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प्रेग्नेंसी में डायबिटीज, सावधानी रखना है जरूरी!

गर्भावस्था में मधुमेह (डायबिटीज) गर्भवती महिलाओं से जुड़ी बहुत आम समस्या है, जिससे 2 से 10 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं प्रभावित होती हैं. यह भी देखा गया है कि 30 से 39 आयु वाली गर्भवती महिलाओं में जीडीएम की व्यापकता 20 से 29 वर्ष की आयु वाली महिलाओं की तुलना में अधिक होती है. भारत विश्व की डायबिटीज राजधानी है और यहां महिलाओं में डायबिटीज की दर चौंकाने वाली है. पूरे देश में प्रतिवर्ष 50 लाख से ज्यादा महिलाएं इस बीमारी के संपर्क में आती हैं. दुनियाभर में डायबिटीज से पीड़ित 246 लाख से ज्यादा लोग हैं, जिनमें से आधी महिलाएं हैं. दिल्ली के नर्चर आईवीएफ सेंटर की स्त्री रोग विशेषज्ञ व प्रसूति विशेषज्ञ डॉ. अर्चना धवन बजाज के अनुसार, पहली पैरेंटल विजिट के दौरान ही गर्भावस्था डायबिटीज की स्क्रीनिंग की जानी चाहिए. इसके बाद 24 से 28 सप्ताह में जांच की जाए, यदि शुरुआती परिणाम नेगेटिव हो. उन्होंने कहा कि सामान्यता गर्भावस्था डायबिटीज के कोई लक्षण नहीं होते हैं. कभी-कभी हाई ब्लड प्रेशर, प्यास ज्यादा लगना, अक्सर मूत्र त्याग करने की जरूरत महसूस होना तथा थकावट महसूस होना इसके लक्षण होते हैं. डॉ. अर्चना ने बताया कि टाइप-1 तथा टाइप-2 डायबिटीज पाए जाने पर डॉक्टरों द्वारा इंसुलिन शॉट्स लेने की सलाह दी जाती है, फिर आपको प्रभावी उपचार लेना होता है. इन श्रेणी की महिलाओं के लिए डायबिटिक स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है : * यदि बॉडी मॉस इंडेक्स 30 से ज्यादा हो * पहले गर्भावस्था के दौरान गर्भावस्था डायबिटीज रही हो * पेशाब में शुगर * परिवार में डायबिटीज का रहना फोर्टिस ला फेमे में स्त्री रोग विशेषज्ञ व बांझपन विशेषज्ञ डॉ. ऋषिकेश पाई कहते हैं, "गर्भावस्था डायबिटीज का कारण गर्भपात, बड़े-मोटे बच्चे और पॉलीहाइड्रोमिनोस, पेट का ज्यादा बड़ा होना, दुर्लभ हानिकारक स्थितियां टॉक्सेमिया हो सकती है, जो मूत्र में प्रोटीन की उपस्थिति के साथ ब्लड प्रेशर को बढ़ाती है तथा हाथ-पैरों में सूजन आ जाती है. भ्रूण की भलाई के लिए ऐसी किसी भी समस्या की स्थिति में तुरंत स्वास्थ उपचार लिया जाना चाहिए." उनके मुताबिक, डायबिटिक गर्भावस्था से गर्भपात, बड़े बच्चे को जोखिम होता है. बड़े बच्चे-उच्च मातृ रक्त ग्लूकोज के कारण बड़े बच्चे होने के चांस बढ़ सकते हैं और सिजेरियन के कारण बच्चे को जन्म दिन मुश्किल भरा हो सकता है. उन्होंने बताया कि पॉलीहाइड्रोमिनोज -गर्भावस्था के दौरान भ्रूण अवरण द्रव की बहुत ज्यादा मात्रा, इसके प्रभाव कम होते हैं. इससे पेट बहुत ज्यादा बड़ा हो जाता है और दुर्लभ हानिकारक स्थितियां बन सकती हैं. टॉक्सेमिया : मूत्र में प्रोटीन की मात्रा के साथ रक्त चाप में वृद्धि तथा हाथ/पैरों में सूजन. यह डायबिटिक गर्भावस्था की आम जटिलता है. एडेमा : गर्भावस्था के दौरान सामान्यता सूजन होती है. इस दौरान कम नमक लेने से तरल की अत्याधिक मात्रा को बढ़ने से रोका जा सकता है. प्रीकैलेम्पेसिया : गर्भावस्था से संबंधित हायपरटेंशन. जन्म देने के बाद आपके शरीर में यह समस्या हो सकता है. इस दौरान पीलिया, सांस लेने में तकलीफ और शर्करा स्तर का नीचे आने जैसी समस्या हो सकती है. कैडुअल रिग्रेशन सिंड्रोम : यह एक दुर्लभ जन्मजात जटिल विकार है, जिसमें लोअर स्पाइन में असामान्य भ्रूण विकास होता है. लोअर स्पाइन की असामान्यता के कारण कई जटिलताएं हो सकती हैं, जो स्पाइनल कॉर्ड के सिरे को असंयमित मूत्र के कारण नुकसान पहुंचा सकती हैं. चिकित्सकों के अनुसार, गर्भावस्था डायबिटीज को नियमित व्यायाम से हल किया जा सकता है जिससे ब्लड शुगर लेवल नॉर्मल रखने तथा वजन कम करने ब्लड ग्लूकोज को नियंत्रित करने में मदद मिलती है. हाई कॉलेस्ट्रॉल और हाई बीपी पर व्यक्ति को दवाओं के द्वारा नियंत्रण रखना चाहिए, जिससे हृदय रोग, आघात तथा किडनी रोगों से बचाव हो सकता है. सुझाव : -स्वस्थ खानपान की आदत अपनाएं और भोजन कभी न छोड़ें -अपनी दवाएं और इंसुलिन प्रतिदिन समय पर बिना भूले लें -घरेलू ग्लूकोज मॉनीटर के उपयोग से ब्लड ग्लूकोज के स्तर की जांच करें -ब्लड ग्लूकोज को सामान्य के करीब रखकर कई सारी जटिलताओं से खुद को बचाया जा सकता है उचित खानपान, व्यायाम, जीवनशैली में बदलाव, नियमित ग्लूकोज लेवल की जांच, दवाएं, नियंत्रित प्रेशर कॉलेस्ट्रॉल धूम्रपान छोड़ना बहुत प्रभावी तथा मेडिकल गाइडेंस के तहत डायबिटीज का सावधानीपूर्वक प्रबंधन आवश्यक है.

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