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अमेरिका से अवैध भारतीयों की वापसी है भारत की गृह-विदेश नीति के लिए एक सबक

अब जरूरत है कि भारत बांग्लादेशियों पर दबाव डाले कि यह सारे अवैध बांग्लादेशी (जिनको भारत चिह्नित करेगा) को अपने देश में वापस ले जाए, उन लोगों को बांग्लादेश वापस लें.

पिछले कई सालों से यह चर्चा भारतीय राजनीति में चल रही है कि भारत में अच्छे-खासे अवैध बांग्लादेशी रहते हैं. उनकी वजह से हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी एक व्यापक नकारात्मक प्रभाव नजर आता है. भारत की समाज व्यवस्था में बांग्लादेशी घुसपैठियों के अवैध आधार कार्ड, राशन कार्ड इत्यादि बन जाते हैं. इस तरह वोट बैंक के लालच में कई विपक्षी पार्टियां जो मुस्लिम तुष्टीकरण करने में व्यस्त रहती हैं, वे भूल जाती हैं कि ये सारी सुविधाएं केवल भारतीयों को मिलनी चाहिए. इसके बदले वह उनको यानी घुसपैठियों को मुहैया करा दी जाती है और उसका नकारात्मक प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है.

भारतीय संसाधनों पर बांग्लादेशी मौज

कुछ सालों पहले कोविड-19 ने भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया और मेडिकल फैसिलिटी की तरफ सबका ध्यान गया, आम आदमी के धंधे बंद हो रहे थे, लोगों की नौकरी छूट रही थी क्योंकि लॉकडाउन लग गया था. तो उसके चलते भारतीय सरकार ने सबको फ्री राशन दिया, फ्री में कोविड वैक्सीन के टीके लगवाए. यह एक जरूरी कदम था और उटाया ही जाना चाहिए था, लेकिन इसका एक अच्छा खासा पोर्शन जो केवल और केवल भारतीयों को ही मिलना चाहिए वो पोर्शन बांग्लादेशी घुसपैठिये भी उठा रहे हैं. सरकारी अस्पताल में 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग एक मजहबी समुदाय से आते हैं,  वो ही वहां पहुंच रहे हैं. उनको फिर और अधिक खंगालेंगे उससे पता चलेगा कि मैक्सिमम अधिकांशतः घुसपैठिए हैं, क्योंकि इनकी बोली में बंगाली और हिंदी सुनने को मिलती है भारत के पश्चिम बंगाल की बंगाली का टोन थोड़ा अलग है, बांग्लादेशियों की बंगाली की टोन और बोली अलग है, जब वह हिंदी भी बोलते हैं तो पता चल जाता है. काफी सारे बांग्लादेशी घुसपैठिए भारत में मौजूद हैं, जो भारत के संसाधनों का दोहन कर रहे हैं.

अमेरिका से भारत ले सकता है सीख

दिल्ली के एक इलाके शाहीन बाग में आंदोलन जब हुआ तब  बांग्लादेशियों के दम पर ही विपक्षी पार्टियों के सौजन्या से हुआ, अन्यथा वह नहीं हो पाता. उन्हीं को डर है कि जब नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लागू हो जाएगा उसके साथ राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) भी आएगी. NRC में कहीं न कहीं बांग्लादेशी घुसपैठियों को ढूंढकर अलग कर दिया जाएगा. इसलिए वह नहीं चाहते थे कि CAA आए. अमेरिका से भारत को सबक लेने की जरूरत है, वैसे अभी ही ये बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि अमेरिका ने सिर्फ भारत से आए हुए अवैध लोगों को ही डिपोर्ट करने की बात नहीं कही है, पूरे विश्व से अवैध लोग जो अमेरिका में घुस रहे हैं, उसके खिलाफ ट्रंप ने कड़ा रुख अख्तियार किया है. वैसे भी, अगर हम भारत से तुलना करें तो बहुत ज्यादा लोग अवैध रूप से नहीं जाते हैं, जाते तो हैं लेकिन उनकी सांख्य कोई बहुत ज्यादा नहीं है और उसमें एक बात देखने की है कि कई लोग ऐसे हैं जिनके वीज़ा का समय समाप्त हो जाता है, वह ओवर स्टे करते हैं. उस वजह से उनको अवैध करार दिया जाता है.

हालांकि, ये सारे लोग वहां मजदूरी करने जा रहे हैं, नौकरी करने जाते हैं और कहीं न कहीं वह सकारात्मक रूप से अमेरिका की अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं. एक पहलू भारतीय लोगों का यह है कि वह चाहे कानूनी तारिके से जाये या अवैध तरीके से जाये, उस तरह से नजर नहीं आता है जिनकी प्रोफाइलिंग होती है. भारत में बसे हुए बांग्लादेशी घुसपैठियों की तुलना इससे करें तो 99% घुसपैठिए भारत के संसाधनों का दोहन कर रहे हैं, अर्थव्यवस्था में किसी तरह सकारात्मक कार्य नहीं करते, माइनस में ही करते हैं. भारत एक ज़िम्मेदार देश है. भारत ने अमेरिका से बोला है कि इस तरह के अवैध भारतीयों को अमेरिका से लेने के लिए वह तैयार है. 

अब बांग्लादेश पर भारत डाले दबाव

अब जरूरत है कि भारत बांग्लादेशियों पर दबाव डाले कि यह सारे अवैध बांग्लादेशी (जिनको भारत चिह्नित करेगा) को अपने देश में वापस ले जाए, उन लोगों को बांग्लादेश वापस लें. भारत को आंख दिखाना बांग्लादेश कम करे क्योंकि वैसे भी बांग्लादेश आर्थिक कंगाली के दौर पर है. हाल की युनुस की कार्यवाहक सरकार को देखें तो वह जिस तरह से जिहादियों के कब्जे में नजर आ रही है, जिस तरह की सोच वहां हावी हो रही है, अनुमान तो यह भी लग सकता है कि बांग्लादेश अपने लोगों को भारत में भेजकर कहीं ना कहीं जनसंख्या जिहाद चला रहा है. 

अमेरिका कस रहा है नकेल

ये ठीक है कि पिछले कुछ सालों में अमेरिका की साख गिरी है. भारत की भू-राजनीति और वैश्विक राजनीति में भी हाल के बाइडेन प्रशासन तक एक ढर्रा चलता रहा, वह कई उलटफेर का जिम्मेदार रहा और पुरानी कुछ नीतियां भी ऐसी रही जिसकी वजह से अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय साख गिरी. अमेरिका के चुनावों में ट्रंप का एजेंडा "WE CAN MAKE AMERICA GRAET AGAIN!!!!" यानी मागा चल गया.  साथ ही, जितने भी पश्चिमी देश हैं उनमें डि-ग्लोबलाइज़ेशन की प्रक्रिया भी चल रही है और वैश्वीकरण के माध्यम से पूरा विश्व सिकुड़ता जा रहा और ये लोग ब्रेन गेम की बात करते हैं और इसी वजह से आप्रवासन नीति थोड़ी सी नरम थी ताकी अच्छे से अच्छा दिमाग जो है, वह पश्चिमी देशों में जाए और वहां की अर्थव्यवस्था में, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अपना योगदान दे. उसका नकारात्मक पहलू यह रहा कि अवैध लोग भी वहां घुस गए जिसकी वजह से जनसांख्यिकीय परिवर्तन, सांस्कृतिक नवाचार आम तौर पर घटने लगा. यह बहुत हो रहा है और मुख्यतः  इस्लामिक भीड़ है, जो रिफ्यूजी के नाम पर इन सभी पश्चिमी देशों में घुस गए हैं.

भारत की समस्या दुनिया की भी

अब धीरे-धीरे अमेरिका ही नहीं पूरे यूरोपीय देशों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन हुआ है. लोगों में मास कन्वर्जन हो रहे हैं. लोग इस्लाम धर्म को स्वीकार कर रहे हैं. उस कट्टरता की वजह से क्रिसमस हो या न्यू ईयर ईव हो, कोई ना कोई व्यक्ति ट्रक में बैठता है और सबको कुचलता हुआ निकल जाता है. यूरोपीय देशों में इस तरह की घटनाएं अब आम हो गयी हैं. इन सारी चीजों से अमेरिका भी पूरी तरह वाक़िफ़ है. वह चाहता है कि ग्लोबलाइज़ेशन की वजह से नकारात्मक प्रभाव ना पड़े, उसके अपने नागरिकों को अच्छी से अच्छी सुविधाएं और नौकरी मिलती रहे, जिससे वो अपना कल्चरल इनवेजन-यानी, डेमोग्राफी भी बचा लें, अपनी संस्कृति भी बचा लें, दबदबा भी बना रहे-जारी रख सकें. यही अमेरिका की चाहत है. वह विश्व राजनीति में भी अपनी चौधराहट चाहता है. वह यही चाहता है कि वे सारे देश जो अमेरिका के बलबूते पर फलते हैं, फूलते हैं, चाहे वह यूरोपीय देश ही क्यों ना हो, उनको भी अब अमेरिका पर निर्भरता कम करनी चाहिए. अमेरिका सिर्फ अपने हित की लड़ाई लड़ेगा और इसी वजह से नाटो और रूस-यूक्रेन युद्ध में उन्होन अलग स्टैंड लिया कि नहीं यह युद्ध उनका नहीं है. अगर यूरोप करना चाहता है तो वह खुद इंतजाम करें पैसे का. एक अलग राजनीति है और आने वाले 6 महीने में कुछ और नई चीजें आ सकती हैं, तो मुझे लगता है थोड़ा सा ग्लोबल ऑर्डर में कहीं ना कहीं बदलाव होगा. 

अब आर्थिक शक्ति के आधार पर ग्लोबल ऑर्डर तय होगा. ऐसे में अमेरिका अभी से नेतृत्व लेना चाहता है. चीन, कनाडा, मेक्सिको या यूरोपीय देश जो भी हैं, टैरिफ को लेकर वॉर अब शुरू हुआ है मुझे लगता है कि राजनीति को ये चीज बदलेगी और अब आर्थिक महाशक्ति के रूप में कौन उभरेगा? वह देखा जाएगा. अमेरिका ने अपनी तैयारी की है और यही तैयारी कहीं ना कहीं भारत भी कर रहा है.

डॉक्टर अमित सिंह ने जेएनयू से इंटरनेशनल रिलेशन में पीएचडी करने के बाद चार साल भारतीय नौसेना के थिंक टैंक के साथ काम किया. फिलहाल, वह JNU में अंतरराष्ट्रीय संबंधों एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित विषयों को पढ़ाते हैं और एसोसिएट प्रोफेसर हैं.
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