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Explained : कैसे काम करता है WHO, अमेरिका के फंड रोकने का क्या पड़ेगा प्रभाव?

कोरोना जैसी महामारी से दुनिया के तमाम देश लड़ने की कोशिश कर रहे हैं. औऱ उनकी इन कोशिशों में मदद कर रहा है विश्व स्वास्थ्य संगठन यानि कि WHO. लेकिन अब इसके लिए एक बुरी खबर है, क्योंकि अमेरिका ने WHO को देने वाला फंड रोक दिया है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन. संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अंग, जिसका मुख्यालय स्वीटजरलैंड के जेनेवा में है. इसका काम दुनिया भर के तमाम देशों में मेडिकल संबंधी समस्याओं पर ध्यान देना है और इसके लिए दुनिया भर के देशों को एक जुट करना है. यही संस्था बताती है कि कब किसी बीमारी को महामारी घोषित करना है और कैसे उस महामारी से लड़ना है. अभी दुनिया के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती कोरोना के रूप में सामने आई है, उसे भी विश्व स्वास्थ्य संगठन या अंग्रेजी में कहें तो WHO ने ही महामारी घोषित किया था.

लेकिन इस महामारी से लड़ने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जो कदम उठाए जा रहे हैं, कुछ देशों ने उसपर सवालिया निशान भी खड़े किए हैं. अमेरिका तो इस संस्था पर इतना बौखलाया है कि इसने संस्था को देने वाला फंड भी बंद कर दिया है और कहा है कि चीन परस्त विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना के संक्रमण को रोकने की कोशिश तक नहीं की. अब सच्चाई जो भी हो, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन अपना काम कर रहा है और अमेरिका अपना. लेकिन इस दौरान ये जानना ज़रूरी हो जाता है कि अमेरिका की ओर से फंडिंग बंद होने से इस संस्था पर क्या असर पड़ेगा. इसके अलावा दुनिया के और कौन-कौन से देश इस संस्था को पैसे देते हैं और इन पैसों को ये संस्था कहां खर्च करती है.

WHO को पैसे कौन देता है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन को दुनिया के कई देश, कई उदारवादी संस्थाएं और संयुक्त राष्ट्र संघ पैसे देता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की वेबसाइट के मुताबिक संस्था के सदस्य देशों की ओर से कुल पैसे का 35.41 फीसदी, टैक्स से 15.66 फीसदी, उदारवादी संगठनों से 9.33 फीसदी, संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से 8.1 फीसदी और बाकी के बचे पैसे दूसरे बेशुमार स्रोत से इस संस्था को मिलते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन को मिलने वाले कुल पैसे का अकेले 15 फीसदी पैसा अमेरिका अकेले ही देता है. संस्था को सदस्य देश जो पैसे देते हैं, उसका करीब 31 फीसदी हिस्सा अकेले अमेरिका देता है. वहीं सदस्य देशों की ओर से मिलने वाले कुल पैसे का करीब 1 फीसदी हिस्सा भारत देता है.

संगठन को पैसे देने के मामले में देशों को खुद से फैसले लेने का अधिकार होता है कि वो कितने पैसे देंगे. अगर सदस्य देश चाहें तो वो पैसे नहीं भी दे सकते हैं. अमेरिका ने फिलहाल यही फैसला किया है. हालांकि एक तथ्य ये भी है कि अगर अमेरिका पैसे न भी दे और बाकी के देश अपना-अपना हिस्सा देते रहें, तो विश्व स्वास्थ्य संगठन को अपना काम करने में कोई खास दिक्कत फिलहाल नहीं आएगी.

इन पैसों का क्या करता है विश्व स्वास्थ्य संगठन?

विश्व स्वास्थ्य संगठन इन पैसों का इस्तेमाल दुनिया भर में फैली बीमारियों को खत्म करने, उनका इलाज खोजने और उनका टीका बनाने में करता है. इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं. साल 2018-19 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से पोलियो उन्मूलन पर करीब एक बिलियन डॉलर यानि कि करीब 767 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे. ये कुल खर्च का करीब 19.36 फीसदी था. संस्था ने 2018-19 में स्वास्थ्य और न्यूट्रिशन सर्विसेज की पहुंच बढ़ाने पर करीब 8.77 फीसदी रकम खर्च की थी, 7 फीसदी रकम इलाज लायक बीमारियों की वैक्सीन पर खर्च की थी और करीब 4. 36 फीसदी रकम बीमारियों को फैलने से रोकने पर की थी. इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से अफ्रीकन देशों को 1.6 बिलियन डॉलर दिए गए थे. दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों को WHO ने 375 मिलियन डॉलर दिए गए थे. पैसे हासिल करने वाले देशों में भारत भी शामिल था. रही बात अमेरिका की तो WHO ने अमेरिका को भी 62.2 मिलियन डॉलर दिए थे. ये उस अमेरिका को दिए गए पैसे हैं, जो WHO को देता तो सबसे ज्यादा पैसे है, लेकिन लेता सबसे कम पैसे है.

किस देश को कितने पैसे दिए जाएंगे और किस कार्यक्रम पर कितने पैसे खर्च होंगे, WHO साल में इसका लेखाजोखा तैयार करता है. इसके लिए संस्था के फैसले लेने वाली बॉडी वर्ल्ड हेल्थ एसेंबली की बैठक होती है, जिसमें संस्था के सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं. हर साल जेनेवा में इसकी बैठक होती है, जिसमें WHO की पॉलिसी तय की जाती है. डायरेक्टर जनरल की नियुक्ति की जाती है, पैसे के लेन-देन की देखरेख की जाती है और संस्था के बजट पर बातचीत कर उसे अंतिम रूप दिया जाता है. किस देश को कितने पैसे दिए जाएंगे, वो उस देश की परिस्थिति पर निर्भर करता है.

WHO के साथ कैसे हैं भारत के रिश्ते?

अब बात अपने देश की. भारत इस संस्था का सदस्य बना था 12 जनवरी, 1948 को. विश्व स्वास्थ्य संगठन की दक्षिण पूर्व एशिया के लिए बनी स्थानीय कमिटी की बैठक 4 और 5 अक्टूबर, 1948 को दिल्ली में देश के स्वास्थ्य मंत्री के दफ्तर में हुई थी, जिसका उद्घाटन तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने किया था. तब से लेकर अब तक विश्व स्वास्थ्य संगठन लगातार भारत की मदद करता रहा है. टीबी जैसी बीमारी से लड़ना हो या फिर कुष्ठ रोग और कालाजार के इलाज की बात हो या फिर पोषण के प्रति जागरूकता की बात हो, भारत ने सबमें कामयाबी पाई है और इसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन का अहम योदगान रहा है. अगर अभी की बात करें तो कोरोना जैसी महामारी से लड़ने के लिए भी विश्व स्वास्थ्य संगठन मदद कर रहा है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के भारत में प्रतिनिधि डॉक्टर हेन्क बेकेडम के मुताबिक भारत में कोरोना की स्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं. WHO भारत सरकार और राज्य सरकारों के साथ मिलकर निगरानी, टेस्ट्स, लैब रिसर्च, अस्पतालों की तैयारी और कोरोना पर नियंत्रण की तमाम कोशिशें कर रहा है. हालांकि भारत WHO के निर्देशों के अलावा भी अपने तरीके से कोशिशें कर रहा है. WHO ने मास्क सिर्फ उनलोगों के लिए ज़रूरी किया था, जो बीमार हों, जबकि भारत में लॉकडाउन के दौरान सभी को मास्क लगाना अनिवार्य कर दिया गया है. अभी WHO ने भारत को कुछ कहा भी नहीं था और यहां केस 341 तक ही पहुंचे थे तो भारत ने 22 मार्च को पूरे देश में जनता कर्फ्यू और फिर 24 मार्च से टोटल लॉकडाउन कर दिया था.

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