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धूम्रपान और पैसिव स्मोकिंग! पतंजलि का दावा- कैंसर कोशिकाओं को रोकने में मददगार है 'औरोग्रिट'

फेफड़ों का कैंसर फेफड़ों की कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि से होता है, जिसके मुख्य कारण धूम्रपान और पैसिव स्मोकिंग हैं. शुरुआती लक्षण खांसी, खून आना, छाती में दर्द, वजन कम होना और थकावट शामिल हैं.

Cancer Overview: कैंसर एक गंभीर बीमारी है, जिसमें शरीर की कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं और शरीर के अन्य हिस्सों में फैल सकती हैं. सामान्य रूप से, शरीर की कोशिकाएं एक नियंत्रित प्रक्रिया से बढ़ती, विभाजित होती और मरती हैं. लेकिन जब यह प्रक्रिया बिगड़ जाती है, तो कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं, जिससे ट्यूमर बनते हैं.

ट्यूमर दो प्रकार के होते हैं, पहला बेनाइन जिसे गैर-कैंसरकारी ट्यूमर कहा जाता है, और दूसरा मेलिग्नेंट जिसे कैंसरकारी ट्यूमर कहते हैं. मेलिग्नेंट ट्यूमर शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकते हैं और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकते हैं.

फेफड़ों के कैंसर के प्रकार

फड़ों का कैंसर मुख्य रूप से दो प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है. पहला, नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर जो सबसे सामान्य प्रकार है और लगभग 85% मामलों के लिए जिम्मेदार है. यह कैंसर अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ता है, लेकिन समय पर इसका इलाज न किया जाए तो यह खतरनाक साबित हो सकता है.

दूसरा प्रकार स्मॉल सेल लंग कैंसर है, जो कम लोगों में देखा जाता है, लेकिन यह तेजी से बढ़ता और फैलता है. इस प्रकार के कैंसर के उपचार में अत्यधिक सतर्कता और तेजी की आवश्यकता होती है.

फेफड़ों के कैंसर के कारण

फेफड़ों के कैंसर के कई कारण होते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है धूम्रपान. तंबाकू के धुएं में 7,000 से अधिक रसायन होते हैं, जिनमें से कई कैंसर जनक होते हैं. धूम्रपान करने वालों के अलावा, उन लोगों को भी जोखिम होता है जो धूम्रपान करने वाले के आसपास रहते हैं. इसे पैसिव स्मोकिंग कहते हैं, और यह भी उतना ही हानिकारक है. 

फेफड़ों के कैंसर के लक्षण

फेफड़ों के कैंसर के लक्षण कई बार शुरुआती चरण में स्पष्ट नहीं होते हैं, जिससे रोगी और डॉक्टर दोनों को समस्या का पता लगाने में देरी हो सकती है. 
कुछ सामान्य लक्षणों में शामिल हैं लगातार खांसी जो ठीक न हो रही हो, खांसी के साथ खून आना, छाती में दर्द, सांस लेने में कठिनाई, आवाज का भारी होना, अचानक वजन का कम होना और अत्यधिक थकावट.

इसके अलावा, कुछ मामलों में ब्रोंकाइटिस या निमोनिया जैसी समस्याएं बार-बार होती हैं. इन लक्षणों को नज़रअंदाज करना घातक हो सकता है, इसलिए समय पर जांच और उपचार आवश्यक है.

फेफड़ों के कैंसर की जांच कैसे की जाती है?

फेफड़ों के कैंसर की जांच के लिए आधुनिक चिकित्सा में कई तकनीकों का उपयोग किया जाता है. डॉक्टर सबसे पहले फेफड़ों का एक्स-रे करवाने की सलाह देते हैं, जो फेफड़ों की स्थिति का प्रारंभिक अंदाज़ा देता है. इसके बाद सीटी स्कैन और पीईटी स्कैन जैसे उन्नत उपकरणों का उपयोग किया जाता है, जो फेफड़ों की संरचना और कैंसर के फैलाव की जानकारी देते हैं. एमआरआई भी एक प्रभावी तकनीक है, जो विस्तृत चित्र प्रदान करती है.

कई बार, बायोप्सी की जाती है, जिसमें फेफड़ों के ऊतक का एक छोटा नमूना लिया जाता है और प्रयोगशाला में उसकी जांच की जाती है. इन सभी प्रक्रियाओं के माध्यम से यह तय किया जाता है कि कैंसर किस स्तर पर है, जिसे 1 से 4 के बीच वर्गीकृत किया जाता है.

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आयुर्वेद से जानें फेफड़ों के कैंसरा का उपचार

पतंजलि ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण खोज की. पतंजलि ने आयुर्वेदिक औषधि औरोग्रिट का विकास किया, जो फेफड़ों के कैंसर के लिए अत्यधिक प्रभावकारी सिद्ध हुई है. औरोग्रिट का निर्माण कर्कटशृंगि (जिसे काकड़ासिंगी भी कहते हैं) से किया गया है. आयुर्वेदिक ग्रंथों में कर्कटशृंगि को सांस संबंधी रोगों के लिए अत्यंत उपयोगी माना गया है. इस औषधि में Gallic Acid, Methyl Gallate, और Penta-O-Galloyl-β-D-Glucose जैसे प्रभावकारी फाइटोकेमिकल्स पाए गए हैं. इनमें से PGG को विभिन्न प्रकार के कैंसर में प्रभावकारी पाया गया है.

औरोग्रिट के प्रभावों का विश्लेषण हमने फेफड़ों की कैंसरग्रस्त कोशिकाओं पर किया. इस अध्ययन में यह पाया गया कि औरोग्रिट कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट करता है, लेकिन स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता. यह औषधि कैंसर की वृद्धि को रोकती है और ट्यूमर बनने की प्रक्रिया को धीमा करती है. इसके अलावा, औरोग्रिट ने मॉलिक्यूलर स्तर पर सिग्नलिंग पाथवे को प्रभावित किया, जिससे कैंसर कोशिकाओं के निर्माण की गति में कमी आई.

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