मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में क्या लिखा, कितना सच्चा राहुल गांधी का दावा?
Rahul Gandhi Manusmriti: हाल ही में राहुल गांधी ने मनुस्मृति को लेकर एक बड़ा बयान दिया है. आइए जानते हैं कि उनके बयान में कितनी सच्चाई है.

- राहुल गांधी ने महिलाओं पर मनुस्मृति के कथन का जिक्र किया।
- मनुस्मृति प्राचीन ग्रंथ है, श्लोक 9.3 कथन का समर्थन करता है।
- हालांकि, ग्रंथ में महिलाओं के सम्मान और अन्य नियम भी हैं।
Rahul Gandhi Manusmriti: लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने हाल ही में मनुस्मृति को लेकर एक बड़ा बयान दिया है. राहुल गांधी ने समाज में महिलाओं की स्थिति से जुड़े इसके प्रावधानों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि इस ग्रंथ में यह बात कही गई है कि महिला बचपन में अपने पिता, जवानी में अपने पति और बुढ़ापे में अपने बेटों के अधिकार या फिर कंट्रोल में रहती है. इस बयान ने एक बार फिर से इस प्राचीन संस्कृत ग्रंथ को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है. लेकिन असल में मनुस्मृति क्या कहती है और क्या बहस में बताए गए श्लोक राहुल गांधी के दावे का समर्थन करते हैं? आइए जानते हैं.
मनुस्मृति क्या है?
मनुस्मृति जिसे मानव धर्मशास्त्र या फिर मनु के नियम के नाम से भी जाना जाता है एक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ है जो सामाजिक आचरण, कर्तव्य, कानून, नैतिकता और दंड के बारे में बताता है. पारंपरिक रूप से इसे मनु की रचना माना जाता है और यह 12 अध्यायों में बंटी हुई है. अलग-अलग पांडुलिपि और संस्करण में श्लोकों की संख्या अलग-अलग होती है. विद्वानों के अलग-अलग संस्करण में श्लोकों की गिनती भी अलग-अलग है. सदियों से इस ग्रंथ का कई भाषा में अनुवाद भी किया गया है. जाति, लिंग, सामाजिक कर्तव्य और दंड से जुड़े नियम की वजह से मनुस्मृति इतिहासकार, विद्वान, समाज सुधारक और राजनीतिक विचारकों के बीच बहस का एक बड़ा विषय बन चुकी है.

अध्याय 9 महिलाओं के बारे में क्या कहता है?
राहुल गांधी के बयान के संदर्भ में जिन श्लोक का जिक्र किया गया है वह मुख्य रूप से अध्याय 9 में मिलते हैं. मनुस्मृति का श्लोक 9.2 कहता है कि महिलाओं को उनके परिवार के पुरुषों की सुरक्षा या फिर कंट्रोल में रखा जाना चाहिए और इसमें संयम बरतने की जरूरत बताई गई है.
इससे ज्यादा सीधे तौर पर संबंधित श्लोक 9.3 है. इसमें कहा गया है कि महिला बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में बेटों की सुरक्षा में रहती है. इसमें यह भी कहा गया है कि उसे स्वतंत्र नहीं होना चाहिए. इस वजह से पिता-पति-बेटे के क्रम के बारे में राहुल गांधी का जिक्र मनुस्मृति के श्लोक 9.3 में लिखी बात से मेल खाता है.
अध्याय 9 और क्या कहता है?
इस अध्याय में महिलाओं और विवाह से जुड़े कई दूसरे प्रावधान भी हैं. शोक 9.5 में महिलाओं को उन प्रवृत्तियों से बचाने की बात की गई है जिन्हें ग्रंथ में अवांछित बताया गया है. इसी के साथ 9.6 में पत्नियों की सुरक्षा को पत्तियों का कर्तव्य बताया गया है. एक और जिक्र किया गया प्रावधान 9.45 विवाह के बाद पति और पत्नी को एक दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ बताता है. इस ग्रंथ में संपत्ति और पत्नियों, बेटों व दासों की कानूनी स्थिति से जुड़े भी नियम दिए गए हैं.
आधुनिक विद्वान और समाज सुधारकों ने इन श्लोकों की कड़ी आलोचना की है. ऐसा इसलिए क्योंकि यह महिलाओं को आधुनिक कानूनी नजरिए से पूरी तरह स्वतंत्र व्यक्ति नहीं मानते.

क्या मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में सिर्फ नकारात्मक बातें ही कही गई हैं?
नहीं, यहीं पर यह विषय थोड़ा पेचीदा हो जाता है. मनुस्मृति में कुछ ऐसे श्लोक भी हैं जो साफ तौर पर महिलाओं के सम्मान पर जोर देते हैं. इनमें से कुछ श्लोक अध्याय 3 में मिलते हैं. श्लोक 3.55 कहता है कि पिता, भाई, पति और दूसरे पुरुष रिश्तेदारों को महिलाओं का सम्मान करना चाहिए और उन्हें उचित आभूषण व कपड़े देने चाहिए.
श्लोक 3.56 कहता है कि जिन घरों में महिलाओं का सम्मान होता है वहां देवता प्रसन्न होते हैं और जिन परिवारों में महिलाओं का सम्मान नहीं होता वहां धार्मिक कार्य बेकार माने जाते हैं. इसी तरह श्लोक 3.57 कहता है कि जिस परिवार में महिलाएं दुखी होती हैं उसका पतन होता है और जिस परिवार में महिलाएं खुश रहती हैं वह तरक्की करता है.
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राहुल गांधी का दावा कितना सही?
अगर यह दावा खासतौर पर इस बात के बारे में है कि महिला बचपन में पिता के, जवानी में पति के और बुढ़ापे में बेटों के अधीन रहती है तो मनुस्मृति में ऐसा अंश मौजूद है खासकर श्लोक 9.3 में. हालांकि इसे पूरी मनुस्मृति की एकमात्र स्थिति के तौर पर पेश करने से दूसरे अंश छूट जाएंगे. यह ग्रंथ काफी बड़ा है और इसमें महिलाओं के सम्मान, विवाह, पारिवारिक जिम्मेदारी, संपत्ति और सामाजिक आचरण से जुड़े अलग-अलग नियम दिए गए हैं. इस वजह से सबसे सही निष्कर्ष यह है कि मनुस्मृति से जुड़ा हुआ वह खास कथन ग्रंथ में मौजूद है, लेकिन पूरे ग्रंथ की व्यापक व्याख्या के लिए इसके दूसरे नियमों और ऐतिहासिक संदर्भ पर भी विचार करना जरूरी है.
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