Explained: मोदी, मोरारजी, देवगौड़ा सीधे बने प्रधानमंत्री… नीतीश, ज्योति बसु, मुलायम चूक गए मौका! जानें PM रेस के अनसुने किस्से
Dreaming of Prime Minister: भारत की राजनीति में कई ऐसे नेता हुए जो ऐड़ी-चोटी का जोर लगाकर भी प्रधानमंत्री नहीं बन पाए. तो कुछ ऐसे हैं जिन्हें PM की कुर्सी आसानी से मिल गई. आज बात- इन्हीं किस्सों की.

मार्च 2025 में बिहार विधानसभा चुनावों के बाद नीतीश कुमार ने रिकॉर्ड 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री की शपथ ली, लेकिन करीब एक साल बाद मार्च 2026 उनके राज्यसभा जाने की खबरें आ गईं. उन्होंने खुद से मुख्यमंत्री पद छोड़ने का ऐलान नहीं किया, लेकिन कयास कुछ और ही लग रहे हैं. इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा उनके PM बनने के सपने की हो रही है, जो टूट गया.
इस बीच एक पुरानी याद ताजा हो गई, नीतीश कुमार वो नेता हैं जिन्होंने कई बार प्रधानमंत्री पद की रेस में दम दिखाया. 2013-14 में उन्होंने नरेंद्र मोदी को PM चेहरा बनने का विरोध किया और 'सेकुलर PM' की बात की. 2023 में INDIA गठबंधन बनाते वक्त उनके नाम को PM फेस के तौर पर जोरदार तरीके से पेश किया गया, लेकिन गठबंधन की खींचतान में सपना अधूरा रह गया.
भारतीय राजनीति में कई ऐसे मुख्यमंत्री हुए जिनके नाम PM की रेस में जोरदार धूम मचाते रहे, लेकिन आखिरकार वो सपना दम तोड़ गया. तो वहीं कुछ CM को सीधे PM की कुर्सी मिल गई. आइए एक्सप्लेनर में इन कहानियों को खंगालते हैं...
ज्योति बसु: 1996 का वो प्रस्ताव जो पार्टी ने ठुकरा दिया
पश्चिम बंगाल के सबसे लंबे समय 1977 से 2000 तक मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु मई 1996 में प्रधानमंत्री बनने से सिर्फ एक कदम दूर थे. 1996 लोकसभा चुनावों में कोई पार्टी बहुमत नहीं पा सकी थी. जनता दल और वामपंथी दलों ने यूनाइटेड फ्रंट गठबंधन बनाया. कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देने का फैसला किया. मुख्य सूत्रधार CPI नेता हरकिशन सिंह सुरजीत थे. उन्होंने ज्योति बसु (बंगाल) का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे पहले और सबसे जोरदार तरीके से आगे बढ़ाया. यूनाइटेड फ्रंट में बसु का नाम आम सहमति से तय हो गया. बसु खुद इस प्रस्ताव के लिए तैयार थे, लेकिन CPM की पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी में हार्डलाइनर्स ने सख्त विरोध किया. 14 मई 1996 को सेंट्रल कमेटी की बैठक में तीन-चौथाई से ज्यादा सदस्यों ने वोट देकर कहा- 'कम्युनिस्ट पार्टी केंद्र में सरकार नहीं चलेगी.' सुरजीत और बसु दोनों पक्ष में थे, लेकिन पार्टी अनुशासन के आगे झुक गए.
नतीजा? बसु का नाम वापस ले लिया गया. बाद में ज्योति बसु ने इस फैसले को 'ऐतिहासिक भूल' कहा. 2000 के आसपास उन्होंने खुद स्वीकार किया कि पार्टी का ये फैसला कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए बड़ा नुकसान था.
मुलायम सिंह यादव: 1996 में PM की कुर्सी हाथ से फिसल गई
मुलायम उस समय उत्तर प्रदेश से लोकसभा के लिए पहली बार चुने गए थे मैनपुरी सीट से. सपा ने 17 सीटें जीती थीं. सुरजीत ने मुलायम का नाम PM पद के लिए सबसे आगे बढ़ाया. द स्टेट्समैन की रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुलायम उस रेस में सबसे आगे थे. सुरजीत का मानना था कि मुलायम का कद, समाजवादी विचारधारा और यूपी जैसे बड़े राज्य का प्रतिनिधित्व उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए सही बनाता है, लेकिन लालू प्रसाद यादव और शरद यादव ने सख्त विरोध कर दिया.
दोनों ने कहा कि यूपी से PM बिहार का संतुलन बिगाड़ देगा. क्षेत्रीय समीकरण और गठबंधन की अंदरूनी खींचतान ने मुलायम के रास्ते में दीवार खड़ी कर दी. नतीजा? मुलायम सिंह प्रधानमंत्री की जगह रक्षा मंत्री बने. वे 1 जून 1996 से 19 मार्च 1998 तक देश के रक्षा मंत्री रहे. इस दौरान उन्होंने रूस से सुखोई फाइटर जेट डील को अंतिम रूप दिया और चीन को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी थी. फ्रंटलाइन की रिपोर्ट्स में लिखा गया था कि मुलायम 'किसिंग डिस्टेंस' पर थे, लेकिन लालू-शरद के विरोध ने सब कुछ बदल दिया.
चौधरी देवीलाल: 1989 में रेस में थे, लेकिन खुद पीछे हट गए
हरियाणा के मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल (ताऊ देवीलाल) 1989 के समय पूरे देश में किसानों के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभरे थे. वे हरियाणा और राजस्थान की दो लोकसभा सीटों रोहतक और सीकर से भारी मतों से जीते थे. नेशनल फ्रंट के संसदीय दल की बैठक बुलाई गई. जनता दल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष मधु दंडवते ने बैठक की अध्यक्षता की. मंच पर वी.पी. सिंह, चौधरी देवीलाल और चंद्रशेखर बैठे थे. PM के नॉमिनेशन शुरू हुए. वी.पी. सिंह ने खड़े होकर चौधरी देवीलाल का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया. चंद्रशेखर ने उसे सेकंड किया. कोई और नाम नहीं था.
मधु दंडवते ने घोषणा कर दी कि देवीलाल जी सर्वसम्मति से चुने गए. सेंट्रल हॉल में सन्नाटा छा गया, लेकिन फिर देवीलाल अपनी पूरी ऊंचाई पर खड़े हुए. उन्होंने धीरे-धीरे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, 'मैं हरियाणा में ताऊ कहलाता हूं. यहां भी ताऊ ही रहना चाहता हूं. मैं अपना नाम वापस लेता हूं.' पूरी बैठक स्तब्ध रह गई. चंद्रशेखर का चेहरा उतर गया. उन्होंने महसूस किया कि उन्हें धोखा दिया गया है. देवीलाल ने बाद में स्पष्ट किया कि वे 'बड़ा भाई' बनकर काम करना चाहते हैं, प्रधानमंत्री नहीं. चौधरी देवीलाल उप-प्रधानमंत्री बने. वे कृषि और पर्यटन मंत्रालय भी संभाल रहे थे.
चंद्रबाबू नायडू: 90 के दशक के ‘किंगमेकर’ जो खुद कभी राजा नहीं बने
1 सितंबर 1995 को 45 साल के एन. चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, लेकिन असली खेल तो 1996 के लोकसभा चुनावों में शुरू हुआ. मई 1996 में कोई पार्टी बहुमत नहीं पा सकी. बीजेपी 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी 13 दिन में ही सरकार गिरा बैठे. कांग्रेस 140 सीटें लाई. अब गठबंधन की बारी थी. चंद्रबाबू नायडू ने TDP (तेलुगु देशम पार्टी) के 16 सांसदों के साथ यूनाइटेड फ्रंट नाम का 13 दलों का गठबंधन खड़ा किया. गठबंधन का मुख्यालय आंध्र प्रदेश भवन, नई दिल्ली बना दिया गया. नायडू खुद इसके कन्वीनर चुने गए. उन्होंने चेन्नई जाकर एम. करुणानिधि (DMK) और गुवाहाटी जाकर पी.के. महंता (असम गण परिषद) से मुलाकात की, लेकिन नायडू ने कर्नाटक के एच.डी. देवगौड़ा का नाम आगे बढ़ाया. लालू और शरद यादव ने उनका साथ दिया.
21 अप्रैल 1997 को नायडू ने फिर कमाल करते हुए आई.के. गुजराल को PM बनवाया. 1998 के चुनाव में TDP को 12 सीटें मिलीं. नायडू ने शुरुआत में तटस्थ रहने का फैसला किया, लेकिन 1999 में उन्होंने BJP के साथ गठबंधन कर लिया. TDP ने 29 सीटें जीतीं. नायडू ने वाजपेयी सरकार को बाहर से समर्थन दिया. वाजपेयी की सरकार पूरे 5 साल चली. इन सालों में चंद्रबाबू नायडू देश के सबसे बड़े किंगमेकर बन गए. उन्होंने दो PM (देवगौड़ा और गुजराल) बनाए, एक को (वाजपेयी) बचाया, लेकिन खुद कभी प्रधानमंत्री पद की रेस में नहीं उतरे. न तो किसी ने उन्हें PM उम्मीदवार बनाया, न उन्होंने खुद दावा किया. उन्होंने खुद को राष्ट्रीय पटल पर 'किंगमेकर' के रूप में स्थापित किया, लेकिन 'राजा' बनने का जोखिम कभी नहीं लिया.
ममता बनर्जी: INDIA ब्लॉक में नाम उछला, लेकिन रेस आगे नहीं बढ़ी
दिसंबर 2023 में नई दिल्ली में INDIA गठबंधन की चौथी बैठक हुई. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उस वक्त गठबंधन की सबसे मुखर और प्रभावशाली चेहरों में से एक थीं. TMC ने बैठक से ठीक पहले साफ-साफ कांग्रेस से कहा, 'ममता बनर्जी को INDIA ब्लॉक का चेहरा बनाओ.' 19 दिसंबर 2023 को बैठक में ममता ने खुद एक बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि '2024 चुनाव के बाद PM चेहरा तय होगा, अभी नहीं', लेकिन उसी बैठक में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में प्रस्तावित कर दिया. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उनका प्रस्ताव सपोर्ट किया. खड़गे ने जवाब दिया, 'पहले चुनाव जीतो, फिर PM की बात होगी.'
ममता ने गठबंधन का नाम 'INDIA' रखने में भी अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन उन्होंने हमेशा साफ कहा, 'मेरा फोकस बंगाल है.' दिसंबर 2024 में उन्होंने एक बार फिर कहा, 'अगर मौका मिला तो मैं INDIA ब्लॉक का नेतृत्व कर सकती हूं.' फिर भी, गठबंधन ने कभी कोई एक PM चेहरा नहीं बनाया. 2024 लोकसभा चुनाव में TMC ने पश्चिम बंगाल में 29 सीटें जीतीं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ममता का नाम PM रेस में आगे नहीं बढ़ा. ममता ने हमेशा क्षेत्रीय नेता की भूमिका में ही रहा. उन्होंने कहा, 'मैं बंगाल की दीदी हूं, पूरे देश की नहीं.' नाम उछला, चर्चा हुई, लेकिन गठबंधन की अंदरूनी खींचतान, कांग्रेस-राहुल गांधी का कद और ममता का अपना 'बंगाल फर्स्ट' रुख... इन सबने रेस को आगे नहीं बढ़ने दिया.
अरविंद केजरीवाल: दिल्ली मॉडल से राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा, लेकिन रुकावटें
अगस्त 2023 को मुंबई में INDIA गठबंधन की बैठक से ठीक पहले AAP के कुछ नेता और कार्यकर्ता खुलकर कह रहे थे कि 'अरविंद केजरीवाल को PM उम्मीदवार बनाओ.' दिल्ली का 'मुफ्त बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा' वाला मॉडल पूरे देश में चर्चा में था. AAP ने 2024 लोकसभा में 300 से ज्यादा सीटों पर लड़ने का ऐलान किया था. केजरीवाल खुद को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश कर रहे थे, लेकिन केजरीवाल ने साफ इनकार कर दिया. फरवरी 2022 में उन्होंने कहा था, 'मैं PM की रेस में नहीं हूं.' मई 2024 में फिर दोहराया, 'मेरा कोई इरादा PM बनने का नहीं है.'
AAP नेता आतिशी ने भी अगस्त 2023 में स्पष्ट किया, 'केजरीवाल PM रेस में नहीं हैं.' 2024 लोकसभा चुनाव में AAP ने सिर्फ 22 सीटों पर लड़ाई लड़ी और सीमित सफलता मिली. सितंबर 2024 में केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और कहा, 'लोगों से ईमानदारी का सर्टिफिकेट लेकर ही वापस आऊंगा.' लेकिन 2025 दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP बुरी तरह हारी, सिर्फ 22 सीटें मिलीं. 2025 के बाद अब AAP दिल्ली में विपक्ष में है और केजरीवाल का फोकस फिर दिल्ली वापसी पर है. PM पद की रेस में नाम उछला, महत्वाकांक्षा दिखाई, लेकिन पार्टी का आधार अभी तक दिल्ली और पंजाब तक सीमित रहा.
ये कहानियां बताती हैं कि भारतीय राजनीति में PM बनना सिर्फ महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि पार्टी, गठबंधन, क्षेत्रीय संतुलन और समय का खेल है. हालांकि, कुछ नाम ऐसे भी हैं, जो CM की कुर्सी से सीधे PM की कुर्सी पर बैठे...
नरेंद्र मोदी: गुजरात के मुख्यमंत्री पद से सीधे प्रधानमंत्री बने
7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने. 2002 के दंगों के बाद भी उन्होंने 'विकास' और 'गुजरात मॉडल' का नारा दिया. तीन बार (2002, 2007, 2012) चुनाव जीते. 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें पूरे देश का चेहरा बनाया. 16 मई 2014 को भाजपा ने 282 सीटें जीतीं. 26 मई 2014 को नई दिल्ली के रायसीना हिल्स पर मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. वो बिना केंद्र में लंबा इंतजार किए गुजरात से सीधे PM बने. आज भी उन्हें 'गुजरात से दिल्ली' की सबसे बड़ी सफलता माना जाता है.
मोरारजी देसाई: अविभाजित बॉम्बे राज्य के मुख्यमंत्री से देश के पहले गैर-कांग्रेसी PM
1952-1956 तक मोरारजी देसाई अविभाजित बॉम्बे राज्य (आज का महाराष्ट्र और गुजरात) के मुख्यमंत्री रहे. फिर केंद्र में कई मंत्री पद संभाले. 1975-77 की इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी बनी. मार्च 1977 के चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को हराया. 23 मार्च 1977 को 81 साल के मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. वे भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने. 28 जुलाई 1979 तक सरकार चली. बॉम्बे CM से 21 साल बाद PM बने. इमरजेंसी विरोध की लहर ने उन्हें ऊंचा उठाया.
चौधरी चरण सिंह: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक
चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश के कई बार मुख्यमंत्री रहे, लेकिन 1979 में जनता पार्टी में टूट हुई. 28 जुलाई 1979 को मोरारजी देसाई की सरकार गिरने के बाद चरण सिंह को समर्थन मिला. 28 जुलाई 1979 को उन्होंने राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी से प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन उनकी सरकार सिर्फ 23 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक चली. कांग्रेस ने बाहर से समर्थन वापस ले लिया. फिर भी वे यूपी के CM से सीधे PM बने. लखनऊ से दिल्ली तक का उनका सफर किसानों के नेता के रूप में याद किया जाता है.
वी. पी. सिंह: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से 1989 में प्रधानमंत्री
9 जून 1980 से 10 मार्च 1982 तक वी.पी. सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, फिर केंद्र में वित्त मंत्री बने. 1987 में राजीव गांधी सरकार से इस्तीफा दिया. 1988 में जनता दल बनी. 1989 लोकसभा चुनाव में नेशनल फ्रंट ने बहुमत नहीं पाया, लेकिन समर्थन मिल गया. 2 दिसंबर 1989 को संसद के सेंट्रल हॉल में ऐतिहासिक बैठक हुई. चौधरी देवीलाल ने अपना नाम वापस लेकर वी. पी. सिंह को PM बनवाया. 2 दिसंबर 1989 को वी. पी. सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. यूपी CM से सिर्फ 7 साल बाद PM बने. मंडल कमीशन और भ्रष्टाचार विरोध की लहर ने उन्हें सत्ता सौंपी.
पी. वी. नरसिम्हा राव: आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से 1991 में प्रधानमंत्री बने
30 सितंबर 1971 से 10 जनवरी 1973 तक पी. वी. नरसिम्हा राव आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. फिर केंद्र में कई मंत्री पद संभाले. 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस संकट में थी. 21 जून 1991 को 70 साल के नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. वे आंध्र CM से 18 साल बाद PM बने. 1991-96 तक उन्होंने आर्थिक सुधार शुरू किए. हैदराबाद से दिल्ली तक उनका सफर 'अनिच्छुक प्रधानमंत्री' के रूप में जाना जाता है.
एच. डी. देवगौड़ा: कर्नाटक के मुख्यमंत्री से 1996 में प्रधानमंत्री पद तक सफर
11 दिसंबर 1994 को एच. डी. देवगौड़ा कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने. मई 1996 में यूनाइटेड फ्रंट गठबंधन बना. ज्योति बसु और मुलायम सिंह यादव के नाम पीछे हटने के बाद 29 मई 1996 को देवगौड़ा को PM उम्मीदवार चुना गया. उन्होंने कर्नाटक CM पद से इस्तीफा दिया और 1 जून 1996 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. वे 17 दिन मुख्यमंत्री रहने के बाद PM बन गए थे. उनकी सरकार 21 अप्रैल 1997 तक चली.
Source: IOCL



























