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EPF Rate Cut Impact: ब्याज दर 8.5% से 8.1% होने का मतलब, रिटायरमेंट बाद 1 करोड़ मिलने थे तो 93 लाख ही मिलेंगे

EPFO: बैंकों में पैसे जमा रखने पर वैसे ही कम ब्याज लोगों को मिल रहा था. पर EPF जैसे सोशल सिक्योरिटी स्कीम पर ब्याज दरों में कटौती ने बेहतर रिटॉयरमेंट प्लानिंग पर पानी फेरने का काम किया है.

EPF Rate Cut Impact: एम्पलॉय प्राविडेंट फंड ऑर्गनाईजेशन (EPFO) ने 12 मार्च 2022 को  वित्त वर्ष 2021-22 के लिए ईपीएफ डिपॉजिट्स पर ब्याज दरों को 8.5 फीसदी से घटाकर चार दशकों में  सबसे कम 8.1 फीसदी करने का फैसला ले लिया. इससे पहले 1977-78 में 8 फीसदी ब्याज दर ईपीएफ खाताधारकों को दिया गया था. 6.7 करोड़ ईपीएफ खाताधारकों के लिए ये सबसे बुरी खबर थी जो ईपीएफ में निवेश को अपना रिटॉयरमेंट प्लानिंग मानकर चलते थे. लगातार बढ़ती महंगाई से परेशान थे. बाकी निवेश के साधनों में घटते ब्याज दर से परेशान थे. 

सरकार ने किया फैसले का बचाव
ईपीएफओ बोर्ड जिसके अध्यक्ष केंद्रीय श्रम मंत्री भूपेंद्र यादव हैं उनकी अध्यक्षता में हुई बैठक में ये निर्णय लिया गया था. उन्होंने इस फैसले का ये कहते हुए बचाव किया कि इस कटौती के बावजूद बाकी सभी निवेश के मुकाबले ईपीएफ में निवेश पर खाताधारकों को ज्यादा ब्याज मिलता है. उन्होंने कहा कि एसबीआई के 10 वर्ष के एफडी पर केवल 5.4 फीसदी ब्याज ही मिलता है.  वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इसी प्रकार  ईपीएफ पर ब्याज दर में कटौती के फैसले का बचाव किया था. 

ईपीएफ खाताधारकों पर क्या असर 
ईपीएफ में जो नौकरीशुदा लोग निवेश करते हैं वे ये मानकर चलते हैं उनके बुरे वक्त, बच्चों की उच्च शिक्षा की फंडिंग, बेटी की शादी, घर खरीदने और रिटॉयरमेंट के बाद ईपीएफ में जमा फंड उनके काम आएगा. लेकिन ईपीएफ पर ब्याज दरें घटाने का मतलब है कि फंड में जमा पैसे पर सलाना कम ब्याज मिलना. और 60 साल की उम्र पूरा करने के बाद कोई रिटॉयर करेगा तो ईपीएफ में जमा फंड जब उसे मिलेगा तो वो उम्मीद से कम होगी. आपको बता दें 90 के दशक में 1989-90 से 1999-2000 तक ईपीएफ पर 12 फीसदी सलाना ब्याज मिला करता था. लेकिन 1999 के बाद ईपीएफ खाताधारकों को ईपीएफ पर कभी भी 10 फीसदी से ज्यादा ब्याज नहीं मिला. 2001 के बाद से 9.50 फीसदी से कम ही ब्याज मिलता आया है. 

कितनी लगेगी रिटॉयरमेंट कॉर्पस में सेंध 
ईपीएफ पर ब्याज दरों में कटौती का असर खाताधारकों के रिटॉयरमेंट प्लानिंग पर पड़ सकता है. उदाहरण के लिए 30 साल का व्यक्ति जिसका बेसिक वेतन 30,000 रुपये है. अगर हर वर्ष इसके वेतन में 5 फीसदी की बढ़ोतरी होती है और अगर ईपीएफ पर 8.5 फीसदी ब्याज मिलता तो 60 साल के उम्र पूरा होने पर उसके ईपीएफ खाता में कुल जमा फंड 1.40 करोड़ रुपये होता. लेकिन ईपीएफ पर ब्याज दरों में कटौती के बाद 8.1 फीसदी ब्याज दर के हिसाब से उसे केवल 1.30 करोड़ रुपये ही मिलेगा. यानि ईपीएफ पर ब्याज दर घटने से उसके कुल फंड में 7.14 फीसदी की कमी आ जाएगी. 

दूसरा उदाहरण अगर देखें तो मान लिजिए किसी व्यक्ति का बेसिक वेतन 50,000 रुपये महीने हैं. और उसके ईपीएफ फंड में 20 लाख रुपये जमा है. तो 8.5 ब्याज मिलता तो उसका कुल फंड 2021-22 के बाद 25.67 लाख रुपये का होता. लेकिन ब्याज दरों में कटौती के चलते उसका कुल फंड 25.48 लाख रुपये रह जाएगा. यानि 19,000 रुपये का नुकसान. 

अगर तीसरा उदाहरण लें तो मान लिजिए किसी एम्पलॉय के ईपीएफ खाते में 20 लाख रुपये जमा है. जो 2021-22 में ईपीएफ पर 8.5 फीसदी ब्याज मिलता तो उसे ब्याज के तौर पर 1.70 लाख रुपये मिलते यानि कुल ईपीएफ फंड बढ़कर 21.70 लाख रुपये हो जाता. लेकिन ईपीएफ रेट अब जबकि घटाकर 8.1 फीसदी कर दिया गया है तो ब्याज के तौर पर केवल 1.62 लाख रुपये मिलेगें. यानि कुल कॉर्पस 21.62 लाख रुपये का होगा. ईपीएफ रेट में कटौती के चलते खाताधारक को 8,000 रुपये का नुकसान होगा. 

ईपीएफ में योगदान का नियम 
आपको बता दें 20 से अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों में हर महीने  15,000 रुपये तक कमाने वाले कर्मचारियों के लिए ईपीएफ खाता खोलना अनिवार्य हैं. बेसिक वेतन और महंगाई भत्ते का 12% कर्मचारियों के योगदान के रूप में काटा जाता है और अन्य 12% एम्पलॉयर द्वारा जमा किया जाता है. जिसमें 8.33 फीसदी कर्मचारी पेंशन योजना 1995 में जमा किया जाता है. 

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