अपनी फंड की जरूरतों को पूरा करने के लिए आरबीआई से कर्ज लेते हैं और रेपो रेट वो दर है जिस पर रिजर्व बैंक ही बैंकों को कर्ज देता है. रेपो रेट में बढ़ोतरी होने से बैंकों के लिए फंड की लागत बढ़ जाती है जिसे पूरा करने के लिए उन्हें अपने लोन की ब्याज दरों को बढ़ाना पड़ता है.

आरबीआई पर क्या है दवाब हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार ने खरीफ की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी कर दी है. वहीं अक्टूबर में ही रबी की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को भी बढ़ाने का एलान किया है. माना जा रहा है कि इससे महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है. रिजर्व बैंक दरों में बढ़ोतरी करता है ताकि महंगाई को काबू किया जा सके. दरअसल आरबीआई के सामने इस समय मार्केट की कैश की जरूरतों को पूरा करने के साथ -साथ एक और चुनौती भी है. रुपये में भारी गिरावट के बीच महंगाई दर को काबू में रख पाना एक बड़ा काम है.

महंगाई दर हाल के समय में महंगाई दर में कमी देखी गई है. अगस्त के महीने में खुदरा महंगाई दर का नीचे रहना आरबीआई के लिए थोड़ी राहत की खबर थी. अगस्त में खुदरा महंगाई दर (सीपीआई) 3.69 फीसदी पर रही जो इसका पिछले 11 महीने का सबसे निचला स्तर है. वहीं अगस्त में थोक महंगाई दर 4.53 फीसदी पर आई जो इसका पिछले चार महीने का सबसे निचला स्तर रहा. लेकिन कच्चे तेल के दाम में बढ़ोतरी और रुपये में आई भारी गिरावट के चलते आगे महंगाई बढ़ने की पूरी आशंका है.

तीन बैंक पहले ही बढ़ा चुके हैं कर्ज पर ब्याज दरें भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति की समीक्षा से पहले ही एसबीआई, आईसीआईसीआई बैंक और एचडीएफसी बैंक ने लोन पर ब्याज दरें बढ़ा दी हैं. देश के सबसे बड़े सरकरी बैंक एसबीआई ने इंटरेस्ट रेट में 0.5 फीसदी का इजाफा किया. प्राइवेट सेक्टर के सबसे बड़े बैंक आईसीआईसीआई बैंक ने 0.10 फीसदी ब्याज दरें बढ़ाई और एचडीएफसी बैंक ने भी ब्याज दरें 0.10 फीसदी बढ़ा दी हैं. इनके इंटरेस्ट रेट बढ़ने से इन बैंकों से कर्ज लेना महंगा होगा और पहले के मुकाबले ज्यादा ईएमआई चुकानी होगी.

क्या है रेपो रेट/रिवर्स रेपो रेट/सीआरआर रेपो दर वो दर है जिस पर रिजर्व बैंक बहुत ही थोड़े समय के लिए बैंकों को कर्ज देता है. इसके अलावा रिवर्स रेपो रेट वो है जिसपर बैंक आरबीआई को कर्ज देते हैं. सीआरआर यानी कैश रिजर्व रेश्यो का अर्थ है कि बैंकों को अपनी पूंजी का कुछ हिस्सा आरबीआई के पास रिजर्व रखना होता है और इसे कैश रिजर्व रेश्यो कहा जाता है.

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