29 साल पहले जिस पेपर लीक ने बनाया धर्मेंद्र प्रधान को नेता, आज उसी मुद्दे ने छीन ली उनकी कुर्सी!
देश में लंबे अर्से बाद शिक्षा को लेकर आंदोलन चल रहा था. प्रधान ने कहा, 'राष्ट्रपविरोधी ताकतों को भ्रम फैलाने और स्थिति का फायदा उठाने से रोकने के लिए पद छोड़ने का फैसला किया है.'

57 साल उम्र के शिक्षामंत्री रहे धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार इस्तीफा दे दिया है. कभी युवा जोश में इसी पेपर लीक को हथियार बनाकर उन्होंने दक्षिणपंथ की सियासत में कदम रखा. देश के केंद्रीय नेतृत्व का हिस्सा बने. लेकिन एक पेपर लीक और 50 दिन तक चले प्रदर्शन ने उन्हें कुर्सी से त्यागपत्र देने को आखिरकार मजबूर कर दिया.
देश में लंबे अर्से बाद शिक्षा को लेकर आंदोलन चल रहा था. प्रधान ने कहा, 'राष्ट्रपविरोधी ताकतों को भ्रम फैलाने और स्थिति का फायदा उठाने से रोकने के लिए पद छोड़ने का फैसला किया है.'
जिस मुद्दे ने बनाया नेता, उसी ने छिनी कुर्सी
पिछले कुछ सालों में बीजेपी सरकार के भरोसेमंद केंद्रीय मंत्री बनकर उभरे प्रधान की पहचान कुशल आयोजक, एक मंत्री और एक राजनीतिक प्रबंधक के तौर पर भी है. वह उन गिने चुने ओडिशा के लोगों में हैं, जिन्होंने राजनीति के राष्ट्रीय फलक पर अपनी छाप छोड़ी. लेकिन नियति का खेल देखो, जिस शिक्षा को लेकर उन्होंने 28 साल पहले राजनीतिक मुद्दा बनाया था, वही मुद्दा उनके पद ले गया.
पेपर लीक के एक आंदोलन से राजनीतिक करियर की शुरुआत
पेपर लीक के एक आंदोलन से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई. साल 1997 था. प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी. इसके मुख्यमंत्री वल्लभ पटनायक थे. पूरे राज्य में पेपर लीक का मामला गरमाया था. उस समय प्रधान एबीवीपी के राष्ट्रीय सचिव और उत्कल यूनिवर्सिटी से एंथ्रोपोलॉजी की पढ़ाई कर रहे थे. 28 साल के धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में 1500 स्टूडेंट ने भुवनेश्वर के राज्य सचिवालय का घेराव किया. इस दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता से लाठियां चलाई. इसमें प्रधान गंभीर रूप से घायल हो गए. उनके शरीर की हड्डियां टूटी. आज भी कहा जाता है कि अपनी किस्मत की वजह से ही प्रधान आज जिंदा हैं.
प्रधान दो बार ABVP के राष्ट्रीय सचिव भी रहे
18 साल के उम्र में एक छात्र के तौर पर उन्होंने रानजीति में कदम रखा. प्रधान ने आरएसएस के स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन ABVP में एक सक्रिय आयोजक के रूप में पहचान बनाई. 1994 से 1997 के बीच दो बार एबीवीपी में एक सक्रिय आयोजक के तौर पर पहचान बनाई. 1994 से 1997 के बीच दो बार एबीवीपी के राष्ट्रीय सचिव भी रहे.
1997 में ओडिशा के इस ऐतिहासिक आंदोलन के बाद वह बीजेपी में शामिल हो गए. उन्होंने बीजेपी की जड़ों को मजबूत किया. इसका नतीजा साल 2024 में दिखा. भाजपा ने ओडिशा में नवीन पटनायक के 24 साल पुराने बीजू जनता दल के शासन को खत्म किया. बीजेपी ने इसी साल पहली बार सरकार बनाई. उन्हें केंद्र में सबसे पेट्रोलियम और कौशल विकास जैसे अहम मंत्रालय को संभालने के बाद 2021 में देश का शिक्षामंत्री बनाया.
























