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अरुण जेटली- एक ‏शख्सियत, 3 अलग पहचान: शानदार वकील, अनुभवी सांसद और काबिल मंत्री

नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में वित्त मंत्री रहे वरिष्ठ बीजेपी नेता अरुण जेटली का शनिवार को निधन हो गया. वे 67 साल के थे.

नई दिल्ली: पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के निधन के साथ ही भारतीय राजनीति के एक सुनहरे दौर का अंत हो गया है. जैसे ही एम्स से ये खबर आई कि अब जेटली इस दुनिया में नहीं रहे, राजनीति की दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई. खेल और सितारों की दुनिया भी मायूस हो गई. जनता जनार्धन पर भी ग़म का पहाड़ टूट गया. हर तरफ मायूसी छा गई.

जेटली के निधन को राजनीतिक दुनिया की एक बड़ी क्षति बताई गई. हालांकि, जेटली की शख्सियत को सिर्फ राजनीति में बांधना उनके व्यक्तित्व को कम आंकने जैसा होगा. वो एक वक्त में कई मैदान में अपनी सेवाएं दे रहे थे और जिस जगह भी रहे उनके काम की वाहवाही रही.

यूं तो जेटली छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे, लेकिन कानूनी उनका पहला प्यार था, तो राजनीति ओढ़ना बिछौना. राजनीति ने जब भी कुछ पल चुराकर आराम के दिए तो उसे कानूनी दांव पेंच संभालने में गुजार दिए. बीच-बीच में खेल से भी वासता हुआ और वहां भी उन्होंने कमाल किया. वो आजावीन काल कभी लोकसभा के सांसद नहीं बन पाए, जिसका उन्हें मलाल भी रहा होगा, लेकिन राज्यसभा ने हमेशा उन्हें दिल से लाए रखा. आज जब उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा तब भी वे राज्यसभा के सदस्य थे.

आइए जानते हैं- तीन चेहरे

मंत्री

अरुण जेटली का नाम भारतीय जनता पार्टी में किस कद्दावर नेता का नाम था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में दूसरे नंबर के सबसे अहम शख्सियत माने जाते थे. उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी अहम भूमिका निभाई थी.

सन 1999 में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के सत्ता में आने पर 13 अक्टूबर 1999 को अरुण जेटली को सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया. इसके अलावा उन्हें विनिवेश राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भी नियुक्त किया गया. विनिवेश नीति को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए तब यह नया मंत्रालय बनाया गया था. इसके बाद जेटली 23 जुलाई 2000 को कानून, न्याय और कंपनी मामलों के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बने. राम जेठमलानी के इस्तीफा देने के बाद उन्हें यह मंत्रालय सौंपा गया था. नवम्बर 2000 में उन्हें कानून, न्याय और कंपनी मामलों के अलावा जहाजरानी मंत्री बनाया गया. भूतल परिवहन मंत्रालय का विभाजन हुआ और तब वे नौवहन मंत्री बने. उन्हें 29 जनवरी 2003 को केंद्रीय मंत्रिमंडल में वाणिज्य, उद्योग, कानून और न्याय मंत्री बनाया गया. मई 2004 में एनडीए की हार के बाद जेटली पार्टी के महासचिव बने और वकालत भी करने लगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में 26 मई 2014 को अरुण जेटली को वित्त मंत्री बनाया गया. उनको कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय का जिम्मा भी दिया गया था.वे 27 मई 2014 से 14 मई 2018 तक केंद्रीय वित्त एवं कार्पोरेट मामलों के मंत्री रहे. उनके पास 27 मई 2014 से 9 नवंबर 2014 तक रक्षा मंत्रालय का प्रभार भी रहा. वे 13 मार्च 2017 से 3 सितंबर 2017 तक रक्षा मंत्री के पद पर रहे.

वकालत

शुरुआती करियर की बात करें तो 1990 में अरुण जेटली ने सुप्रीम कोर्ट में वरिष्‍ठ वकील में रूप में नौकरी शुरू की. वीपी सिंह सरकार में उन्‍हें 1989 में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया था. उन्‍होंने बोफोर्स घोटाले की जांच में पेपरवर्क भी किया. जेटली देश के टॉप 10 वकीलों में से एक माने जाते रहे हैं.

बीजेपी के कई नेताओं का उन्होंने केस लड़ा और उनको जिताया. वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवानी का नाम भी उन्हीं नेताओं में था. जेटली ने आडवाणी के पक्ष में पहले बाबरी मस्जिद विध्वंस का केस लड़ा और फिर मशहूर जैन हवाला केस में सफलतापूर्वक आडवाणी को बरी कराया. इसके अलावा गुजरात दंगा केस में भी उन्होंने अदालत में पीएम मोदी की तरफ़ से वकालत की थी.

जेटली ने भारतीय ब्रिटिश विधिक न्यायालय के समक्ष 'भारत में भ्रष्टाचार और अपराध' विषय पर दस्तावेज प्रस्तुत किए. जून 1998 में नशीले पदार्थों की तस्करी पर रोक लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून को अधिनियमित करने के उद्देश्य से आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ सम्मेलन में वे भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुए थे. कानून की जानकारी ही है कि उन्होंने विधिक और समसामयिक समस्याओं पर अनेक पुस्तकें लिखीं.

सांसद

अरुण जेटली को 3 जून 2009 को राज्यसभा में विपक्ष का नेता चुना गया. राज्यसभा में उन्होंने महिला आरक्षण विधेयक पर बहस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने जन लोकपाल विधेयक के लिए अन्ना हजारे का समर्थन किया. उन्होंने 2009 से 2014 तक राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में कार्य किया. इसके बाद 26 मई 2014 से 11 जून 2019 तक वह गुजरात से राज्यसभा सांसद रहे. वह 3 अप्रैल 2018 से 24 अगस्त 2019 तक उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद रहे.

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