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Contempt of Court Rules: क्या कोर्ट का फैसला मानने से इनकार कर सकती है पुलिस, जानें इसको लेकर क्या हैं नियम?

Contempt of Court Rules: संभल हिंसा मामले में कोर्ट ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था. लेकिन पुलिस ने केस दर्ज करने से मना कर दिया. जानें पूरा मामला.

Contempt of Court Rules:  उत्तर प्रदेश के संभल का एक हालिया मामला एक बार फिर से गंभीर संवैधानिक सवाल को खड़ा कर रहा है. दरअसल हाल ही में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की चंदौसी कोर्ट ने संभल हिंसा के दौरान एक युवक को लगी चोटों के सिलसिले में पूर्व सीओ और 12 दूसरे पुलिस कर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था. इस न्यायिक निर्देश के बावजूद भी पुलिस ने कथित तौर पर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया. आइए जानते हैं कि क्या पुलिस कोर्ट के आदेश को मानने से मना कर सकती है या नहीं.

क्या पुलिस कोर्ट के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य है 

भारतीय कानून के तहत पुलिस न्यायपालिका से ऊपर कोई स्वतंत्र अथॉरिटी नहीं है. वे कानून के शासन के तहत काम करते हैं और संवैधानिक रूप से सक्षम अदालतों द्वारा पारित आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं. किसी भी न्यायिक आदेश का जानबूझकर पालन न करना या फिर उसमें जानबूझकर देरी करना कानून का उल्लंघन माना जाता है. न्यायपालिका के निर्देश अनिवार्य हैं, कोई सलाह नहीं. इस वजह से पुलिस अधिकारियों के पास उन्हें नजरअंदाज करने का कोई भी अधिकार नहीं है.

पुलिस अधिनियम कोर्ट के आदेशों के बारे में क्या कहता है 

पुलिस अधिनियम साफ तौर से पुलिस अधिकारियों के लिए कानूनी निर्देशों का पालन करने का कर्तव्य बताता है. पुलिस अधिनियम की धारा 23 के तहत हर पुलिस अधिकारी को कानूनी तौर पर किसी कोर्ट या फिर किसी भी कानूनी अथॉरिटी द्वारा जारी सभी आदेशों और वारंटों को तुरंत लागू करने पर उनका पालन करने की जरूरत होती है. अगर आदेशों का पालन नहीं किया जाता तो इसे दुराचार माना जाता है और इसके कानूनी और विभागीय दोनों तरह के परिणाम हो सकते हैं.

कोर्ट के आदेश का पालन ना करना कोर्ट की अवमानना है 

यदि पुलिस अधिकारी जानबूझकर कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हैं तो यह अवमानना अधिनियम 1971 के तहत कोर्ट की अवमानना मानी जाती है. ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारी को 6 महीने तक की साधारण कैद, जुर्माना या दोनों सजा हो सकती हैं. 

भारतीय न्याय संहिता के तहत आपराधिक दायित्व 

परिणाम सिर्फ अवमानना की कार्यवाही तक सीमित नहीं है. भारतीय न्याय संहिता की धारा 166A के तहत अगर कोई सरकारी कर्मचारी जानबूझकर कानून या कोर्ट के निर्देशों को नजरअंदाज करता है और किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचता है तो उसे 6 महीने से 2 साल तक की कैद की सजा हो सकती है.

करियर पर असर 

आपराधिक और अवमानना की कार्यवाही के अलावा जो पुलिस अधिकारी कोर्ट के आदेशों को मानने से इनकार करता है उसे डिपार्टमेंटल कार्रवाई का भी सामना करना पड़ सकता है. इसमें सस्पेंशन, अंदरूनी जांच, सर्विस रिकॉर्ड खराब होना, प्रमोशन ना मिलना या नौकरी से निकालना भी शामिल हो सकता है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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