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कोर्ट के फैसले से देश में दलित उत्पीड़न के मामले बढ़ने का खतरा है: केंद्र सरकार

सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में केंद्र सरकार पक्ष नहीं थी. लेकिन जब कोर्ट ने सुनवाई का दायरा बड़ा करने का फैसला किया, तब केंद्र सरकार से भी पक्ष रखने को कहा. केंद्र की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने लगभग डेढ़ घंटे तक दलीलें रखीं. उन्होंने SC/ST एक्ट में किसी भी तरह के बदलाव का विरोध किया.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के SC-ST act पर ताज़ा फैसले के बाद देशभर में आज बवाल मच गया. भारत बंद के दौरान सात लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. सुुप्रीम कोर्ट के फैसले को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के माथे मढ़कर विपक्ष इसे दलित विरोध बता रहा है, वहीं सरकार ने कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ एक केंद्र में एक पुनर्विचार याचिक दायर की है.

सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में केंद्र सरकार पक्ष नहीं थी. लेकिन जब कोर्ट ने सुनवाई का दायरा बड़ा करने का फैसला किया, तब केंद्र सरकार से भी पक्ष रखने को कहा. केंद्र की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने लगभग डेढ़ घंटे तक दलीलें रखीं. उन्होंने SC/ST एक्ट में किसी भी तरह के बदलाव का विरोध किया.

सरकार का पक्ष रखते हुए मनिंदर सिंह ने कहा कि इस कानून का मकसद सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्ग को ताकत देना है. ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए जिससे इस मकसद को चोट पहुंचे. उन्होंने आगे कहा कि कानून को संसद ने पास किया और सुप्रीम कोर्ट इसके प्रावधानों को सही करार दे चुका है. इसी वजब से अब इसकी नए सिरे से सुनवाई ज़रूरी नहीं है.

सिंह के मुताबिक अगर किसी की शिकायत झूठी पाई जाए, तब भी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. आंकड़ों के मुताबिक इस एक्ट से जुड़े मामलों में लोगों को दोषी करार देने का प्रतिशत महज़ 15 से 20 का ही रहा है. हालांकि, कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि सम्मान से जीवन जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार हर नागरिक को है. किसी कानून के दुरुपयोग से निर्दोष लोगों के जेल जाने पर अदालत मूकदर्शक की भूमिका नहीं निभा सकती.

पुनर्विचार याचिका में सरकार ने क्या कहा है

केंद्रीय कानून मंत्रालय की तरफ से आज दाखिल याचिका में कोर्ट से पुरानी स्थिति बहाल करने की मांग की गई है. सरकार ने कहा है कि तमाम उपाय के बावजूद समाज मे अनुसूचित जाति/जनजाति की स्थिति कमजोर है. कोर्ट के फैसले से देश में दलित उत्पीड़न के मामले बढ़ने का खतरा है. पूरे मसले पर खुली अदालत में दोबारा सुनवाई की मांग करते हुए सरकार ने कहा है कि जिस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया है, उसमें सरकार पार्टी नहीं थी और क़ानून बनाना संसद का काम है. कोर्ट ये नहीं कह सकता कि किसी क़ानून का स्वरूप कैसा हो.

सरकार ने आगे कहा कि किसी क़ानून को सख़्त या नर्म बनाने का अधिकार संसद के पास है. मौजूदा हालात के मद्देनज़र कैसा क़ानून बने, ये तय करना संसद या विधानसभा का काम है और कोर्ट सिर्फ तीन आधार पर किसी क़ानून को रद्द कर सकता है. इन्हें तब रद्द किया जा सकता है जब-

A) मौलिक अधिकार का हनन हो

B) कानून ग़लत बनाया गया हो

C) उस क़ानून को बनाना संसद के अधिकार क्षेत्र में न आता हो

सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला SC/ ST वर्ग के मौलिक अधिकार का हनन. ये फैसला उन्हें अनुच्छेद 21 के तहत मिले सम्मान से जीवन जीने के मौलिक अधिकार से वंचित करता है. सरकार ने आगे कहा कि वंचित तबके के खिलाफ अपराध लगातार जारी है. अगर आरोपी को अग्रिम जमानत दी गई तो वो पीड़ित को डरा सकता है. वो जांच में बाधा डाल सकता है. वहीं सरकार का मानना है कि तथ्य बताते हैं कि कानून के लागू करने में कमजोरी है, ना कि इसका दुरुपयोग हो रहा है.

विवाद क्या है?

सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद दलित समुदाय में नाराजगी है. सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी. सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत की व्यवस्था दी. 7 दिनों के अंदर शुरूआती जांच पूरा करने का आदेश दिया है. दलित एक्ट के तहत गिरफ्तारी के लिए एसएसपी की अनुमति जरूरी कर दी गई. सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी के लिए उच्च अधिकारी की अनुमति जरूरी है. दलित संगठन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं हैं.

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