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Night Curfew: ताकि आपको याद रहे कि कोरोना अभी जिंदा है

नाइट कर्फ्यू लगाने के फैसले पर सवाल उठाने वालों के अपने तर्क हैं लेकिन हकीकत यह है कि इससे पूरी तरह से न सही लेकिन कुछ हद तक संक्रमण के फैलाव को रोकने में पहले भी मदद मिली है.

नई दिल्ली: देश में बेकाबू होती कोरोना की दूसरी लहर के बीच कई राज्यों में नाइट कर्फ्यू लगाने के फैसले पर सवाल उठाया जा रहा है कि कोरोना का संक्रमण क्या सिर्फ रात में ही फैलता है?  ऐसी बहस करने वालों के अपने तर्क हैं लेकिन हकीकत यह है कि इससे पूरी तरह से न सही लेकिन कुछ हद तक संक्रमण के फैलाव को रोकने में पहले भी मदद मिली है.

ख़ासकर उन महानगरों में जहां नाइट लाइफ का प्रचलन ज्यादा है और जहां लोगों ने रात को बाहर जाकर खाने-पीने को अपनी जीवन-शैली का हिस्सा बना लिया है. लिहाज़ा सरकार नाइट कर्फ़्यू के ज़रिए जहां लोगों की आदत बदलना चाहती है, वहीं यह अहसास भी दिलाना चाहती है कि हम अभी भी कोरोना काल में ही जी रहे हैं,इसे हल्के में न लें.

आंकड़ों के लिहाज से देखें, तो इस साल के शुरुआती तीन महीनों में तकरीबन हर राज्य में लोगों ने इस कदर लापरवाही बरतना शुरु कर दी, मानो कोरोना महामारी खत्म हो चुकी है. इसमें महाराष्ट्र, पंजाब व मध्य प्रदेश जैसे राज्य अव्वल थे और उसका नतीजा सबके सामने है.

हालांकि एक पहलू ये भी है कि नाइट कर्फ्यू से कोरोना का संक्रमण कितना रुकेगा, इसे लेकर किसी तरह की कोई रिसर्च नहीं हुई है. नाइट कर्फ्यू की आलोचना करने वालों का कहना है कि छोटे शहरों में तो वैसे ही रात में लोग नहीं निकलते हैं. ऐसे में नाइट कर्फ्यू लगाने का क्या मतलब.

दरअसल,कोरोना की पहली लहर और दूसरी लहर के बीच बुनियादी फर्क यही है कि तब न तो टेस्टिंग, ट्रैकिंग की इतनी सुविधा थी और न ही वैक्सीन आई थी लेकिन साल भर में बहुत कुछ बदला है. अब सरकार के पास यही एकमात्र विकल्प है कि वह अर्थव्यवस्था पर कोई बुरा असर डाले बगैर रात के कर्फ्यू के जरिये संक्रमण के फैलाव को आंशिक तौर पर ही रोक सके.

इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ICMR के पूर्व प्रमुख डॉ रमन गंगाखेडकर नाइट कर्फ्यू के फैसले को सही ठहराते हुए कहते हैं, "हो सकता है कि नाइट कर्फ़्यू से कोरोना का फैलाव न रुके, लेकिन लोग इससे ये समझ सकते हैं कि हमें अपनी जीवनशैली बदलने की ज़रूरत है. कम्प्लीट लॉकडाउन लगाने से हमारी अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. इसका पहला मकसद ये है कि लोग कोरोना को गंभीरता से लें. लोग इसे लाइटली लेने लगे हैं, जो कि सही नहीं हैं, मामले लगातार बढ़ ही रहे हैं, इसलिए वैक्सीन आ जाने या उसे लगवा लेने के बावजूद वायरस को गंभीरता से लेना बेहद ज़रूरी है. नाइट कर्फ्यू से लोग वापस जागरुक होंगे."

रात का कर्फ्यू लगाने के पीछे सरकार का अपना तर्क है जो जायज भी लगता है. राज्य सरकारें पिछले साल अप्रैल जैसा कड़ा लॉकडाउन नहीं लगा सकती. क्योंकि पिछले लॉकडाउन की वजह से ही भारत की अर्थव्यवस्था अभी पूरी तरह से पटरी पर नहीं आ पाई है. ऐसे में,अगर सम्पूर्ण लॉकडॉउन लगा,तो सब कुछ चौपट होने का खतरा है. यही कारण है कि सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन में कंटेनमेंट जोन पर फोकस करने की बात कही गई है. लेकिन कंटेनमेंट जोन के बाहर किसी प्रकार का लॉकडाउन लगाने से पहले राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को केंद्र से अनुमति लेनी होगी.

सरकार का मानना है कि रात में कर्फ्यू लगाने से छोटे स्तर पर ही सही, लेकिन भीड़ कम करने में मदद मिलेगी. लोगों में जागरूकता आएगी कि अभी भी बिना वजह घर से बाहर निकलना खतरे से खाली नहीं है.

आखिरकार पीएम नरेंद्र मोदी को भी नाइट कर्फ्यू का महत्व मुख्यमंत्रियों को समझाना पड़ा कि, “कुछ बुद्दिजीवी डिबेट करते हैं क्या कोरोना रात में आता है. हकीकत में दुनिया ने रात्रि कर्फ्यू के प्रयोग को स्वीकार किया है, क्योंकि हर व्यक्ति को कर्फ्यू समय में ख्याल आता है कि मैं कोरोना काल में जी रहा हूं और बाकी जीवन व्यवस्थाओं पर कम से कम प्रभाव होता है. अच्छा होगा कि हम कर्फ्यू रात्रि 9 बजे से सुबह 5 तक चलाएं ताकि बाकी व्यवस्था प्रभावित ना हो और नाइट कर्फ्यू को कोरोना कर्फ्यू के नाम से प्रचलित करें. ये शब्द लोगों को एजुकेट करने के काम आ रहा है.“

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